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सचिवालय का सच : कृपया साहबों के बोर्ड पर ध्यान न दें

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जीतेंद्र कुमार

प्रशासनिक सुधार प्रत्येक सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता में रही है। हम यह नहीं कह रहे कि यह दिखावटी रहा है। क्योंकि जब कभी किसी सरकार की नींद टूटी है तो इस प्राथमिकता को पूरा करने के लिए तरह तरह के दिखावे जरूर किए गए हैं। नियम-कानून बनाए गए हैं। जब कभी कोई मंच मिला है हमारे नेता और नौकरशाह गला फाड़-फाड़ कर अपनी इस प्राथमिकता को पूरा करने की बात दुहराए हैं। इस क्रम में पूर्व के नियम कानून बदले गए, कुछ को डिलीट तो कुछ को संशोधित भी किया गया है। इसके लिए समय समय पर हमारे आलाधिकारियों की भी जिम्मेदारी तय की गयी। उनके लिए तरह तरह के फरमान जारी किए गए। उन्हें पीपुल कनेक्ट होने का पाठ पढ़ाया गया। इसके लिए कभी कैबिनेट डिपार्टमेंट फरमान जारी किया तो कभी कार्मिक ने भी आदेश निकाला। मौखिक रूप से मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव भी आलाधिकारियों को क्षेत्र भ्रमण करने, योजनाओं के कार्यान्वयन का स्थल निरीक्षण करने का निर्देश देते रहे। उसमें कहा जाता रहा कि विभागीय सचिव महीने में कम से कम इतने दिन क्षेत्र भ्रमण करेंगे। प्रमंडलीय आयुक्त से लेकर उपायुक्त तक गांव में रात बिताएंगे। विभागीय सचिव आम लोगों और पीड़ितों से मिल कर उनकी समस्या दूर करेंगे। अब इन सब आदेशों का पालन हो रहा है कि नहीं, हम नहीं जानते। पर सचिवालय का सच यह है कि शायद हमारे बड़े साहबों को भी इसका ध्यान नहीं होगा।

लेकिन हमारे बड़े साहबों ने एक काम जरूर किया। मुख्य सचिव से लेकर अन्य विभागीय सचिवों ने अपने अपने कार्यालय कक्ष के बाहर आकर्षक बोर्ड जरूर टंगवाया। उस पर आम लोगों से मिलने का बजाप्ता समय लिखवाया। पर सचिवालय का कड़वा सच यही है कि बोर्ड पर दर्ज समय के अनुरूप साहब संयोग से ही मिलते हैं। कभी साहब मीटिंग में होते हैं तो कभी किसी कार्यक्रम में गए होते हैं। कभी लंच में जाने के बाद साहब ऑफिस ही नहीं लौटते हैं। दुमका, गोड्डा, पाकुड़ जैसे सुदूरवर्ती जिलों से आनेवाला पीड़ित व्यक्ति दिन भर प्रतीक्षा करने के बाद निराश होकर रोज लौट जाता है। साहब के बगल में बैठे उनके पीए साहब मिलाने से हाथ खड़ा कर देते हैं। साहब के सामने अपनी औकात की मजबूरी बता कर मिलने वालों को लौट जाने की सलाह देते रहते हैं। और इस तरह आम लोगों की पीड़ा और समस्याओं का सचिवालय में रोज निदान हो रहा है।

लेकिन सचिवालय के सच का एक पक्ष यह भी है कि साहबों के लिए किसी का दरवाजा दिन के 10 बजे से शाम छह बजे तक खुला रहता है। कंपनी वाले हों, ठेका लेने वाले हों, जुगाड़ तंत्र को मजबूत करने वाले हों या सत्ता के खिलाड़ी हों, इनके मिलने की कोई समय सीमा नहीं होती। यहां सिर्फ बड़े और छोटे खिलाड़ी के रूप में तौला जाता है। बड़ा खिलाड़ी सीधे दरवाजा खोलते हुए साहब के कमरे में घुस जाता है। उसे घर के ड्राइंग रुम में बैठने का मौका दिया जाता है। छोटे को घुसने के लिए सिर्फ कुछ इंतजार करना पड़ता है। बोर्ड पर लिखा समय केवल आम लोगों के लिए दर्शाया जाता है।

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