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सत्ता और सचिवालय का सच : सचिवालय सेवा संघ को दिखाया जाने लगा है औकात

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जीतेंद्र कुमार
पुरानी कहावत है। पत्रकारों और सचिवालय कर्मियों का आंदोलन बहुत सफल नहीं रहा है। क्योंकि सचिवालयकर्मी कभी भी मजबूती से एकजुट नहीं रहे हैं। उनकी गीदड़ भभकी को सरकार और शीर्ष अधिकारी बखूबी समझते और जानते हैं। वे इस गीदड़ भभकी का इलाज भी जानते हैं। अब कुछ वैसा ही देखने को मिल रहा है। झारखंड सचिवालय सेवा संघ का चुनाव ठीक एक साल पहले एक जून 2025 को संपन्न हुआ था। इसके पदाधिकारी लगभग 11 महीने तक दो ही काम किए थे। पहला चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री से मिल कर शिष्टाचार भेंट। पुष्प गुच्छ देकर मुख्यमंत्री का सम्मान और परिचय करने की परंपरागत की रश्म अदायगी। दूसरा अगस्त 2025 में दिशोम गुरुजी के असामयिक निधन के बाद उनके नाम प्रोजेक्ट भवन परिसर में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के हाथों पौधा रोपण। हालांकि अब वह पौधा भी नहीं दिखता। 


लेकिन सचिवालय सेवा के कर्मियों के कैडर रिव्यू का सवाल खड़ा हुआ तो संघ के पदाधिकारियों का गुस्सा भड़कने लगा। आंदोलन की रूपरेखा तैयार होने लगी। प्रोजेक्ट भवन में मानव श्रृंखला बना कर कैडर रिव्यू का विरोध किया गया। मंत्री सुदिव्य सोनू और इरफान अंसारी की मध्यस्थता में कुछ बातों पर सहमति बनी। सदस्य राजस्व पर्षद की अध्यक्षता में एक कमेटी बनी। उसमें कार्मिक, वित्त और भू-राजस्व के सचिव को शामिल किया गया। संघ के दबाव में इसके अध्यक्ष और महासचिव को भी रिव्यू कमेटी में रखा गया। लेकिन दिलचस्प खेल यहीं से प्रारंभ हुआ। पहले तो कार्मिक ने रिव्यू कमेटी में संघ के सदस्यों को रखे जाने संबंधी अधिसूचना जारी करने में ही आनाकानी की। बाद में जब रिव्यू कमेटी की बैठकें शुरू हुई तो संघ के पदाधिकारियों को औकात दिखाने का सिलसिला प्रारंभ हो गया है।


राजस्व पर्षद की अध्यक्षता में जब पहली बैठक हुई तो उसमें संघ के पदाधिकारियों को बुलाया ही नहीं गया। अंदर रिव्यू कमेटी में शामिल शीर्ष पदाधिकारी बैठक करते रहे, विचार-विनमय करते रहे, संघ के पदाधिकारी बाहर खड़े रहे। जब बैठक संपन्न हो गयी तो संघ के पदाधिकारियों को बुला कर अपने विचार व्यक्त करने की औपचारिकता पूरा करने का निदेश दिया गया। बताते हैं कि दूसरी बैठक हुई तो उस दिन संघ के महासचिव बीमार पड़ गए थे। उन्होंने अपना प्रतिनिधि भेजा। लेकिन प्रतिनिधि को बैठक में शामिल होने की अनुमति ही नहीं दी गयी। जबकि उसी बैठक में राजस्व पर्षद के सचिव द्वारा मनोनीत उनके प्रतिनिधि को शामिल होने की अनुमति दी गयी। इतना ही नहीं संघ के पदाधिकारियों की मांगों और तर्कों को भी बगैर गंभीरता से लेते हुए अन्य राज्यों की व्यवस्था जानने का निर्णय ले लिया गया। जबकि अन्य राज्यों में सचिवालयकर्मियों का पदनाम, वेतनमान और एपेक्स पद, झारखंड से कोई मेल नहीं खाता। संघ के पदाधिकारी केंद्र सरकार और बिहार के अनुरूप कैडर रिव्यू का आधार तय करने पर जोर देते रहे, लेकिन वह इस कान से सुना गया और दूसरे कान से निकाल दिया गया। रिव्यू कमेटी की अगली बैठक कब होगी, यह भी स्पष्ट नहीं किया गया। अब देखना है कि संघ का जोश हिलोरें मारता है या ठंढ़ा पड़ जाता है।

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