द फॉलोअप डेस्क
झारखंड विधानसभा में वित्त मंत्री राधाकृ्ष्ण किशोर ने सोमवार को मार्च 2023 को समाप्त हुए वर्ष के लिए राज्य के सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों पर सीएजी की रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट में झारखंड भवन निर्माण निगम लिमिटेड (जेबीसीएनएल), झारखंड राज्य खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम लिमिटेड, झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड और झारखंड ऊर्जा उत्पादन निगम लिमिटेड के कार्य कलापों और उसकी अनियमितता और भ्रष्टाचार का विस्तार से जिक्र किया गया है। भवन निर्माण निगम लिमिटेड के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि इसका गठन 2015 में किया गया। कंपनी ने नवंबर 2015 से मार्च 2023 तक 14020 करोड़ की 1328 कार्य परियोजनाएं शुरू की। इसमें 726 कार्य मात्र 55 फीसदी पूरे हुए, 272 कार्य प्रारंभिक अवस्था में थे और 112 कार्य भूमि की अनुपलब्धता और सार्वजनिक बाधाओं से रोक दिए गए। निगम ने 24 कार्यों के निष्पादन के लिए मिली राशि राशि को संबंधित विभागों को वापस नहीं किया। इस राशि को चार से सात साल तक पीएल एकाउंट में रखा गया। सबसे दिलचस्प रूप से रिपोर्ट में कहा गया है कि 20 ऐसी कंपनियों और ठेकेदारों को काम दिए गए जो अयोग्य थे।
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इतना ही नहीं 2018-19 से 2022-23 के दौरान निगम ने न तो कॉरपोरेट बजट तैयार किया और ना ही डीपीआर की समीक्षा की। कार्य प्रगति की निगरानी के लिए भी कोई तकनीकी समिति गठित नहीं की गयी। वास्तविक स्थल और स्थितियों पर आधारित विस्तृत अनुमान के बना इसने सलाहकारों द्वारा तैयार किए गए मॉडल अनुमानों के आधार पर परियोजनाओं का क्रियान्वयन शुरू कर दिया गया। न जमीन की उपलब्धता देखी गयी। इस कारण 102 करोड़ के 35 कार्य अधूरे रह गए। रिपोर्ट में कहा गया है कि हाईटेंशन संचरण लाइन के आसपास के भवनों के निर्माण का भी प्रतिकूल असर पड़ा। इस कारण एक निर्मित डिग्री कॉलेज अनुपयोगी पड़ा है, जिस पर 12 करोड़ की राशि खर्च हो चुकी है। निगम का हाल यह था कि 88 फीसदी सहायक अभियंताओं और 75 फीसदी कनीय अभियंताओं के पद रिक्त रहे।
सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 206 कार्यों की जांच की गया। उसमें अनुबंध प्रबंधन की कमियां पायी गयी। टेंडर डालनेवालों को पर्याप्त समय नहीं दिया गया। पारदर्शिता की घोर कमी दिखी। अनुबंधन के निष्पादन में भारी विलंब, अनियमित भुगतान, अनुपूरक अनुबंध, अनुबंध में अनियमितता और कार्यों को बीमा द्वारा कवर नहीं किया गया। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय के स्थायी परिसर का निर्माण जून 2018 में प्रारंभ हुआ, मई 2020 में पूरा होना था, लेकिन 12 करोड़ से अधिक राशि खर्च होने के बाद भी जुलाई 2021 तक अधूरा रहा।
भवन निर्माण निगम की कुछ प्रमुख अनियमितता, भ्रष्टाचार और लापरवाही के नमूने
-कार्य की महत्ता और उसकी व्यापकता को देखते हुए 56 ऐसे टेंडर सामने आए, जिसमें टेंडर डालने वालों को चार से लेकर 17 दिन का कम समय दिया गया
-टेंडर डालनेवाली 20 कंपनियों की क्षमता का गलत आकलन कर टेंडर फाइनल किया गया
-निगम ने राज्य के चार मेडिकल कॉलेजों के बारे में सीएजी को उसके उपकरणों, कर्मियों और अन्य चीजों की जानकारी नहीं दी
-36 ऐसे काम सामने आए, जिसका टेंडर फाइनल होने के बाद एग्रीमेंट करने में महीना, दो महीना से लेकर डेढ़ साल तक का विलंब किया गया
-निगम ने दिल्ली की दर पर 25 कंपनियों को श्रमिक घटक का भुगतान किया
-छह रुके हुए काम पर करोड़ों रुपए का निष्फल खर्च किया गया
