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निर्दलीय MLC के BJP समर्थन से NDA में हलचल, चिराग ने नैतिकता पर उठाए सवाल

निर्दलीय MLC के BJP समर्थन से NDA में हलचल, चिराग ने नैतिकता पर उठाए सवाल

द फॉलोअप डेस्क:

बिहार विधान परिषद चुनाव (Bihar Legislative Council Election) के बाद निर्दलीय एमएलसी बंशीधर ब्रजवासी (MLC Banshidhar Brajwasi) और राहुल राज (Rahul Raj) के बीजेपी (BJP) को समर्थन देने का मामला अब एनडीए (NDA) के भीतर चर्चा का विषय बन गया है। इस फैसले को लेकर गठबंधन के सहयोगी दलों के बीच असहजता बढ़ती नजर आ रही है। केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने दोनों एमएलसी के फैसले पर नैतिकता का सवाल उठाया है। इससे पहले जेडीयू प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा भी इस पूरे घटनाक्रम पर सहयोगी दलों को नजर रखने की नसीहत दे चुके हैं। ऐसे में निर्दलीय एमएलसी के बीजेपी को समर्थन देने के फैसले ने एनडीए के भीतर सियासी हलचल बढ़ा दी है।

चिराग पासवान ने उठाया नैतिकता का सवाल

मंगलवार को पटना में मीडिया से बातचीत के दौरान चिराग पासवान ने कहा कि किसी एमएलसी का किसी राजनीतिक दल को समर्थन देना उसका व्यक्तिगत फैसला है, लेकिन इस फैसले में नैतिकता का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर कोई उम्मीदवार गठबंधन के एक दल के खिलाफ चुनाव लड़कर जीतता है और बाद में उसी गठबंधन की दूसरी सहयोगी पार्टी को समर्थन देता है, तो इस पर नैतिकता का सवाल उठना स्वाभाविक है। चिराग ने निर्दलीय एमएलसी के किसी राजनीतिक दल में शामिल होने को लेकर कानूनी अड़चन की आशंका भी जताई। उन्होंने कहा कि अगर इस मामले में कानून से जुड़ी कोई बाधा आती है, तो यह चिंता का विषय है। हालांकि, उन्होंने सीधे तौर पर किसी सहयोगी दल का नाम नहीं लिया।

बीजेपी को समर्थन देने पर पहले भी जताई गई थी नाराजगी

चिराग पासवान के बयान से पहले जेडीयू प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा भी इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दे चुके हैं। उन्होंने कहा था कि बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को पूरे घटनाक्रम पर विचार करना चाहिए। साथ ही उन्होंने एनडीए के अन्य सहयोगी दलों से भी इस मामले पर नजर रखने की अपील की थी। चिराग और उमेश कुशवाहा के बयानों से साफ है कि निर्दलीय एमएलसी के बीजेपी को समर्थन देने का मामला अब गठबंधन के भीतर चर्चा का विषय बन चुका है।

जेडीयू उम्मीदवारों को हराकर जीते थे दोनों निर्दलीय MLC

दरअसल, हाल ही में हुए बिहार विधान परिषद चुनाव में तिरहुत स्नातक सीट से निर्दलीय उम्मीदवार बंशीधर ब्रजवासी ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने जेडीयू के अभिषेक झा को हराया था। वहीं, सारण शिक्षक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार राहुल राज ने जेडीयू के आनंद पुष्कर को शिकस्त दी थी। चुनाव में जीत के बाद दोनों निर्दलीय एमएलसी ने बीजेपी को समर्थन देने का ऐलान किया। यही फैसला अब एनडीए के भीतर सियासी चर्चा और असहजता की वजह बन गया है।

बीजेपी की सदस्यता पर अब भी सस्पेंस

बीते शनिवार को बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज बीजेपी के प्रदेश कार्यालय पहुंचे थे। इस दौरान दोनों ने मीडिया से बातचीत में पार्टी की सदस्यता लेने की बात कही थी। शुरुआत में बीजेपी की ओर से भी दावा किया गया कि दोनों एमएलसी पार्टी में शामिल हो गए हैं। हालांकि, बाद में पार्टी ने अपने इस दावे से इनकार कर दिया। बीजेपी ने स्पष्ट किया कि दोनों निर्दलीय एमएलसी ने पार्टी की सदस्यता नहीं ली है, बल्कि सदन में बीजेपी को समर्थन देने की बात कही है। ऐसे में दोनों के बीजेपी में औपचारिक रूप से शामिल होने को लेकर अब भी स्थिति स्पष्ट नहीं है।

जेडीयू ने 5 नवंबर को बुलाई समीक्षा बैठक

इस पूरे घटनाक्रम के बीच जेडीयू में भी नाराजगी सामने आई है। तिरहुत स्नातक और सारण शिक्षक सीट पर चुनाव हारने वाले पार्टी उम्मीदवार अभिषेक झा और आनंद पुष्कर सोशल मीडिया के जरिए सहयोगी दलों के नेताओं पर उदासीनता और छल के आरोप लगा चुके हैं। वहीं, जेडीयू ने विधान परिषद चुनाव के नतीजों की समीक्षा के लिए 5 नवंबर को पटना में बैठक बुलाई है। इस बैठक में चुनाव परिणामों के साथ पार्टी उम्मीदवारों की हार के कारणों पर चर्चा की जाएगी। माना जा रहा है कि बैठक में चुनाव के दौरान सामने आए राजनीतिक घटनाक्रम भी चर्चा का हिस्सा हो सकते हैं।

RJD और जन सुराज ने सभापति से की शिकायत

दूसरी ओर, विपक्ष ने भी इस मामले को राजनीतिक मुद्दा बना लिया है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और जन सुराज पार्टी ने बिहार विधान परिषद के कार्यकारी सभापति राम वचन राय से बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज की सदस्यता खत्म करने की मांग की है। दोनों दलों का आरोप है कि निर्दलीय एमएलसी का बीजेपी में शामिल होना असंवैधानिक और गैरकानूनी है। इसी आधार पर उन्होंने कार्यकारी सभापति से शिकायत कर दोनों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। फिलहाल, दो निर्दलीय एमएलसी के बीजेपी को समर्थन देने का मामला एनडीए के भीतर सहयोगी दलों की नाराजगी से लेकर विपक्ष की कानूनी चुनौती तक पहुंच गया है। अब सबकी नजर 5 नवंबर को होने वाली जेडीयू की समीक्षा बैठक और इस मामले में आगे होने वाली राजनीतिक व कानूनी कार्रवाई पर टिकी है।

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