द फॉलोअप डेस्क
राज्य सरकार ने विधानसभा से पारित झारखंड राज्य विश्वविद्यालय विधेयक 2025 को वापस लेते हुए मंगलवार को नये स्वरूप में झारखंड राज्य विश्वविद्यालय विधेयक 2026 को पारित करा लिया। इस विधेयक का मूल तत्व यह है कि अब राज्य के सरकारी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के चयन का संपूर्ण अधिकार राज्यपाल से छीन कर संयुक्त रूप से राज्यपाल और मुख्यमंत्री को सौंप दिया गया है। विधेयक में स्पष्ट किया गया है कि कुलपति का चयन कुलाधिपति एवं मुख्यमंत्री संयुक्त रूप से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा निर्धारित पात्रता और मानदंडों के अनुसार करेंगे। कुलपति के चयन के लिए एक खोज समिति होगी। इसमें कुलाधिपति द्वारा नामित प्रतिष्ठित शिक्षाविद् इसके अध्यक्ष होंगे। राज्य सरकार द्वारा नामित संसद के अधिनियम द्वारा स्थापित उच्च राष्ट्रीय प्रतिष्ठाप्राप्त संस्था या विश्वविद्यालय का निदेशक या प्रमुख और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का प्रतिनिधि इसके सदस्य होंगे। इसके अलावा उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग का अपर मुख्य सचिव या प्रधान सचिव या सचिव भी इसके सदस्य होंगे।
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संबंधित विश्वविद्यालय के कुल सचिव खोज समिति के सचिव होंगे। लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं होगा। समिति में नामित किए गए सदस्य वैसे व्यक्ति होंगे जो कभी भी संबंधित विश्वविद्यालय अथवा उस विश्वविद्यालय के किसी महाविद्यालय अथवा किसी मान्यता प्राप्त संस्था से संबधित नहीं रहे होंगे। मताधिकार प्राप्त न्यूनतम तीन सदस्यों की उपस्थिति के बिना समिति की बैठक नहीं हो सकेगी। समिति कुलपति की नियुक्ति के लिए तीन से पांच सर्वाधिक योग्य व्यक्तियों के नामों का पैनल बंद लिफाफे में प्रस्तुत करेगी। अनुशंसित व्यक्तियों के नाम वर्णमाला क्रम में ह ोंगे, उनमें किसी प्रकार की वरीयता नहीं दर्शायी जाएगी।अगर पैनल तैयार करते समय यदि समिति के सदस्यों के बीच समानता होती है तो समिति के अध्यक्ष को निर्णायक मत देने का अधिकार होगा। कुलाधिपति एवं मुख्यमंत्री संयुक्त रूप से पैनल में अनुसंसित व्यक्तियों में से किसी एक को कुलपति के रूप में चयन कर सकेंगे। उसके बाद कुलाधिपति द्वारा कुलपति की नियुक्ति की जाएगी।अगर अनुशंसित व्यक्तियों में से किसी को भी चयनित नहीं करेंगे तो वह या तो उसी समिति से अथवा इस उद्देश् से गठित नयी समिति से एक नया पैनल मांग सकते हैं।
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विधेयक में त्याग पत्र, असामयिक निधन, बीमारी या किन्हीं अन्य कारणों से कुलपति का पद रिक्त होता है तो कुलाधिपति मुख्यमंत्री के परामर्श से किसी उपयुक्त व्यक्ति का चयन प्रभारी कुलपति के रूप में कर सकते हैं। लेकिन प्रभारी कुलपति का कार्यकाल अधिकतम 12 महीने होगा। कुलपति पर आरोप लगने पर उसकी जांच के बाद उन्हें पद से हटाने का निर्णय कुलाधिपति और मुख्यमंत्री संयुक्त रूप से करेंगे। इसी तरह से विधेयक में प्रति कुलपति को भी हटाने का निर्णय कुलाधिपति और मुख्यमंत्री द्वारा संयुक्त रूप से लिए जाने का प्रावधान किया गया है। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि क्या कुलाधिपति और मुख्यमंत्री के बीच इतना बेहतर समन्वय की संभावना दिखती है, जिसमें राज्य के दोनों संवैधानिक प्रमुख संयुक्त रूप से उच्च शिक्षा हित में, राज्य हित में सहमति से निर्णय लेंगे।

क्योंकि यहां बताने की जरूरत नहीं कि केंद्र और राज्य में अलग अलग दलों या गठबंधनों की सरकार होने पर आजादी के बाद से ही अक्सर राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच तरकार की स्थिति देखी जाती रही है। इस विषम परिस्थिति में कुलपतियों की नियुक्ति, कुलपतियों और प्रति कुलपतियों को पद हटाने को लेकर उच्च शिक्षा के शीर्ष स्तर पर टकराव से बचने का कोई प्रावधान विधेयक में कहीं नहीं दिखता है। उदाहरण के रूप में खोज समिति द्वारा अनुशंसित नामों पर अगर राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच सहमति नहीं बनती है, बार बार नहीं बनती है तो आगे क्या होगा। टकराव के कई और भी बिंदु विधेयक में दिखायी पड़ते हैं। विधेयक में प्रावधान किया गया है कि यदि कोई विश्वविद्यालय अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करता है तो राज्य सरकार उसे निर्देश दे सकती है और उन निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होगा। अब यहां भी राज्यपाल और सरकार के बीच टकराव के संकेत स्पष्ट हैं।

वैसे विधेयक में सीनेट की बैठक को वर्ष में दो बार किया जाना अनिवार्य किया गया है। परीक्षा, प्रवेश और छात्रों से जुड़े कई अन्य विषयों को पारदर्शी बनाया गया है। विधेयक को पहले तो भाजपा विधायक राज सिन्हा और अमित यादव ने प्रवर समिति को भेजने की मांग की। लेकिन उनकी मांग ध्वनि मत से अस्वीकृत कर दिया गया। इन दोनों विधायकों के अलावा जेएलकेएम के विधायक जयराम महतो ने भी कई संशोधन भी लाए। लेकिन विभागीय मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने बिंदुवार स्पष्ट किया कि उनके अधिकतर संशोधनों को पहले ही विधेयक में समाहित किया जा चुका है। कुछ अन्य आशंकाएं दिखती है, उसका बाद में बनने वाली नियमावली में प्रावधान किया जाएगा। उसका रास्ता निकाला जाएगा। इसलिए फिलहाल विधेयक में किसी प्रकार के संशोधन की जरूरत नहीं है।
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