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सिमडेगा का ‘रामरेखाधाम’ – जहां भगवान राम ने अपने वनवास काल में विश्राम किया था

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कंचन सिंह, सिमडेगा उपायुक्त 
मर्यादा पुरुषोत्तम राम मात्र धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं हैं, बल्कि लोकमंगलकारी भारतीय चिंतन और नैतिकता के प्रतीक भी हैं। उनके जीवन की घटनाएं, निर्णय और व्यवहार आज भी समाज के लिए मार्गदर्शक हैं।
राम का जीवन आदर्श पुरुष के रूप में मर्यादा, कर्तव्य और धर्म के पालन का जीवंत उदाहरण है। पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए उन्होंने राजसिंहासन त्यागा, वनवास भोगा और जीवन पर्यंत जनकल्याण के लिए कार्य किया। उनका चरित्र आत्मत्याग, धैर्य और सहिष्णुता का अद्भुत उदाहरण है।
“राम वन गमन पथ” पर वे पवित्र पदचिह्न हैं, जिन पर स्वयं भगवान श्रीराम, सीता माता और लक्ष्मण जी ने चलकर मानवता को कुलपरंपरा की मर्यादा, धर्म, धैर्य, त्याग, शौर्य, सत्य, शील और सेवा का अप्रतिम उदाहरण प्रस्तुत किया, जो विश्व के इतिहास में अन्यत्र दुर्लभ है।


झारखंड की पुण्यभूमि पर सिमडेगा स्थित यह स्थल ‘रामरेखाधाम’ इस पावन यात्रा का एक उज्ज्वल पड़ाव है। यहां भगवान श्रीराम ने अपने वनवास काल में विश्राम किया था और अपने दिव्य स्पर्श से इस भूमि को धन्य किया था।
आज समाज निरंतर भौतिक प्रगति के मार्ग पर अग्रसर है, किंतु आदर्शों और वास्तविक परिस्थितियों के असामंजस्य के कारण जीवन में आंतरिक सुख-शांति का अभाव परिलक्षित हो रहा है। परस्पर अविश्वास और द्वेष से सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न सा पड़ रहा है। ऐसे में श्रीराम के जीवन मूल्यों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।
राम का जीवनचरित हमारे सम्मुख ऐसा आदर्श प्रस्तुत करता है, जो हमें न सिर्फ कर्तव्य-पथ में आई सभी चुनौतियों को समरस भाव से निपटने का हौसला देता है, बल्कि समस्त चराचर जगत के मध्य मनुष्य की श्रेष्ठता स्थापित करते हुए उसकी रक्षा करने को प्रेरित करता है। मानस में राम कहते हैं, “सब मम प्रिय, सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए॥”


अर्थात समस्त मानव जाति के उत्थान की कामना और उसके लिए अथक प्रयत्न करना ही राम का आदर्श है। श्रीराम हमें सिखाते हैं कि नेतृत्व में विनम्रता, शक्ति में संयम, और प्रतिकूल परिस्थितियों में धैर्य ही सच्चा धर्म है। यदि हम अपने जीवन में इन आदर्शों को अपनाएं, तो न केवल व्यक्तिगत रूप से समृद्ध होंगे, बल्कि एक न्यायपूर्ण, संवेदनशील और सामंजस्यपूर्ण समाज की स्थापना कर सकेंगे।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के मार्गदर्शन में हम इस धाम के विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं, और यह हमारा सौभाग्य है कि इस वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को हम प्रथम राजकीय रामरेखा महोत्सव मना रहे हैं। इस आयोजन से आने वाले वर्षों में इस धाम की ख्याति और बढ़ेगी तथा भारत के धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर भी सिमडेगा को महत्वपूर्ण स्थान मिल सकेगा, जो इस जिले के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसके माध्यम से इस पावन स्थल की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्ता के साथ-साथ सिमडेगा जिले के अन्य पर्यटन स्थलों के बारे में भी गहन जानकारी प्राप्त होगी।


 

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