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RINPAS : चहेते को दवा का टेंडर दिलाने का प्लॉट तैयार, पुराना टेंडर रद्द, नये टेंडर में कुछ शर्तें ढीली की गयी और कई पूरी तरह समाप्त 

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द फॉलोअप, रांची

मनोरोगियों के इलाज का राज्य के सबसे बड़े संस्थान रिनपास (RINPAS) में दवा खरीद के टेंडर में खेल प्रारंभ हो गया है। प्रति वर्ष लगभग चार करोड़ रुपए की दवा खरीद के लिए पुराने टेंडर को अचानक रद्द कर दिया गया है। दिलचस्प रूप से नया टेंडर जारी किया गया है। लेकिन नये टेंडर में कई शर्तें ढीली कर दी गयी तो कुछ को पूरी तरह हटा दिया गया। जानकार सूत्रों का दावा है कि मनचाही दवा निर्माता कंपनी को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से टेंडर की शर्तों में भारी बदलाव किया गया है। जब इस संबंध में फॉलोअप ने रिनपास की निदेशक डॉ जयति सिमलाई से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने मीडिया का नाम सुनते ही मोबाइल फोन काट दिया। फिर उन्हें जब व्हाट्सअप मेसेज के माध्यम से पूछा गया कि टेंडर क्यों रद्द किया गया। शर्तों में क्यों ढील दी गयी तो उन्होंने मेसेज के माध्यम से रिनपास में होने वाले टेंडर को देखने वाले मनोज जी से बात कर लेने की सलाह दी। द फॉलोअप ने जब मनोज जी से उनके मोबाइल नंबर 7903552025 पर बात की तो उन्होंने कार्यालय आने की बार बार सलाह दी। टेंडर के बारे में कुछ बोलने से साफ इंकार कर दिया। यह कहते रहे कि देखना पड़ेगा कि क्यों रद्द किया गया।


क्या है टेंडर का खेल

दस्तावेज़ के अनुसार, रिनपास ने 19 मार्च 2026 को दवा आपूर्ति के लिए पहला टेंडर (DIR/44/03/2025-2026/Medicine) जारी किया था, जिसकी अंतिम तिथि 20 अप्रैल 2026 थी। हालांकि, सभी निविदाएं प्राप्त होने के बावजूद 25 अप्रैल 2026 को बिना किसी कंपनी का बिड को खोले ही टेंडर रद्द कर दिया गया। इसके लगभग तीन महीने बाद 22 जुलाई 2026 को नया टेंडर (DIR/07/07/2026-2027/Medicine) जारी किया गया, जिसमें कई अहम शर्तों में बदलाव कर दिया गया है। जबकि, यदि किसी टेंडर को बिना बिड खोले रद्द किया जाता है, तो सामान्यतः री-टेंडर जारी किया जाना चाहिए। री टेंडर में मूल शर्तों को यथावत रखने की परंपरा है। लेकिन इस मामले में नया (Fresh) टेंडर जारी कर शर्तों में व्यापक बदलाव किए गए, जो केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) के दिशा-निर्देशों की भावना के विपरीत बताया जा रहा है।

नये टेंडर में कैसे बदल दिए गए हैं प्रमुख शर्तें

-टेंडर फीस की राशि पहले 25 हजार रुपए थी। अब इसे अचानक घटा कर मात्र पांच हजार रुपए कर दी गयी है।
-पहले अर्नेस्ट मनी की राशि 8 लाख रुपए थी, अब इसे घटा कर 2.5 लाख रुपए कर दी गयी है।
-पहले सप्लायर टर्नओवर एक करोड़ रुपए निर्धारित किया गया था, अब अब टर्न ओवर का कोई जिक्र ही नहीं है।
-पहले मैन्युफैक्चरर प्रोडक्शन डिक्लेरेशन अनिवार्य था, अब उसे पूरी तरह हटा दिया गया।
-ऑथोरिटी लेटर अनिवार्य था, अब पूरी तरह इस शर्त को डिलीट कर दिया गया।
-ब्लैकलिस्टिंग सेल्फ-डिक्लेरेशन पहले अनिवार्य था, अब पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।
-पहले मेडिसीन मैन्युफैक्चरर का टर्नओवर 25 करोड़ रुपए तय किया गया था, अब इसे घटा कर 20 करोड़ कर दिया गया है।
-अनुभव (Experience) पहले अनिवार्य था, अब अनुभव प्रमाण पत्र देना बाध्यता नहीं रह गया।
- सप्लाई में देरी पर पहले 0.25%–0.5% दंड शुल्क निर्धारित था। नये टेंडर में इसे पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है।
-पहले प्लांट निरीक्षण का प्रावधान किया गया था। अब इस शर्त को पूरी तरह हटा दिया गया है।

अब समझें शर्तों को समाप्त और ढीला किए जाने का क्या होगा नुकसान
टेंडर की फीस पहले 25 हजार रुपए थी। पांच हजार रुपए किए जाने से साधारण और छुटभैये कंपनी या फर्म भी टेंडर डाल पाएगा। अर्नेस्ट मनी की राशि को घटाने से भी छोटी छोटी कंपनियां टेंडर में भाग ले सकेंगी। दिलचस्प रूप से पहले ब्लैक लिस्टिंग के बारे में शपथ पत्र के माध्यम से बताना था। अब इस शर्त के नहीं रहने से ब्लैकलिस्टेड कंपनियां भी टेंडर प्रक्रिया में शामिल हो सकेंगी। सप्लायर के टर्न ओवर की राशि को एक करोड़ से शून्य करने से भी टेंडर और दवा की गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ने से कोई नहीं रोक सकेगा। पहले की शर्त में था कि जरूरत पड़ने पर दवा निर्माता कंपनी के प्लांट का निरीक्षण किया जा सकेगा। अब यह शर्त ही नहीं है। इससे कौन कंपनी कहां दवा बना रही है, कैसी दवा बना रही है, पता नहीं लगाया जा सकेगा। इसी तरह टेंडर डालने के लिए कंपनियां किसी अधिकारी या प्रतिनिधि को अधिकृत करती है। ताकि उस कंपनी के नाम पर कोई भी व्यक्ति टेंडर नहीं डाल सके। लेकिन इस शर्त को भी हटा दिया गया है। इस तरह शर्तें इस तरह हटा दी गयी है या उसमें ढील दे दी गयी है कि मनचाहे कंपनी के सलेक्शन में कहीं कोई व्यवधान उत्पन्न न हो। 

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