गिरिडीह:
Girdih News: आधुनिक दौर में जहां एंबुलेंस को मरीजों के लिए 'लाइफलाइन' माना जाता है, वहीं गिरिडीह के तीनतरवा गांव के लोगों के लिए आज भी चार मजबूत कंधे और एक 'खाट' ही मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने का सहारा हैं। गावां प्रखंड का तीनतरवा गांव करीब 500 की आबादी वाला है, जिसमें लगभग 100 मतदाता हैं। चुनाव के समय नेताओं के लिए यह गांव जरूर अहम हो जाता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही यहां की सड़क की समस्या भी जैसे पीछे छूट जाती है। आजादी के करीब 80 साल बाद भी गांव तक पक्की सड़क नहीं पहुंच सकी है।

बारिश में और बदहाल हो जाता है रास्ता
ग्रामीणों के मुताबिक, गांव तक पहुंचने वाला रास्ता ऊबड़-खाबड़ और कीचड़ से भरा है। बारिश के दिनों में इसकी स्थिति और भी खराब हो जाती है। ऐसे में पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है। सबसे ज्यादा परेशानी तब होती है, जब कोई ग्रामीण बीमार पड़ता है या किसी गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने की जरूरत पड़ती है।
मरीजों को खाट पर लादकर मुख्य सड़क तक ले जाने की मजबूरी
गांव में सड़क की सुविधा नहीं होने के कारण मरीजों को खाट पर लिटाकर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है। इसके बाद ही उन्हें किसी वाहन या एंबुलेंस के जरिए अस्पताल पहुंचाया जा सकता है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार मरीज को अस्पताल पहुंचाने में ही काफी समय लग जाता है, जिससे गंभीर स्थिति में परेशानी और बढ़ जाती है।
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चुनाव के दौरान मिलते हैं आश्वासन, बाद में भूल जाते हैं नेता
ग्रामीणों के अनुसार, सड़क निर्माण को लेकर उन्हें कई बार आश्वासन मिल चुका है, लेकिन आज तक जमीन पर काम शुरू नहीं हुआ। चुनाव के दौरान नेता गांव पहुंचते हैं, ग्रामीणों की समस्याएं सुनते हैं और सड़क बनवाने का भरोसा देते हैं। लेकिन चुनाव बीतने के बाद ग्रामीण फिर उसी बदहाल रास्ते पर खड़े नजर आते हैं।
सरकारें बदलीं, जनप्रतिनिधि बदले, नहीं बदली सड़क की तस्वीर
ग्रामीणों का कहना है कि सरकारें बदलीं, विधायक और सांसद बदले, लेकिन तीनतरवा की सड़क की तस्वीर नहीं बदली। उनके लिए सड़क सिर्फ आवागमन का साधन नहीं, बल्कि इलाज और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा अहम मुद्दा है। खराब रास्ते के कारण मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाना भी मुश्किल हो जाता है।
वर्षों के इंतजार से ग्रामीणों में बढ़ रही नाराजगी
सड़क की बदहाली को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी है। उनका कहना है कि वे वर्षों से सड़क निर्माण की उम्मीद लगाए बैठे हैं। हर बार लगता है कि अब गांव की तस्वीर बदलेगी, लेकिन समय बीतता गया और उम्मीद धीरे-धीरे निराशा में बदलती गई।
आश्वासन नहीं, अब सड़क पर काम चाहते हैं ग्रामीण
तीनतरवा की कहानी सिर्फ एक सड़क की बदहाली की कहानी नहीं, बल्कि वर्षों से जारी उस इंतजार की कहानी है, जिसमें ग्रामीण आज भी विकास की उम्मीद लगाए बैठे हैं। सवाल यह है कि जब गांव-गांव तक विकास पहुंचाने के दावे किए जाते हैं, तो तीनतरवा तक एक पक्की सड़क आखिर कब पहुंचेगी? ग्रामीण अब सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि सड़क निर्माण का काम शुरू होते देखना चाहते हैं। अब देखना होगा कि उनकी यह मांग कब पूरी होती है और तीनतरवा की कच्ची राह कब पक्की सड़क में बदलती है।