द फॉलोअफ डेस्क
जेपीएससी-जेएसएससी समेत राज्य की पूरी परीक्षा और नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार की मांग को लेकर आजसू पार्टी के महासचिव और हजारीबाग लोकसभा के पूर्व प्रत्याशी संजय मेहता ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को विस्तृत पत्र लिखा है। उन्होंने राज्य की शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली, छात्रवृत्ति वितरण और नियुक्ति प्रक्रियाओं में व्याप्त समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए ‘झारखंड शिक्षा, परीक्षा, छात्रवृत्ति एवं पारदर्शी नियुक्ति (पारदर्शिता, जवाबदेही एवं संस्थागत सुधार) विधेयक, 2026’ को शीघ्र लागू करने की मांग की है। संजय मेहता ने अपने पत्र में कहा है कि झारखंड निर्माण के बाद पिछले 25-26 वर्षों में राज्य की प्रतियोगी परीक्षाओं, जिसमें JPSC और JSSC भी शामिल हैं, का आयोजन, संचालन और नियुक्ति प्रक्रिया लगातार विवादों, अनियमितताओं, पेपर लीक, देरी और बाहरी एजेंसियों पर निर्भरता से घिरी रही है। उनका कहना है कि इन घटनाओं ने राज्य के युवाओं और अभ्यर्थियों के बीच परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

केवल अध्यक्ष और सदस्यों को बदलने से समाधान नहीं
हाल के छात्र आंदोलन के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ओर से लिए गए कुछ महत्वपूर्ण फैसलों का स्वागत करते हुए संजय मेहता ने कहा कि केवल आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों का इस्तीफा या बदलाव समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। उन्होंने संस्थागत और कानूनी सुधार की जरूरत पर जोर दिया है। उन्होंने पत्र में कहा कि किसी संस्था की विश्वसनीयता को सिर्फ किसी व्यक्ति की विश्वसनीयता के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। परीक्षा रद्द करने की घोषणा के दौरान मुख्यमंत्री की ओर से यह कहा गया था कि यदि SOP का पालन होता तो समस्या नहीं आती। संजय मेहता का तर्क है कि SOP बाध्यकारी कानून नहीं होता, बल्कि एक मार्गदर्शिका होती है। ऐसे में जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही तय करने के लिए सख्त कानून जरूरी है।

शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं का भी किया जिक्र
संजय मेहता ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था की बुनियादी समस्याओं को भी पत्र में प्रमुखता से उठाया है। उन्होंने विश्वविद्यालयों में सत्र विलंब, स्कूलों की खराब स्थिति, छात्रों को समय पर छात्रवृत्ति नहीं मिलने और प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार सामने आने वाली अनियमितताओं का उल्लेख किया है। उन्होंने कहा कि इन समस्याओं के कारण युवाओं का व्यवस्था पर विश्वास प्रभावित हुआ है। केवल व्यक्तियों में बदलाव पर्याप्त नहीं है, बल्कि संस्थागत, प्रक्रियागत और तकनीकी स्तर पर व्यापक सुधार की आवश्यकता है। संजय मेहता द्वारा तैयार मसौदे में झारखंड राज्य परीक्षा एजेंसी (JSTA) के स्वतंत्र गठन का प्रस्ताव रखा गया है। उनका कहना है कि बार-बार बाहरी एजेंसियों को परीक्षा की जिम्मेदारी देने से समस्याएं सामने आती हैं। इसलिए राज्य सरकार को अपनी सरकारी परीक्षा एजेंसी का गठन करना चाहिए। प्रस्तावित JSTA का नेतृत्व अपर मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी द्वारा किए जाने की बात कही गई है। यह एजेंसी सभी राज्य स्तरीय प्रतियोगी और नियुक्ति परीक्षाओं के आयोजन, प्रश्नपत्र प्रबंधन, परीक्षा केंद्र प्रबंधन, डिजिटल एवं साइबर सुरक्षा तथा डेटा विश्लेषण की जिम्मेदारी संभालेगी। वहीं आयोग को उसकी संवैधानिक भूमिका यानी चयन सूची की अनुशंसा तक सीमित रखने का प्रस्ताव दिया गया है।

परीक्षा अपराधों पर सख्त कार्रवाई का प्रस्ताव
मसौदे में परीक्षा से जुड़े अपराधों से निपटने के लिए CID के अंतर्गत विशेष परीक्षा अपराध अन्वेषण प्रकोष्ठ के गठन का प्रस्ताव है। पेपर लीक, संगठित नकल, डमी अभ्यर्थी, साइबर हैकिंग, परीक्षा माफिया और परिणाम में हेराफेरी जैसे मामलों के लिए विशेष अदालत और विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करने की बात कही गई है। ऐसे मामलों का निपटारा अधिकतम 3 से 6 महीने में करने का लक्ष्य प्रस्तावित किया गया है। साथ ही दोषी पाए जाने वालों की संपत्ति कुर्क या जब्त करने का प्रावधान भी मसौदे में शामिल है। प्रस्ताव में प्रत्येक वर्ष 31 दिसंबर तक अगले वर्ष का निश्चित परीक्षा कैलेंडर जारी करना अनिवार्य करने की बात कही गई है। विज्ञापन जारी होने से नियुक्ति तक की पूरी प्रक्रिया सामान्यतः 12 महीने के भीतर पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है।मसौदे में परीक्षा प्रक्रिया के प्रत्येक चरण के लिए भी समय-सीमा निर्धारित करने का सुझाव है। उदाहरण के तौर पर आवेदन प्रक्रिया समाप्त होने के 60 से 90 दिनों के भीतर प्रारंभिक परीक्षा और परीक्षा के 30 दिनों के भीतर प्रारंभिक परिणाम जारी करने की बात कही गई है। समय-सीमा का उल्लंघन होने पर अध्यक्ष और जिम्मेदार पदाधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई, यहां तक कि बर्खास्तगी का प्रावधान किए जाने का सुझाव है।
डिजिटल और तकनीकी सुरक्षा पर जोर
प्रस्तावित कानून में परीक्षा प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल और सुरक्षित बनाने के लिए कई तकनीकी उपाय सुझाए गए हैं। इनमें एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन, मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन, QR कोड, जियो-फेंसिंग, कंप्यूटर आधारित परीक्षा यानी CBT, बायोमेट्रिक और फेस ऑथेंटिकेशन शामिल हैं। इसके अलावा AI आधारित निगरानी, लाइव मॉनिटरिंग और सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल रूम की व्यवस्था का भी प्रस्ताव है। प्रश्नपत्र निर्माण का काम निजी बाहरी एजेंसियों को नहीं सौंपने की बात भी मसौदे में कही गई है। संजय मेहता ने परीक्षा के बाद की प्रक्रिया को भी पारदर्शी बनाने की मांग की है। मसौदे के अनुसार परीक्षा समाप्त होने के 72 घंटे के भीतर प्रारंभिक उत्तर कुंजी जारी करने का प्रावधान होना चाहिए। इसके बाद अंतिम उत्तर कुंजी, सभी अभ्यर्थियों के अंक, कट-ऑफ, श्रेणीवार कट-ऑफ और श्रेणीवार चयन सूची सार्वजनिक करने की बात कही गई है। इससे अभ्यर्थियों को परीक्षा और चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित होने की उम्मीद है।
विश्वविद्यालयों के सत्र को समयबद्ध करने की मांग
प्रस्तावित विधेयक में उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए भी कई प्रावधान सुझाए गए हैं। सभी विश्वविद्यालयों के लिए निर्धारित शैक्षणिक कैलेंडर जारी करने की बात कही गई है। सत्र शुरू होने, परीक्षा आयोजित करने और परिणाम घोषित करने के लिए समय-सीमा निर्धारित करने का प्रस्ताव है। सत्र में देरी होने पर कुलपति और प्रधानाचार्य की जवाबदेही तय करने की बात कही गई है। इसके अलावा छात्रों के पात्र होने की तारीख से अधिकतम 180 दिनों के भीतर डिग्री प्रदान करने का प्रावधान किए जाने का सुझाव दिया गया है। छात्रवृत्ति व्यवस्था को लेकर भी संजय मेहता ने सुधार का प्रस्ताव दिया है। इसके तहत केंद्रीकृत डिजिटल छात्रवृत्ति पोर्टल को और मजबूत करने की बात कही गई है। मसौदे के अनुसार आवेदन के बाद अधिकतम 30 से 45 दिनों के भीतर आधार आधारित DBT के माध्यम से छात्रवृत्ति की राशि सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में भेजने की व्यवस्था होनी चाहिए। इसमें देरी होने पर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान रखने का सुझाव दिया गया है।
स्वतंत्र निरीक्षण समिति बनाने का प्रस्ताव
प्रस्तावित कानून में एक उच्चस्तरीय स्वतंत्र निरीक्षण समिति के गठन की भी बात कही गई है। इसमें सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, पूर्व UPSC या राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्य, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ, शिक्षा विशेषज्ञ और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को शामिल करने का सुझाव है। यह समिति समय-समय पर परीक्षा, नियुक्ति और शिक्षा व्यवस्था की समीक्षा करेगी तथा अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार और विधानसभा के समक्ष प्रस्तुत करेगी।
अधिकारियों की जवाबदेही से लेकर अभ्यर्थियों के मुआवजे तक प्रावधान
मसौदे में आयोग के अधिकारियों के वार्षिक संपत्ति विवरण को सार्वजनिक करने, संवेदनशील पदों पर कार्यरत अधिकारियों का 2 से 3 वर्ष में अनिवार्य स्थानांतरण करने और E-विकल्प प्रणाली लागू करने का भी प्रस्ताव है। इसके अलावा अभ्यर्थी सुविधा सेल, शिकायत निवारण पोर्टल और परीक्षा रद्द होने की स्थिति में अभ्यर्थियों को मुआवजा देने तथा आयु सीमा में छूट देने जैसे प्रावधान भी शामिल किए गए हैं।
विशेषज्ञों से राय लेकर विधानसभा में विधेयक लाने का आग्रह
संजय मेहता ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र के अंत में कहा है कि उनके सुझाव को पूर्ण रूप से स्वीकार करते हुए यदि सरकार इसे और व्यापक बनाना चाहती है तो विशेषज्ञों से विधिक राय ली जा सकती है। इसके बाद इसे विधेयक के रूप में विधानसभा में प्रस्तुत कर पारित कराने का आग्रह उन्होंने किया है। उन्होंने कहा है कि यह कानून झारखंड के युवाओं के भविष्य की दिशा तय करेगा। उन्हें उम्मीद है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस विषय पर सकारात्मक पहल करेंगे।
कैबिनेट में रखने और विधानसभा से पारित कराने की मांग
संजय मेहता ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि इस महत्वपूर्ण विषय को कैबिनेट में रखा जाए और विधानसभा के पटल पर मजबूती से प्रस्तुत किया जाए। उनका कहना है कि इससे झारखंड की युवा पीढ़ी को सुरक्षित, पारदर्शी, समयबद्ध और विश्वसनीय परीक्षा एवं शिक्षा व्यवस्था मिल सकेगी।