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रिम्स में गर्भवती महिला को स्ट्रेचर नहीं मिला, घंटो एंबुलेंस में तड़पती रहीं; पैदल चलकर पहुंची प्रसूता वार्ड

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द फॉलोअप डेस्क:

रांची के रिम्स या झारखंड के सरकारी अस्पतालों में एंबुलेंस की दरकार किसको है. झारखंडी इतना कमजोर तो नहीं है कि अस्पताल पहुंचने के लिए एंबुलेंस पर निर्भर हो जाएगा. स्ट्रेचर की तो बात ही मत कीजिए. आंदोलन की जमीन पर जन्मा झारखंडी कहीं स्ट्रेचर पर लेटेगा. वह घिसटता हुआ अस्पताल तक पहुंच जाएगा. अस्पताल के बरामदे में जमीन पर लेटकर इलाज करा लेगा, लेकिन स्ट्रेचर नहीं मांगेगा. और गर्भवती महिलायें. नये झारखंड में महिलाएं अब इतनी सशक्त, सक्षम और स्वाबलंबी हैं कि अस्पताल के गेट पर बच्चे को जन्म दे देंगी, लेकिन स्ट्रेचर नहीं मांगेगी. शिकायत नहीं करेंगी कि एंबुलेंस नहीं मिला. झारखंड के मजबूत लोग ऐसा करके मंत्री इरफान अंसारी का प्रदेश को स्वास्थ्य के क्षेत्र में नंबर 1 बनाने का विजन पूरा करेंगे. आलोचनाओं से परे, सुयोग्य स्वास्थ्य मंत्री की खातिर यदि किसी ने इतना भी सहयोग नहीं किया तो लानत है उसके झारखंडी होने पर. 

गुमला की रजनी देवी को नहीं मिला स्ट्रेचर
अब शनिवार की ही घटना को देख लीजिए. रजनी देवी को गुमला से बेहतर इलाज के लिए रिम्स रेफर कर दिया गया था. गनीमत है कि एंबुलेंस मिल गई वरना रजनी देवी मंत्रीजी के विजन को पूरा करने के लिए  साइकिल, बहंगी या खटिया पर भी टांगकर लाई जा सकती थीं. खैर, जब रिम्स अस्पताल पहुंची उनको स्ट्रेचर या व्हीलचेयर नहीं मिला. वह एंबुलेंस में बैठी कराहती रहीं. जिनको विभाग और मंत्रीजी के कामकाज में केवल कमियां नजर आती है, ऐसे निगेटिव लोग कहेंगे कि गजब खराब व्यवस्था है यार. गर्भवती को स्ट्रेचर के लिए कौन वेट कराता है. लेकिन हम पॉजिटिव लोग हैं. हमें यकीन है कि झारखंड में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए जो क्रांतिकारी प्रयास किए जा रहे हैं, महिला को स्ट्रेचर नहीं देकर एंबुलेंस में ही तड़पता छोड़कर बस यह परखा जा रहा था कि वो कितना बर्दाश्त कर सकती हैं. महिला स्वाबलंबन की दिशा में किए जा रहे प्रयास कहीं कम तो नहीं रह गये. 

मंत्री की मंशा और मकसद पर संदेह नहीं
हमें स्वास्थ्य मंत्री की मंशा, मकसद और मुनादियों पर रत्तीभर भी संदेह नहीं है. 3 बार विधायकी जीतने के बाद बड़ी तपस्या से मंत्रिपद मिला है. इतने बड़े पद पर बैठा व्यक्ति यदि कुछ बोल रहा है तो गलत थोड़ी ना बोलेगा. वह वाकई झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था को नंबर 1 बनाना चाहते हैं. इसके लिए कितना काम हो रहा है, आपको क्या पता है. कैसे पता चलेगा. आप तो बस स्ट्रेचर, एंबुलेंस, व्हीलचेयर, ऑक्सीजन बेड, दवाई और सर्जरी में उलझे हैं. आपको कैसे दिखेगा कि मंत्रीजी ने हेल्थ सिस्टम को नंबर 1 बनाने के लिए कितने सेमिनार कराए. कितनी कार्यशालाओं का आयोजन हुआ. कितने औचक निरीक्षण हुये. पोस्टर और बैनर छपाने में कितना सिर खपाना पड़ता है, इसका इल्म भी है आपको. नहीं पता होगा. तभी आप मंत्रीजी को कोसते हैं. 

रजनी देवी पैदल चलकर पहुंची प्रसूता वार्ड
खैर आप जानना नहीं चाहेंगे कि रजनी देवी जी के साथ क्या हुआ। रजनी एंबुलेंस में तड़पती रहीं। घरवाले स्ट्रेचर या व्हीलचेयर पाने की कोशिश में भागते रहे। जब इंतजार की इंतिहा हो गयी तो रजनी देवी ने खुद ही प्रसूता वार्ड की ओर बढ़ना शुरू किया. झारखंड में महिला स्वाबलंबन की इससे बेहतर तस्वीर भी मिल सकती है क्या कहीं. कदम लड़खड़ाए। दर्द पेट से होकर आंखों में उतर आया. लेकिन रजनी के पैर नहीं रूके. गिरते-पड़ते आखिरकार रजनी लिफ्ट तक पहुंची. कैसे नहीं पहुंचतीं. प्रदेश के हेल्थ सिस्टम को नंबर 1 बनाने के मंत्रीजी के विजन में योगदान जो देना था. रजनी से मंत्रीजी के संकल्प को पूरा करने के लिए जो बन पड़ सकता था, उन्होंने किया. 

झारखंड में कुव्यवस्था की तस्वीर नई नहीं है
आप कहेंगे यह कैसी व्यवस्था है. कैसे एक गर्भवती महिला को यूं ही अस्पताल के गेट पर तड़पता हुआ छोड़ा जा सकता है. प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल में स्ट्रेचर और व्हीलचेयर का ना होना कितना शर्मनाक है. क्या हेल्थ सिस्टम को ही लकवा मार गया है. क्या इस सिस्टम को खुद ही इलाज की जरूरत है. हूं. यदि आप ऐसा सोचते हैं तो फिर मंत्री इरफान अंसारी के महान व्यक्तित्व, निस्वार्थ सेवाभावना और दूरदर्शी सोच से कितना अनजान हैं आप. देखिएगा. जैसे लोग आर्थिक और सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर बनते हैं. मंत्रीजी का विजन झारखंडियों को हेल्थ में भी आत्मनिर्भर बना देगा. लोगों के हाथ में स्टेथोस्कोप, सीजर और दवाइयां देकर कहा जाये. चलो अपना इलाज खुद करो. 


 

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