जीतेंद्र कुमारः
बालू की किल्लत और कालाबाजारी से झारखंड की साढ़े तीन करोड़ जनता त्रस्त है। ऊंचे दाम पर खरीदनें को मजबूर है। यह एक दिन की घटना नहीं है। एक दशक से राज्य में बालू की यही स्थिति है। सुगमता से सरकार द्वारा निर्धारित दर पर बालू मिले, इसकी आशा करते करते जनता थक बैठी है। अब तो सरकार और सत्ताधारी दलों की छोड़ विपक्षी दलों से भी उम्मीद खत्म कर चुकी है। कारण स्पष्ट है। बालू की कालाबाजारी और विपक्ष का मौन साथ साथ जारी है। एक अदने से मुद्दे पर सर पर आसमान उठाने वाले इसके नेता मुंह खोलने के साथ उस पर पट्टी बांध लेते हैं। उससे इस आरोप को बल मिलता है कि बालू की इस चोरी में विपक्ष की भी बराबर की भागीदारी है।

राज्य में बालू के 444 घाट हैं। 290 घाटों की नीलामी हो चुकी। 15 जून से 15 अक्तूबर तक बालू के उठाव पर एनजीटी की रोक रही। लेकिन चार महीने में नीलाम हुए घाटों से बालू के उठाव के लिए जरूरी प्रक्रिया का पालन नहीं हो सका। मात्र 14 घाट से बालू के वैध उठाव का लाइसेंस निर्गत हो सका। बावजूद भाजपा विज्ञप्ति के माध्यम से बयानबाजी तक सीमित है। आजसू मौन है। छोटे-छोटे मुद्दों पर सरकार को कोसने वाले इन दलों के कद्दावर नेता रस्म अदायगी तक सीमित हैं। उन्हें जनता का दर्द नहीं दिखायी दे रहा है। तो, क्या इसके पीछे बालू से निकलने वाले तेल का एक हिस्सा है, जो विपक्षी खाते में भी जाने का आरोप लगता है।
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भाजपा के ही एक बड़े नेता ने समझाया। पूछा। बताया। बालू के घाट 444 हैं। झारखंड में भाजपा के 30 सांगठनिक जिले और 519 मंडल। आजसू के सांगठनिक जिला और मंडल अलग हैं। अगर बालू घाट वाले संबंधित मंडलों को वहां से निकलने वाले अवैध बालू के विरुद्ध आंदोलन के निर्देश दे दिए जाएं तो एक सप्ताह में सरकार को सोचने को विवश किया जा सकता है। विपक्ष छोटी-मोटी जन समस्याओं को लेकर राज्यस्तरीय आंदोलन करता भी रहा है। आगे भी करेगा। लेकिन यहां विपक्ष के मौन का क्या कारण है। यह विपक्ष से राज्य की साढ़े तीन करोड़ आम जनता का सवाल है।
