द फॉलोअप टीम, साहिबगंज:
झारखंड से हर साल ना जाने कितने ही लोगों की तस्करी की जाती है। झारखंड के मानव तस्करी में ज्यादातर संख्या लड़कियों की होती है। लोग बहला-फुसलाकर लड़कियों को काम दिलाने के लांच में बड़े शहरों में ले जाते हैं और वहां से लड़कियां हमेशा के लिए गायब हो जातीं है। हजारों मामले में लड़कियों का कोई पता नहीं चल पाता है। गरीबी और अभाव में लड़कियां मानव तस्करों के चंगुल में फंस जाती हैं और मजबूरी वश काम के लालच में बड़े शहर चली जातीं हैं।
झारखंड के संताल परगना में पड़ने वाले जिले दुमका, साहिबगंज, गोड्डा और पाकुड़ में मानव तस्करों की जड़ें काफी मजबूत हैं। साहिबगंज जिले के आदिवासी बहुल प्रखंड पतना के कल्याणपुर गांव में ऐसी ही कुछ दर्दभरी कहानी है।

14 साल में बेची गयी थी
लखीपुर गांव के रंजीत सोरेन ने वर्ष 2011 में 14 साल की उम्र में एक नाबालिग को दिल्ली ले जाकर बेच दिया था। लड़की को 5000 रुपये वेतन पर काम दिलाने का प्रलोभन देकर दिल्ली ले जाया गया था। दिल्ली में उसे कई घरों में काम करना पड़ा। अंतिम बार जिस मालिक के पास व काम करने गयी थी उसे कापरे बास्की पर दया आई और उन्होंने कापेर के घर का पता लगाया और उसे साहिबगंज भिजवा दिया। 10 साल बाद कापरे अपने घर पहुंची है।

घर में खुशियां लौटी
पीड़िता के भाई सागेन बास्की का कहना है कि उसकी बहन संथाली भूल गई है। अब वह उसे फिर से संथाली बोलना सीखा रहा है। भाई ने कहा कि बहन के आने से घर में खुशियां लौट आयी हैं लेकिन कापरे के साथ दिल्ली गयी सागर सोरेन की बेटी फुल्लो सोरेन आज तक नहीं लौटी है। मुखिया सालोनी मुर्मू बताती हैं कि कई बच्चियां वर्षों पहले बड़े शहरों में गयीं, लेकिन आज तक नहीं लौटी पाई हैं।