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गांव के होटल में प्लेट धोने से लेकर दुबई से मेडल लाने तक का सफर, पढ़िए जीतू राम बेदिया के संघर्ष की कहानी 

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सन्नी शारद, रांची
झारखंड की राजधानी रांची से सटे जोन्हा प्रखंड के ढिबराबांध टोली गांव का नाम इन दिनों गर्व के साथ लिया जा रहा है। वजह हैं गांव के दिव्यांग खिलाड़ी जीतू राम बेदिया, जिन्होंने दुबई में आयोजित एशियन यूथ पैरा गेम्स 2025 में पैरा आर्चरी स्पर्धा में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर राज्य और देश का नाम रोशन किया है। जीतू की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है, क्योंकि उन्होंने बेहद कठिन हालात और गरीबी से निकलकर यह मुकाम हासिल किया है।
होटल में प्लेट धोकर पढ़ाई और परिवार की मदद
जीतू राम बेदिया के पिता लखीराम बेदिया और उनकी मां दोनों दिहाड़ी मजदूर हैं। पिता रोज जोन्हा से रांची मजदूरी करने आते हैं। छह भाई-बहनों में जीतू मझले हैं। जन्म से ही दिव्यांग जीतू की एक बहन भी दिव्यांग है। परिवार की आर्थिक हालत इतनी कमजोर थी कि 2017 से पहले जीतू गांव के साप्ताहिक बाजार में एक होटल में प्लेट धोने का काम करते थे। इस काम से उन्हें महीने में करीब एक हजार रुपये मिलते थे, जिससे वे अपनी पढ़ाई जारी रखते और परिवार की मदद करते थे।
कोच की नजर ने बदली जिंदगी


गांव के उसी होटल में काम के दौरान आर्चरी कोच रोहित कोइरी की नजर जीतू पर पड़ी। उन्होंने जीतू को आर्चरी के बारे में बताया और परिवार से बात कर 2017 में उसे बिरसा मुंडा आर्चरी सेंटर, जोन्हा ले आए। यहीं से जीतू ने बांस के धनुष से निशाना साधना शुरू किया। लगातार अभ्यास के दम पर वे पहले राज्य स्तर और फिर राष्ट्रीय स्तर पर खेलने लगे। आज जीतू के नाम दो दर्जन से अधिक मेडल दर्ज हैं।
सफलता के बावजूद पेंशन से वंचित
जीतू राम बेदिया की कहानी संघर्ष, मेहनत और हौसले की मिसाल है, लेकिन एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि आज तक उन्हें दिव्यांग पेंशन नहीं मिली है। उनकी मां को न तो मंइयां सम्मान योजना की राशि मिल रही है और न ही किसी तरह की पेंशन।
अपनी सफलता पर खुश जीतू कहते हैं कि अभी उन्हें बहुत आगे जाना है। इस सफर में कोच रोहित कोइरी सहित कई लोगों का योगदान रहा है। उनका कहना है कि अगर दिव्यांग पेंशन मिल जाए, तो यह उनके लिए बड़ी राहत होगी। आज गांव जीतू की उपलब्धि पर गर्व कर रहा है, वहीं उनकी कहानी सिस्टम से जुड़े सवाल भी खड़े करती है।



 

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