पाकुड़
अमड़ापाड़ा कोल माइंस के कारण उजड़े हुए कुछ आदिवासी ग्रामीण अपनी मांगों को लेकर पाकुड़ समाहरणालय के सामने अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि साल 2008 से ही कंपनी उन्हें धोखा दे रही है। न तो उन्हें जमीन का सही मुआवजा मिला है, न नौकरी मिली है और न ही रहने के लिए बुनियादी सुविधाएं।
बिना जमीन अधिग्रहण के कोयला उत्खनन का आरोप
ग्रामीणों का यह भी गंभीर आरोप है कि कंपनी बिना जमीन खरीदे ही जबरन गांवों को उजाड़कर कोयला निकाल रही है। अमड़ापाड़ा कोल माइंस द्वारा लगातार कोयला का उत्खनन किया जा रहा है, पर कोल कंपनियों द्वारा विस्थापित ग्रामीणों को अभी तक उचित मुआवजा नहीं मिल पाया है। ग्रामीणों में इस बात को लेकर गहरा आक्रोश है कि बिना कानूनी प्रक्रिया पूरी किए उनकी जमीनों पर कब्जा किया जा रहा है।
2008 से लंबित हैं मूलभूत सुविधाएं और मुआवजा
विस्थापित रामलाल हांसदा ने बताया कि कोल कंपनी के द्वारा उन्हें उचित मुआवजा, नौकरी और अन्य मूलभूत सुविधाएं अभी तक नहीं दी गई हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कंपनी एवं सरकार द्वारा विस्थापितों तथा ग्रामीणों की सुविधाओं के लिए जिस कमेटी का गठन किया जाना चाहिए था, वह भी आज तक नहीं हो पाया है। रामलाल के अनुसार, साल 2008 से लेकर अभी तक कोल प्रबंधक के पास बार-बार चक्कर काटने के बाद भी उन्हें सिर्फ आश्वासन मिला है, उचित मुआवजा नहीं।
प्रति एकड़ 1.16 करोड़ रुपये और नौकरी की मांग
वही दूसरे विस्थापित मोहन मुर्मू ने अपनी मुख्य मांगों को रेखांकित करते हुए कहा कि कोल कंपनी द्वारा अधिकृत जमीन के लिए 1 करोड़ 16 लाख रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से चार गुना मुआवजा दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही विस्थापित होने वाले प्रत्येक परिवार के कम से कम एक सदस्य को नौकरी देने की भी पुरजोर मांग की जा रही है।
बिना कानूनी विस्थापन के गांव उजाड़ने पर उठे सवाल
मोहन मुर्मू ने कंपनी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि कोल कंपनी वर्तमान में जिस जमीन से कोयला उत्खनन कर रही है, वह जमीन वास्तव में अधिग्रहित है ही नहीं। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर जमीन का अधिग्रहण हुआ ही नहीं है, तो फिर कैसे इतने सारे गांवों को जबरन उजाड़कर कोयला निकाला जा रहा है? इसके अलावा, विस्थापितों और ग्रामीणों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाएं भी उन्हें नसीब नहीं हो रही हैं।
मांगें पूरी होने तक अनिश्चितकालीन धरने का एलान
आदिवासियों और विस्थापित ग्रामीणों ने अब आर-पार की लड़ाई का मूड बना लिया है। उन्होंने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि जब तक उनकी मांगें जैसे की चार गुना मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को नौकरी पूरी नहीं होती, तब तक वे धरने से नहीं उठेंगे। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक उनकी सभी मांगे पूरी नहीं हो जातीं, तब तक वे इस अनिश्चितकालीन धरने पर डटे रहेंगे।