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परिमल नाथवानी के नामांकन पत्र को रद्द कराने की लड़ाई में भी नहीं मिला कांग्रेस को झामुमो, राजद और माले का साथ

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द फॉलोअप, रांची

पिछले दो दिनों में भाजपा समर्थित राज्यसभा के निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी का पर्चा रद्द कराने की लड़ाई में कांग्रेस पूरी तरह अकेली रही। राज्य में कथित इंडिया गठबंधन का बड़ा भाई झामुमो इस लड़ाई से पूरी तरह गायब रहा। राजद और माले रूपी छोटे-छोटे भाइयों ने भी बड़े भाई का ही साथ दिया। परिणाम हुआ कि दो दिनों तक नामांकन पत्र को रद्द कराने की लड़ाई कांग्रेस हार गयी। सबकी सुनने के बाद भी झारखंड विधानसभा के प्रभारी सचिव और राज्यसभा चुनाव के रिटर्निंग अफसर रणजीत कुमार ने नाथवानी के नामांकन पत्र को वैद्य करार दिया। 10 जून की शाम छह बजे रिटर्निंग अफसर ने जैसे ही अपना फैसला सुनाया और उस फैसले की प्रति बोर्ड पर टंगवाया, एक-एक कर निराश और हताश कांग्रेस के विधायक, मंत्री और नेता विधानसभा से निकल गए। हालांकि इसका कांग्रेसियों को पहले से अंदेशा था। यही कारण था कि दिन भर कांग्रेस के विधायक, मंत्री और नेता अपनी ही सरकार को कोसते भी नजर आए। क्योंकि विधानसभा के प्रभारी सचिव रणजीत कुमार भले ही इस वक्त चुनाव में निर्वाचन आयोग के प्रतिनिधि और अफसर हैं, लेकिन मूल रूप से वह विधानसभा, यो कहें राज्य सरकार के अधिकारी हैं।

9 और 10 जून को विधानसभा में परिमल नाथवानी के नामांकन पत्र को रद्द कराने के लिए कांग्रेस द्वारा लड़ी गयी लड़ाई में झामुमो कहीं भी नजर नहीं आया। झामुमो के किसी बड़े नेता ने एक बयान तक देना मुनासिब नहीं समझा। शुरुआत अगर 9 जून से करें तो स्थिति और स्पष्ट होती है। नाथवानी के नामांकन पत्र की त्रुटियों पर आपत्ति केवल कांग्रेस ने की। बड़ा भाई झामुमो के प्रत्याशी या उनके किसी नेता द्वारा भी आपत्ति डाल कर कांग्रेस के आरोप को मजबूती प्रदान की जा सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राजद और माले की भी यही स्थिति रही। जब कांग्रेसी नेता और कार्यकर्ता नाथवानी के नामांकन पत्र को रद्द करने की मांग को लेकर विधानसभा परिसर पहुंचे। घंटों नारेबाजी करते रहे। लेकिन इसमें कांग्रेस को झामुमो, राजद और माले का साथ नहीं मिला। हां देर शाम कांग्रेस कार्यालय में जब इंडिया गठबंधन के नेताओं का प्रेस कंफ्रेंस हुआ तो उसमें झामुमो की भूमिका भी पूरी तरह दिखावटी रही। एक सवाल के जवाब में झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने स्पष्ट भी किया कि उनके 34 विधायक एकजुट हैं, कांग्रेस ने भी दावा किया कि उनके भी 16 इंटैक्ट हैं। लेकिन 56 विधायकों के एकजुटता का दावा इंडिया गठबंधन का बड़ा या छोटा भाई, किसी ने नहीं किया। इससे भी बड़ी बात यह निकली कि इस दिखावटी प्रेस कंफ्रेस में राजद के प्रतिनिधि गायब रहे।

कांग्रेस को क्यों नहीं समझ में आ रहा झामुमो का बॉडी लैंग्वेज

राजनीति में घोषणा और दावे से ज्यादा सहयोगी दलों का व्यवहार और उसके नेताओं का बॉडी लैंग्वेज समन्वय को स्पष्ट करता है। अब कांग्रेस को इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों के नेताओं का बॉडी लैंग्वेज समझ में नहीं आ रहा है या समझ में आने के बाद भी वह कुछ कहने की स्थिति में नहीं है, कुछ करने की स्थिति में नहीं है तो यह कांग्रेस की मजबूरी है। इसी मजबूरी में आज रिटर्निंग अफसर रणजीत कुमार के कार्यालय कक्ष के बाहर कांग्रेस के मंत्रियों, विधायकों का गुस्सा समझ में भी आ रहा था। वे अपनी सरकार पर बरसने के बदले विधानसभा के मार्शल और कर्मियों पर खीझ रहे थे। वित्त एवं संसदीय मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने जब कहा कि विधानसभा के प्रभारी सचिव के कार्यालय को भाजपा का कार्यालय बना देना चाहिए, वित्त मंत्री को यह क्यों नहीं समझ में आ रहा कि यह काम, कर कौन रहा है। अगर उन्हें समझ में आ रहा है तो वे कुछ बोल क्यों नहीं पा रहे हैं। प्रभारी सचिव के कार्यालय कक्ष के बाहर मंत्री दीपिका पांडेय सिंह, शिल्पी नेहा तिर्की और स्वास्थ्य मंत्री भी अपने गुस्से का इजहार किसके विरुद्ध और क्यों कर रहे थे।

कांग्रेस को दूसरे में झांकने से पहले अब अपने गिरेबां में झांकना चाहिए

राज्यसभा चुनाव में क्लाइमेंक्स की ओर बढ़ता जा रहा इंडिया गठबंधन के बीच की दरार, सामान्य और बिल्कुल नया नहीं है। कांग्रेस क्यों नहीं समझ पायी कि असम में उसके विरुद्ध झामुमो का प्रत्याशी देना, किस रणनीति का हिस्सा था। पश्चिम बंगाल के चुनाव में भी टीएमसी के पक्ष में झामुमो का प्रचार क्या संदेश दे दिया था। राज्यसभा चुनाव में प्रत्याशियों की सामूहिक घोषणा करने में कांग्रेस को झामुमो का साथ क्यों नहीं मिला।

दिल्ली में कल कांग्रेस की बैठक कुछ नया संकेत दे सकती है

कांग्रेस ने कल दिल्ली में पार्टी के महासचिव सह प्रदेश के प्रभारियों के अलावा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षों की बैठक बुलायी है। दिन के 11.30 बजे से दिल्ली के इंदिरा भवन में होनेवाली बैठक में पार्टी की रणनीति और प्रभारियों तथा प्रदेश अध्यक्षों के बदलाव पर फैसला हो सकता है। क्योंकि राज्यों से एक एक कर कांग्रेस जिस तरह गायब होती जा रही है, प्रदेश अध्यक्ष व प्रभारियों की भूमिका और रणनीति पार्टी के जनाधार को बढ़ाने में असफल होती जा रही है, उसमें अब आमूलचूल रणनीतिक परिवर्तन करना अपरिहार्य बताया जाने लगा है।

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