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नाची से बाची जनजातीय महोत्सव : 23–24 दिसंबर को रांची में जुटेंगे जनजातीय अगुआ, ग्रामसभा और संस्कृति के स्वर

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रांची
जनजातीय स्वशासन की परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और सामुदायिक लोकतंत्र को नए सिरे से मजबूत करने के उद्देश्य से 23 और 24 दिसंबर 2025 को आई हाउस, रांची में जनजातीय स्वशासन महोत्सव ‘नाची से बाची’ का आयोजन किया जा रहा है। यह महोत्सव केवल एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे जनजातीय स्वशासन के जीवन-दर्शन को लोकतांत्रिक संवाद के केंद्र में लाने का प्रयास है।
‘नाची से बाची’ का अर्थ है—नृत्य में बसती जीवन की लय, समुदाय की धड़कन और सामूहिक अस्तित्व की जड़ें। इसी विचार के साथ यह आयोजन भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची में निहित समुदाय-केंद्रित शासन व्यवस्था, ग्रामसभा की भूमिका और परंपरागत स्वशासन प्रणालियों को समझने व सशक्त करने पर केंद्रित रहेगा।


आयोजकों के अनुसार, परंपरागत ग्रामसभा जल, जंगल और जमीन पर सामुदायिक अधिकारों की रक्षा करती रही है और सामाजिक न्याय को रिश्तों, मर्यादाओं और सहमति के आधार पर संचालित करती आई है। लेकिन समय के साथ संवाद की कमी और सांस्कृतिक चेतना के क्षरण से यह व्यवस्था कमजोर पड़ी है। ऐसे में यह महोत्सव कानूनी चर्चा के साथ सांस्कृतिक पुनर्जागरण को जोड़ते हुए ग्रामसभा को फिर से सामुदायिक जीवन का केंद्र बनाने की दिशा तय करेगा।
महोत्सव के दौरान परंपरागत स्वशासन प्रणालियों पर आधारित प्रदर्शनी, ग्रामसभा और पारंपरिक अगुवाओं की भूमिका को दर्शाने वाले दृश्यात्मक प्रस्तुतिकरण, सांस्कृतिक कार्यक्रम, आदिवासी नृत्य-गीत, लोककथाएं, खानपान स्टॉल और हस्तशिल्प प्रदर्शनी आयोजित की जाएंगी। इसके साथ ही स्वशासन, संवैधानिक प्रावधान, देशज ज्ञान, जलवायु परिवर्तन, जनजातीय साहित्य और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग जैसे विषयों पर सेमिनार और संवाद सत्र होंगे।


आदिवासी साहित्यकारों और फिल्म निर्माताओं के साथ संवाद, जनजातीय जीवन और स्वशासन पर आधारित लघु फिल्मों व वृत्तचित्रों का प्रदर्शन तथा ‘ग्रामसभा से जनतंत्र तक’ विषय पर पुस्तक प्रदर्शनी भी महोत्सव का हिस्सा होगी। इस आयोजन में मांझी, मानकी, मुंडा, परगनैत जैसे परंपरागत अगुआ, पंचायत प्रतिनिधि, सिविल सोसाइटी, शिक्षाविद, शोधकर्ता, कलाकार, साहित्यकार, युवा प्रतिनिधि और नीति-निर्माता भाग लेंगे। पंचायत राज विभाग, झारखंड सरकार इस महोत्सव का मुख्य आयोजक है।
महोत्सव का संदेश स्पष्ट है—जब आदिवासी नाचता है, वह केवल उत्सव नहीं मनाता, बल्कि अपनी स्मृति, अधिकार और स्वशासन को फिर से जीवंत करता है। नाची से बाची, और बाची पूरे स्वाभिमान के साथ आगे बढ़ती है।

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