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आदिवासी एकता महाजुटान रैली : वोट बैंक पर कांग्रेस तो प्रदेश अध्यक्ष पद पर बंधु तिर्की की नजर!

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द फॉलोअप, रांची
झारखंड की राजनीति में एक बार फिर 'आदिवासी' पहचान और 'आदिवासी वोट बैंक' को लेकर नयी घुसपैठ की कोशिश शुरू हो गयी है। राज्य में सत्ता के शीर्ष पर भले ही झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) का चेहरा बैठा हो, लेकिन कांग्रेस अब यह मैसेज देने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती कि सूबे में आदिवासियों की असली पसंद आज भी वही है। यही कारण है कि प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी के राजू भी इस रैली में शामिल होने के लिए एक दिवसीय विशेष दौरे पर 30 अगस्त को रांची आ रहे हैं। इससे राजधानी रांची में आयोजित 'आदिवासी एकता महाजुटान रैली' इसी राजनीतिक खींचतान की एक बानगी बनने वाली है। यह अलग बात है कि इस रैली के आयोजकों ने मुख्यमंत्री को भी आमंत्रित किया है।
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में हैं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री बंधु तिर्की। राजनीति के गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि कांग्रेस ने बेहद सोची-समझी रणनीति के तहत इस आयोजन का पूरा कमान बंधु तिर्की के हाथों में सौंपा है। इसे "सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे" वाली रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस के आधिकारिक बैनर को पीछे रखकर आदिवासी पहचान के बैनर तले इस रैली का आयोजन गठबंधन सहयोगी JMM को अपनी जमीन और ताकत का अहसास कराने का एक सीधा प्रयास है।


बंधु तिर्की की रणनीति और अंदरूनी छटपटाहट
कोर्ट से सजायाफ्ता होने के बाद सीधे तौर पर चुनाव लड़ने की पाबंदियों का सामना कर रहे बंधु तिर्की के लिए यह रैली केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि उनका राजनीतिक भविष्य तय करने वाला 'पावर गेम' माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंधु तिर्की इस विशाल आयोजन के जरिए कांग्रेस नेतृत्व पर प्रदेश अध्यक्ष पद या संगठन में सबसे अहम जिम्मेदारी के लिए दबाव बनाना चाहते हैं। अपना अधिकार जमाना चाहते हैं। बंधु तिर्की पहले ही अपनी बेटी शिल्पी नेहा तिर्की को मांडर विधानसभा सीट से लगातार दो बार जीत दिलाकर (और वर्तमान में उन्हें राज्य सरकार में मंत्री बनवाकर) अपनी राजनीतिक पकड़ साबित कर चुके हैं। अब इस महाजुटान के जरिए वे यह संदेश देना चाहते हैं कि उनका जनाधार सिर्फ मांडर तक सीमित नहीं है, बल्कि वे पूरे झारखंड के आदिवासियों के सबसे बड़े सर्वमान्य चेहरे हैं। तिर्की का यह प्रयास इस बात का भी प्रमाण है कि वे खुद को पार्टी के भीतर कमजोर नहीं दिखना चाहते हैं। वे आलाकमान को यह याद दिलाना चाहते हैं कि राज्य के आदिवासी समाज पर उनकी पकड़ कितनी गहरी है।


ऐतिहासिक भीड़ का दावा और गठबंधन के समीकरण
बंधु तिर्की ने खुले तौर पर दावा किया है कि इस महाजुटान रैली में जुटने वाली भीड़ झारखंड के राजनीतिक इतिहास के सारे रिकॉर्ड तोड़ देगी। अगर उनका यह दावा सच साबित होता है, तो इसके सीधे राजनीतिक मायने निकलेंगे। गठबंधन सरकार में बड़े भाई की भूमिका निभा रही JMM के लिए यह रैली एक स्पष्ट संकेत होगा कि कांग्रेस आदिवासियों के मुद्दे पर पीछे हटने वाली नहीं है। राज्य की राजनीति में अपने अस्तित्व और पकड़ को मजबूती से बनाए रखने के लिए कांग्रेस बंधु तिर्की जैसे जनाधार वाले नेताओं के दम पर आदिवासी इलाकों में अपनी पुरानी जमीन वापस तलाश रही है।
परिसीमन और आदिवासी आरक्षित सीट
झारखंड में परिसीमन (Delimitation) और आदिवासी आरक्षण को लेकर सियासी पारा अपने चरम पर है। पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता बंधु तिर्की ने आगामी परिसीमन में आदिवासी विधानसभा और लोकसभा सीटों के घटने की आशंका को लेकर रांची के मोरहाबादी मैदान में 30 अगस्त को एक विशाल महाजुटान का आह्वान किया है। इस रैली के जरिए जहां एक तरफ कांग्रेस और सहयोगी दल आदिवासियों की जमीन, अधिकार और राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई का संदेश देने की कोशिश करने वाले हैं, वहीं दूसरी तरफ इस आयोजन को लेकर गंभीर सामाजिक और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी शुरू हो गया है। 


परिसीमन का विवाद और आदिवासियों की चिंता
2007-08 के परिसीमन आयोग की सिफारिशों में झारखंड में आदिवासियों के लिए विधानसभा में आरक्षित सीटों को 28 से घटाकर 22 करने का प्रस्ताव था। हालांकि, भारी विरोध के कारण इस फैसले पर 2026 तक रोक लगा दी गई थी। अब 2026 की मियाद समाप्त होने और 2027 के निकट आने के बाद यह माना जा रहा है कि जनगणना आधारित परिसीमन लागू होते ही पुरानी सिफारिशें या जनसंख्या अनुपात के आधार पर आदिवासियों की आरक्षित सीटें स्वतः ही कम हो जाएंगी। 
आदिवासी नेताओं का तर्क: बंधु तिर्की और क्षेत्रीय आदिवासी संगठनों का कहना है कि राज्य निर्माण, विस्थापन, औद्योगीकरण और पलायन की भारी कीमत आदिवासियों ने चुकाई है। ऐसे में केवल जनसंख्या को आधार बनाकर उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी छीनना अनुचित है। 
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और सामाजिक दरार 
बंधु तिर्की का कहना है कि परिसीमन में आदिवासियों की सीटें कम नहीं होनी चाहिए, बल्कि 50% की वृद्धि होनी चाहिए। यह लड़ाई जल, जंगल, जमीन और अस्तित्व की है। वहीं बीजेपी कह रही है कि कांग्रेस आदिवासियों को भ्रमित कर रही है। 2007-08 में कांग्रेस समर्थित UPA सरकार के समय ही सीटें घटाने की सिफारिशें आई थीं। बीजेपी ने संसद में सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव दिया था, तब कांग्रेस ने ही विरोध किया था।  वहीं दूसरी ओर कई आदिवासी सामाजिक संगठन का कहना है कि कि यह रैली आदिवासियों का नहीं, बल्कि मुख्य रूप से धर्मांतरित (ईसाई) आदिवासियों का जुटान है, जिसका इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है।


बीजेपी का कांग्रेस पर तीखा हमला 
बीजेपी नेताओं का कहना है कि चोर अभी दूर है, लेकिन कांग्रेस अभी से शोर मचाकर अपनी पुरानी गलतियों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस झारखंड आंदोलन को दबाने और खरीदने वाली पार्टी रही है तथा वह कभी भी पृथक झारखंड राज्य के पक्ष में नहीं थी। जब एनडीए सरकार ने राज्य में सीटों की संख्या बढ़ाकर आदिवासियों का प्रतिनिधित्व मजबूत करने की कोशिश की, तो कांग्रेस ने सदन में इसका विरोध किया था। परिसीमन के मुद्दे पर मगरमच्छ के आंसू बहाने से पहले कांग्रेस को झारखंड के मूलवासी और आदिवासियों से अपनी पुरानी नीतियों के लिए माफी मांगनी चाहिए। यह मुद्दा अब केवल चुनाव या सीटों के पुनर्गठन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह आदिवासी पहचान, सरना बनाम ईसाई धर्मान्तरण विवाद और झारखंड के भावी राजनीतिक नेतृत्व की दिशा तय करने वाला एक बड़ा राजनीतिक संग्राम बन चुका है।
क्या रंग लाएगा तिर्की का यह दांव? आदिवासी एकता के नाम पर शुरू हुई यह कवायद सिर्फ एक सामाजिक जमावड़ा नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक इरादों का नतीजा है। अब देखना यह होगा कि इस महाजुटान से जुटने वाला जनसैलाब बंधु तिर्की को कांग्रेस के भीतर किस ऊंचाई पर ले जाता है और क्या वे JMM के 'आदिवासी कार्ड' के आगे कांग्रेस का परचम लहराने में कामयाब हो पाते हैं या नहीं।

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