जीतेंद्र कुमार
झारखंड स्टेट फार्मेसी काउंसिल में जारी अनियमितता, भ्रष्टाचार और नियम विरुद्ध नियुक्तियों ने स्वास्थ्य परिवार कल्याण एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग की कलई खोल कर रख दी है। यहां प्रशांत कुमार पांडेय अप्रैल 2025 से अवैध ढंग से निबंधक सह सचिव के पद पर कार्यरत हैं। बगैर वेतन के ये काउंसिल में सेवा देते जा रहे हैं। डी फार्मा के कॉलेजों की मान्यता देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला यह सख्स ही इन कॉलेजों की अनियमितताओं की भी जांच कर रहा है। यहां काउंसिल के नोमिनेटेड सदस्यों की विभाग बजाप्ता नोटिफिकेशन जारी करता है। लेकिन नियमावली के विरुद्ध काउंसिल के निर्वाचित सदस्यों का स्वास्थ्य विभाग कोई अधिसूचना जारी नहीं करता। पांडेय के विरुद्ध की गयी जांच से संबंधित संचिका स्वास्थ्य विभाग में दबा दी गयी है। इतना ही नहीं झारखंड देश का पहला ऐसा राज्य है जहां एक ही तरह के पाठ्यक्रमों की परीक्षा अलग अलग संस्थान ले रहा है। उदाहरण के रूप में राजकीय फार्मेसी संस्थान बरियातु में डी फार्मा की पढ़ाई करने वाले छात्रों की परीक्षा झारखंड टेक्निकल यूनिवर्सिटी लेता है वहीं अनियमित और फर्जी तरीके से संचालित डी फार्मा के कॉलेजों की परीक्षा डिप्लोमा इन पार्मेसी परीक्षा समिति लेती है। यह सब तब हो रहा है जब ये सारे तथ्य और अनियमितता विभागीय मंत्री, विभागीय सचिव से लेकर अन्य वरीय पदाधिकारियों के पूरे संज्ञान में हैं। क्योंकि तथ्यों के साथ इन्हें समय समय पर प्रमाणिक तथ्यों के साथ गड़बड़ियों और अनियमितताओं से अवगत कराया गया है। विधायक सरयू राय ने भी विधानसभा में मुद्दे को तथ्यात्मक ढंग से उठाया। लेकिन कुछ नहीं हुआ।

अनाधिकृत रूप से कार्यरत हैं प्रशांत कुमार पांडेय
प्रशांत कुमार पांडेय के फार्मेसी काउंसिल के निबंधक सह सचिव पद पर नियुक्ति संबंधी शिकायतों के बाद विभाग के अपर मुख्य सचिव अजय कुमार सिंह के आदेश से औपबंधिक रूप से आदेश निर्गत की तिथि छह महीने के लिए निबंधक सह सचिव के पद का प्रभार दिया गया था। इस संबंध में 14 अक्तूबर 2024 को विभाग द्वारा आदेश जारी किया गया। छह महीने का औपबंधिक प्रभार पूरा हो जाने के बाद भी वह अप्रैल 2025 से इस पद पर बने हुए हैं। बगैर वेतन का काम करते जा रहे हैं।

पांडेय के फर्जी रजिस्ट्रेशन की जांच नहीं कराया विभाग
प्रशांत कुमार पांडेय के विरुद्ध आरोप है कि उन्होंने झारखंड में 22 मई 2018 को अपना फार्मासिस्ट का रजिस्ट्रेशन(00083) कराया। वहीं 8 मई 2005 में उन्होंने बिहार में अपना रजिस्ट्रेशन (20670) कराया था। 31 फरवरी 2017 तक उन्होंने बिहार में अपने रजिस्ट्रेशन का रिन्युअल कराया। बिहार से उनके द्वारा ली गयी बी फार्मा की डिग्री पर भी सवाल है। क्योंकि 2001 में बी फार्मा की परीक्षा पास करने के चार साल बाद उन्होंने 2005 में अपना रजिस्ट्रेशन कराया था। जानकारों का कहना है कि बी फार्मा की इतनी अधिक मांग है कि परीक्षा पास करते हुए वे रजिस्ट्रेशन करा लेते हैं। लेकिन चार साल बाद रजिस्ट्रेशन कराना, शंका पैदा करता है। मुख्यमंत्री, राज्यपाल,स्वास्थ्य मंत्री, मुख्य सचिव, स्वास्थ्य सचिव से लेकर अन्य कई एजेंसियों और संस्थाओं को लिखे गये पत्रों में बताया गया है कि जब राहुल कुमार की निबंधक सह सचिव के पद पर नियुक्ति हुई तो स्वास्थ्य विभाग ने जांच करायी थी। निदेशक स्वास्थ्य सेवाएं की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया था। इसमें ड्रग कंट्रोलर और विभाग के एक अवर सचिव शामिल थे। जांच में राहुल कुमार की नियुक्ति गलत पायी गयी और उन्हें हटाना पड़ा। लेकिन प्रशांत कुमार पांडेय के विरुद्ध लगे दर्जनों आरोपों के बाद उनकी नियुक्ति और शैक्षणिक प्रमाण पत्रों की कभी जांच नहीं करायी गयी।

जांच कमेटी के गठन पर भी सवाल
राज्य में संचालित डी फार्मा और बी फार्मा के संस्थाओं को गलत ढंग से लेटर ऑफ कंसेंट तथा एनओसी दिए जाने, पाठ्यक्रमों के संचालन में भारी अनियमितता बरते जाने के आरोप हैं। लगातार आरोपों के बाद स्वास्थ्य विभाग ने एक अगस्त 2025 को विभाग के उप सचिव रंजीत लोहरा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी का गठन कर दिया। इस कमेटी में अवर सचिव धीरंजन प्रसाद शर्मा और निबंधक सह सचिव प्रशांत कुमार पांडेय को भी रखा गया। अब दिलचस्प यह है कि डी फार्मा के संस्थानों को नियम विरुद्ध तरीके से लेटर ऑफ कंसेंट या एनओसी देनेवाले प्रशांत कुमार पांडेय ही उन संस्थानों की जांच कर रहे हैं। मालूम हो कि डी फार्मा के 70 कॉलेजों की जांच हो चुकी है, जिसमें 34 की मान्यता रद्द करने और 36 को शोकॉउज करने की कमेटी ने अनुशंसा की है।

काउंसिल के कंप्युटर ऑपरेटर सचिन चतुर्वेदी पर भी सवाल
सचिन चतुर्वेदी झारखंड राज्य स्टेट काउंसिल में कंप्युटर ऑपरेटर के पद पर हैं। वह काउंसिल के निबंधक सह सचिव प्रशांत कुमार पांडेय के ब्लड रिलेशन हैं। उनकी नियुक्ति पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। उनसे संबंधित शिकायत में कहा गया है कि वह प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि केंद्र अरेराज (बिहार) में कार्यरत रहते हुए यहां भी कंप्युटर ऑपरेटर के पद पर नियुक्त हो गए।

फार्मेसी काउंसिल की जांच रिपोर्ट, जिसे दबा दी गयी है
झारखंड स्टेट फार्मेसी काउंसिल के भ्रष्टाचार, अनियमितता और भ्रष्टाचार को लेकर स्वास्थ्य विभाग ने दिसंबर 2025 में ड्रग निदेशक की अनुशंसा पर जांच भी करायी थी। जांच में फार्मेसी काउंसिल पर लगे आरोप सही पाए गए। भ्रष्टाचार की कहानी इतनी तथ्यात्मक मिली कि एफआईआर करने की भी अनुशंसा तक की गयी। लेकिन उस जांच रिपोर्ट को विभाग में दबा दिया गया और दूसरी जांच कराने की अनुशंसा कर दी गयी। दूसरी जांच में भी आरोपों को सही पाया गया। लेकिन उस रिपोर्ट पर विभाग ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की।
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डी फार्मा के परीक्षार्थियों की सेंट्रलाइज्ड कॉपी की जांच कराने की मांग
फार्मेसी काउंसिल के जानकारों के अनुसार पिछले दिनों हुई परीक्षा में 5568 छात्र शामिल हुए। इनमें 1500-2000 छात्र वैसे थे, जो राज्य के 150 से अधिक डी फार्मा के कॉलेजों में खाली रह गयी सीटों के विरुद्ध अंतिम समय में नामांकन लेकर परीक्षा में शामिल कराए गए। सूत्रों का कहना है कि दिलचस्प यह है कि डी फार्मा के इन कॉलेजों की परीक्षा हमेशा वाईबीएन यूनिवर्सिटी में ही आयोजित करायी जाती है। यह भी जांच का विषय है। फिर कॉपी जांच बीआईटी मेसरा या राजकीय फार्मेसी संस्था बरियातु के प्राध्यापकों के माध्यम से नहीं करा कर सब कुछ सेटिंग पर होता है। अगर पिछले वर्ष हुई परीक्षा की उच्चस्तरीय जांच करा ली जाए तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। मुश्किल से 10-15 फीसदी छात्र भी पास नहीं कर पाएंगे।
