द फॉलोअप डेस्क
सोचिए ज़रा… साढ़े सात रुपये। आज के वक्त में इतने पैसों में शायद एक चॉकलेट भी ढंग की न मिले, लेकिन मुंबई में इसी साढ़े सात रुपये की चोरी का मामला पूरे 50 साल तक कोर्ट में घूमता रहा। पीढ़ियां बदल गईं, सरकारें बदल गईं, कानून बदले, लेकिन केस चलता रहा। आखिरकार अब जाकर कोर्ट ने कहा- बहुत हो गया। यह मामला साल 1977 का है। तब दो अनजान लोगों पर आरोप लगा कि उन्होंने 7.50 रुपये चोरी कर लिए। उस जमाने में यह रकम मामूली नहीं मानी जाती थी, इसलिए केस दर्ज हुआ और पुलिस हरकत में आई। लेकिन कहानी यहीं अटक गई। दोनों आरोपी गायब हो गए, शिकायत करने वाला भी वक्त के साथ लापता हो गया और पुलिस की दशकों की तलाश के बावजूद किसी का कोई सुराग नहीं मिला। फाइल अदालत में पड़ी रही, धूल खाती रही और सिस्टम का बोझ बनती रही। आखिरकार मझगांव कोर्ट की ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास आरती कुलकर्णी ने 14 जनवरी को इस ऐतिहासिक केस पर विराम लगा दिया।

कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि यह मामला लगभग 50 साल पुराना है और बिना किसी प्रोग्रेस के बेवजह पेंडिंग रखा गया है। इतना समय बीत जाने के बाद इसे चलाने का कोई मतलब नहीं बनता। कोर्ट ने IPC की धारा 379 के तहत दर्ज इस चोरी के मामले में दोनों आरोपियों को बरी कर दिया और आदेश दिया कि चोरी की गई 7.50 रुपये की रकम शिकायतकर्ता को लौटा दी जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि अगर शिकायतकर्ता अब नहीं मिलता है, तो अपील की अवधि पूरी होने के बाद यह रकम सरकारी खाते में जमा कर दी जाएगी। सोचिए, आधी सदी बाद भी उन साढ़े सात रुपयों का हिसाब-किताब किया गया। कोर्ट ने यह भी बताया कि चूंकि चोरी की रकम 2,000 रुपये से कम थी, इसलिए यह मामला क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के सेक्शन 260 के तहत “समरी ट्रायल” की श्रेणी में आता था, यानी ऐसे छोटे मामलों का निपटारा जल्दी किया जाना चाहिए था।
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लेकिन जल्दी इंसाफ की जगह यह केस आधी सदी तक फंसा रहा। दिलचस्प बात यह है कि यह अकेला मामला नहीं है। कोर्ट ने इसी तरह के कई पुराने मामलों को हाल के दिनों में बंद किया है, जो सालों से ठंडे बस्ते में पड़े हुए थे और लीगल सिस्टम को जाम कर रहे थे। एक 30 साल पुराने केस में भी कोर्ट ने एक आरोपी को बरी कर दिया, क्योंकि 1995 में चार्जशीट दाखिल होने के बाद से उसका कोई पता नहीं चल पाया था। वहीं 2003 के एक रैश ड्राइविंग मामले में भी ऐसा ही हुआ, क्योंकि न आरोपी मिला, न शिकायतकर्ता और न ही कोई गवाह। कोर्ट ने साफ कहा कि जब आरोपी के मिलने की कोई उम्मीद नहीं है, तो फाइल को अनिश्चित काल तक खुला रखना गलत है। और इस तरह, साढ़े सात रुपये की चोरी का वो केस, जिसने 50 साल तक सिस्टम का वक्त लिया, आखिरकार इतिहास के पन्नों में दफन हो गया।