द फॉलोअप डेस्क
बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम ने राजद के साथ साथ कांग्रेस को भी गंभीर चोट दिया है। उसके कार्यकर्ता और नेताओं का मनोबल तोड़ दिया है। भाजपा के कांग्रेस मुक्त भारत के नारे को बल मिला है। पहले से ही हिंदी भाषी बेल्ट के साथ साथ बंगाल, उड़ीसा व महाराष्ट्र के अलावा कर्नाटक जैसे दक्षिण के राज्यों में कांग्रेस की हालत पतली हो चुकी है। झारखंड के 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को थोड़ा इसलिए बल मिला, क्योंकि सहारा देनेवाला झामुमो खुद मजबूत था। बिहार में मुख्य सहयोगी राजद खुद कमजोर हुआ तो कांग्रेस को पीलिया ही मार गया है। न कांग्रेस का वहां जनाधार बचा और आधार। कांग्रेस का अब न कोई कोर वोटर रहा और न समर्थक कोर जातियां। जब कांग्रेस मजबूत थी, तीन जातियां उसके कोर वोटर थे। फॉरवर्ड, दलित और अल्पसंख्यक। हिंदी भाषी इलाकों में फॉरवर्ड का बड़ा चंक एनडीए के साथ हो गया है। दलित अलग अलग राज्यों में अलग अलग दलों के साथ हो गए हैं। अल्पसंख्यक क्षेत्रीय दलों के साथ तेजी से जा रहे हैं। यूपी, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल इसके प्रत्यक्ष उदारण हैं। झारखंड में भी अल्पसंख्यक झामुमो की ओर रुख कर चुका है। इस लिहाज से राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर मंथन के अलावा झारखंड में पार्टी की मजबूती के लिए नये सिरे से सोचने-विचारने का समय आ गया है। देर हुई तो कांग्रेस मुक्त झारखंड का सपना सच होने के कगार पर पहुंच सकता है।

कांग्रेस की कमजोरी के कारक
झारखंड के नजरिए से देखें तो झारखंड में कांग्रेस की मजबूती के पीछे झामुमो का सहयोग और समर्थन साफ साफ समझा और महसूस किया जा सकता है। यह भी सच है कि कांग्रेस के कारण झामुमो को भी मजबूती मिलती है। लेकिन झारखंड में अल्पसंख्यक मतों पर झामुमो की बढ़ती पकड़, आनेवाले दिनों में उसे इस वोट बैंक से भी हाथ धोने का इशारा कर रहा है। कांग्रेस के ही बड़े नेता गिनाते हैं। बिहार हो या झारखंड, दक्षिण के राज्यों के ऐसे नेताओं को कांग्रेस प्रभारी बना रहा है, जिन्हें न तो यहां के सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषायी समझ है। इस कारण उनका यहां की जनता के साथ बेहतर संवाद ही स्थापित नहीं हो रहा है। जिसके परिणामस्वरूप वे यहां की जनता और मतदाताओं पर कोई छाप नहीं छोड़ पाते। अपने पाले में लाने में लगातार विफल होते जाते। जमीनी हकीकत से दूर रहने वाले ये नेता ड्राइंग रुम में बैठ कर दूसरे दलों के सहयोग से रेस जीतने के विमर्श तक सीमित हो जा रहे हैं। झारखंड में देखें तो अल्पसंख्यकों के अलावा आदिवासी मतों पर झामुमो का कब्जा हो चुका है। भले ही केशव महतो कमलेश, प्रदेश कांग्रेस के सर्वेसर्वा बनाए गए, लेकिन वे इस समुदाय में अपनी कोई विशेष पकड़ नहीं बना पाए। कांग्रेस की कमजोरी का प्रत्यक्ष प्रमाण यह भी है कि बिहार में राजद ने इस बार 2020 की तुलना में कम सीटें दी। झारखंड के 2024 के विधानसभा चुनाव में भी झामुमो ने इसी तरह 2019 की तुलना में कांग्रेस से कुछ सीटें से छीन ली थी।

वोट चोरी और एसआईआर का मुद्दा बिहार में साफ
बिहार में कांग्रेस ने वोट चोरी और एसआईआर का मुद्दा उठाया था। राहुल गांधी ने इसे राष्ट्रीय अभियान का स्वरूप देने की पूरी कोशिश की थी। राहुल की इच्छा को देखते हुए झारखंड कांग्रेस के प्रभारी और स्थानीय नेता भी इसी रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं। भविष्य में होनेवाले एसआईआर को लेकर झारखंड कांग्रेस यहां दस दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन कर रही। अब सवाल उठता है कि जिस मुद्दे को बिहार की जनता ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया, उसी मुद्दे को लेकर हम आगे बढ़ रहे हैं। फिर परिणाम की कल्पना स्वतः समझी जा सकती है।
महागठबंधन में कांग्रेस की विश्वसनीयता पर भी संकट
महागठबंधन में राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को सबसे बड़ा दल माना गया है। लेकिन महागठबंधन में शामिल क्षेत्रीय दलों का विश्वास जीतने में वह फिसलती रही है। झारखंड में लोकसभा और विधानसभा चुनाव के दौरान झामुमो ने राजद को सम्मान जनक सीटें दी। लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव में राजद ने झामुमो के साथ विश्वासघात कर दिया। महागठबंधन के प्रमुख सहयोगी दल झामुमो को एक भी सीट नहीं दी गयी। इस मुद्दे पर कांग्रेस चुप्पी साध ली। अगर झामुमो को भी महागठबंधन का घटक बनाए रखा गया होता तो संभव था कि हेमंत और कल्पना के चुनाव प्रचार का वहां लाभ मिलता। लेकिन इन सब छोटी-छोटी बातों पर कांग्रेस में कोई सोचने वाला नहीं है।

बिहार ने संदेश दिया, अब विकास ही मुद्दा
घोर जातिवादी राजनीति का उर्वरा भूमि रही बिहार ने विधानसभा चुनाव परिणाम के माध्यम से यह संदेश दिया है कि अब विकास भी मुद्दा। बताते हैं कि लालू प्रसाद के कार्यकाल में बिहार में सामाजिक बदलाव जरूर हुए, लेकिन विकास पीछे था। बावजूद लालू प्रसाद यादव लगभग 15 साल तक बिहार में राज कर सके, क्योंकि वह सामाजिक बदलाव का समय था। अब विकास का समय आ गया है। लगभग 20 वर्ष तक बिहार में राज करनेवाले नीतीश कुमार को वहां की जनता ने इस बार फिर पांच वर्षों के लिए मैंडेट दिया है। इसके मूल में फ्री बी, महिलाओं के खाते में भेजी गयी 10-10 हजार रुपए की राशि, वृद्धावस्था पेंशन की राशि में बढोत्तरी, 125 यूनिट मुफ्त बिजली की योजनाएं प्रभावी रही। लेकिन इस पर नीतीश कुमार के सुशासन बाबू की छवि और उनके द्वारा बिहार में किए गए विकास के काम सब मुद्दों पर भारी पड़े हैं। इसलिए जाति वादी राजनीति, सांप्रदायिक मुद्दों के अलावा अब विकास के मुद्दे को भी प्राथमिकता में लेने का संदेश दे रहा है। कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी को झारखंड के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर सोचने को बाध्य करता है।
.jpeg)