द फॉलोअप डेस्क
300 रुपये की रिश्वत से जुड़ी कानूनी लड़ाई तीन दशक से ज्यादा समय तक चली। वर्ष 1993 में दर्ज इस मामले में धनबाद की वासुदेवपुर कोलियरी के तत्कालीन पीएफ क्लर्क समीर कुमार चौधरी को ट्रायल कोर्ट ने दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। अब झारखंड हाईकोर्ट ने उनकी सजा घटाकर एक माह एक दिन कर दी है। यह उतनी ही अवधि है, जितनी चौधरी पहले ही जेल में बिता चुके हैं। मामला 22 मार्च 1993 का है, जब वासुदेवपुर कोलियरी में कार्यरत पूर्व माइनर लोडर रामधारी हरिजन के लंबित सीएमपीएफ एरियर भुगतान के दावे को आगे बढ़ाने के बदले चौधरी पर 300 रुपये रिश्वत मांगने का आरोप लगा था। हरिजन की शिकायत के बाद सीबीआई ने कार्रवाई करते हुए चौधरी को पकड़ा था।

2005 में ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा
रिश्वत की रकम बरामद होने के बावजूद मामले का निपटारा जल्द नहीं हो सका। करीब 12 साल बाद वर्ष 2005 में ट्रायल कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत समीर कुमार चौधरी को दोषी ठहराते हुए दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसके बाद चौधरी ने सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की। बचाव पक्ष की ओर से गवाहों के बयानों में विरोधाभास का हवाला दिया गया। दलील दी गई कि रिश्वत की रकम उनकी जेब से बरामद नहीं हुई थी, बल्कि कार्यालय की दराज से मिली थी।

हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखी, सजा में दी राहत
झारखंड हाईकोर्ट में जस्टिस प्रदीप श्रीवास्तव की अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए अपील को गुण-दोष के आधार पर खारिज कर दिया और दोषसिद्धि बरकरार रखी। हालांकि, सजा के सवाल पर अदालत ने चौधरी को राहत दी। अदालत ने ध्यान दिया कि रिश्वत मांगने की घटना वर्ष 1993 की है और आरोपी करीब 33 वर्षों से मुकदमे का सामना कर रहा है। इसके अलावा उसका कोई पूर्व आपराधिक इतिहास भी नहीं था। इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा घटाकर पहले से भुगती गई एक माह एक दिन की अवधि तक सीमित कर दी। इस तरह तीन दशक से अधिक समय तक चले 300 रुपये के रिश्वत मामले में आरोपी को सजा के मामले में बड़ी राहत मिली।