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सरयू राय के बयान पर बवाल, कांग्रेस के प्रदर्शन में तस्वीर पर कथित रूप से थूकने का आरोप; जदयू पहुंची थाने

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जमशेदपुर 
मानगो के  विधायक सरयू राय के एक बयान से शुरू हुआ राजनीतिक विवाद अब सड़क से थाने तक पहुंच गया है। कांग्रेस ने बयान के विरोध में पुतला दहन कर माफी की मांग की, लेकिन प्रदर्शन के दौरान सामने आई कुछ तस्वीरों ने पूरे विवाद को नया मोड़ दे दिया। तस्वीर पर कथित तौर पर थूकने और उसे जूते-चप्पलों से रौंदने की घटना ने राजनीतिक मर्यादा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब जदयू और सरयू राय के समर्थक इसे एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि का अपमान बताते हुए कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। ऐसे में यह विवाद केवल एक बयान तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि लोकतांत्रिक विरोध की सीमा और राजनीतिक संस्कृति पर भी बड़ी बहस छेड़ दी है।
बयानबाजी से सड़क पर उतरा संग्राम
दरअसल, राजनीति में बयान केवल शब्द नहीं रहते। वे कभी सवाल बनते हैं, कभी संघर्ष और कभी कोई ऐसा दृश्य रच देते हैं, जो पूरी बहस का केंद्र बन जाता है। जमशेदपुर में मानगो को लेकर विधायक सरयू राय के एक बयान के बाद शुरू हुआ विवाद भी अब शब्दों की सीमा पार कर सड़क पर उतर आया है। दरअसल, विधायक सरयू राय के कथित बयान से शुरू हुई राजनीतिक बहस अब उस मोड़ पर पहुंच गयी है, जहां विरोध की आवाज और लोकतांत्रिक मर्यादा आमने-सामने खड़ी दिखायी दे रही है। एक तरफ कांग्रेस मानगो की जनता के सम्मान का सवाल उठाते हुए सड़क पर उतरी, तो दूसरी तरफ विरोध की आग में जली राजनीतिक मर्यादा की तस्वीरों ने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया है। 
विरोध की आड़ में तार-तार होती लोकतांत्रिक मर्यादाएं
सरयू राय के बयान, कांग्रेस का प्रदर्शन, पुतला दहन, तस्वीर के साथ किया गया कथित अमर्यादित व्यवहार और उसके बाद जदयू व सरयू के समर्थक संगठनों का आक्रोश। कुल मिलाकर मानगो का यह विवाद अब केवल एक बयान का विरोध नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कार और विरोध की सीमा पर छिड़ी बहस बन चुका है। पुतला दहन से शुरू हुआ विरोध अब थाने की चौखट तक पहुंच चुका है और राजनीतिक दलों के साथ सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाओं ने भी जमशेदपुर की सियासत का पारा और बढ़ा दिया है। दरअसल, लोकतंत्र में विरोध का अधिकार हर किसी को है। सत्ता हो या विपक्ष, राजनीतिक दल अपनी असहमति दर्ज कराने के लिए धरना देते हैं, प्रदर्शन करते हैं, पुतला दहन करते हैं। यह लोकतंत्र की खूबसूरती है कि विचारों का विरोध खुले मंच पर होता है। लेकिन विरोध और विद्वेष के बीच एक महीन रेखा होती है, जिसे पार करते ही आंदोलन की गरिमा सवालों के घेरे में आ जाती है। 
मानगो की जनता के सम्मान से खिलवाड़ मंजूर नहीं
विधायक सरयू राय के बयान "मानगो में आपराधिक और राजनीतिक गठजोड़ फिर से सक्रिय, इसे तोड़ना होगा" के विरोध में कांग्रेस नेता और कार्यकर्ताओं द्वारा मानगो चौक पर रविवार को किये गये उनके पुतला दहन के दौरान सामने आयी तस्वीर ने इसी मर्यादा को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सरयू राय की तस्वीर के साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया, उसने राजनीतिक विरोध को व्यक्तिगत अपमान की सीमा तक पहुंचा दिया। वायरल तस्वीरों में दो लोग सरयू राय के चित्र पर थूकते नजर आ रहे हैं। इसके बाद तस्वीर को जमीन पर फेंककर जूते-चप्पलों से रौंदा गया। यह दृश्य केवल एक तस्वीर का अपमान नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक संस्कार पर भी सवाल है, जिसमें विरोधी विचार रखने वाले व्यक्ति के प्रति भी न्यूनतम सम्मान की अपेक्षा की जाती है। राजनीति में वैचारिक लड़ाई पुरानी परंपरा रही है। भाषणों में तीखे शब्द हो सकते हैं, आरोप-प्रत्यारोप हो सकते हैं, लेकिन क्या विरोध की भाषा इतनी नीचे उतरनी चाहिए कि असहमति का जवाब इस कदर अपमान से दिया जाये? प्रदर्शन के दौरान झुलसा कांग्रेस कार्यकर्ता
विडंबना देखिये, जिस विरोध प्रदर्शन में राजनीतिक गर्मी दिख रही थी, उसी दौरान एक कार्यकर्ता भी आग की चपेट में आ गया। पुतला दहन के दौरान एक कार्यकर्ता के शर्ट में आग लग गयी, बताया जा रहा है कि जिससे उसका हाथ भी झुलस गया। यानी जिस आग से राजनीतिक आक्रोश दिखाने की कोशिश की गयी, उसकी तपिश अपने ही कार्यकर्ता तक पहुंच गयी। यह घटना कई सवाल छोड़ जाती है। क्या राजनीति में विरोध का स्तर इतना गिर जाना चाहिए कि व्यक्ति नहीं, बल्कि उसकी तस्वीर निशाना बन जाये? क्या लोकतांत्रिक असहमति का रास्ता अपमान और अमर्यादित प्रदर्शन से होकर गुजरेगा?
कांग्रेस का पुतला दहन और बयान वापसी की मांग
बहरहाल, सरयू राय के बयान के बाद कांग्रेस ने जहां इसे मानगो की जनता के सम्मान से जोड़ते हुए विधायक का पुतला फूंका और उस दौरान जो तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुई, उसे जदयू और उनके समर्थक संगठन एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि के अपमान का मामला बता रहे हैं। कांग्रेस कार्यकर्ताओं के द्वारा मानगो चौक पर सरयू राय के पुतला दहन के दौरान विधायक के खिलाफ नारेबाजी करते हुए बयान वापस लेने और सार्वजनिक माफी की मांग की गयी थी।
मानगो प्रखंड कांग्रेस अध्यक्ष ने क्या कहा?
मानगो प्रखंड कांग्रेस अध्यक्ष ईश्वर सिंह ने कहा कि किसी भी जनप्रतिनिधि द्वारा पूरे क्षेत्र की जनता को अपराध से जोड़ना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। मानगो में रहने वाले लाखों लोग मेहनत, ईमानदारी और संघर्ष के बल पर अपनी पहचान बना रहे हैं। ऐसे में पूरे क्षेत्र की छवि को लेकर की गयी टिप्पणी लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली है। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि मानगो की पहचान को अपराध से जोड़ना उचित नहीं है और विधायक को अपने बयान पर स्पष्टीकरण देते हुए माफी मांगनी चाहिए।
सरयू राय की तस्वीर पर थूका 
इधर, कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन के बाद सामने आयी कुछ तस्वीरों ने विवाद को और हवा दे दी। आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान कुछ कार्यकर्ताओं ने सरयू राय की तस्वीर पर थूका और बाद में उसे जमीन पर फेंककर जूते-चप्पलों से रौंदा गया। इस घटना के बाद जदयू नेताओं और विधायक के समर्थकों में गहरी नाराजगी देखी जा रही है। जनता दल यूनाइटेड के नेताओं का कहना है कि राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन किसी व्यक्ति विशेष की तस्वीर के साथ इस तरह का व्यवहार लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ है। जदयू ने पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रशासन से जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। पूरी घटना को लेकर जदयू के एक प्रतिनिधिमंडल ने सोमवार को मानगो थाना पहुंचकर लिखित शिकायत सौंपते हुए कार्रवाई की मांग की है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि विरोध प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने विधायक सरयू राय की तस्वीर के साथ अमर्यादित व्यवहार किया। जदयू नेताओं ने पुलिस से उपलब्ध वीडियो और अन्य साक्ष्यों के आधार पर मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कानूनी कार्रवाई करने का आग्रह किया है।
मानगो की जंग अब 'स्वाभिमान' की
वहीं, मामले में झारखंड क्षत्रिय संघ भी विधायक सरयू राय के समर्थन में उतर आया है। संघ के अध्यक्ष शंभूनाथ सिंह ने कहा कि लोकतंत्र में हर किसी को विरोध करने का अधिकार है, लेकिन विरोध के नाम पर व्यक्तिगत अपमान की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि राजनीतिक लड़ाई विचारों और नीतियों के स्तर पर होनी चाहिए, न कि किसी व्यक्ति की छवि को नुकसान पहुंचाने के तरीके से। संघ ने राजनीतिक दलों से संयम बरतने और लोकतांत्रिक मर्यादा बनाये रखने की अपील की।
जदयू ने दी उग्र आंदोलन की चेतावनी
उधर, जदयू के पूर्वी सिंहभूम जिलाध्यक्ष सुबोध श्रीवास्तव ने कहा कि लोकतंत्र में हर राजनीतिक दल को अपनी बात रखने और विरोध करने का अधिकार है। हम पुतला दहन का विरोध नहीं कर रहे हैं। लेकिन, एक सम्मानित जनप्रतिनिधि और लोकप्रिय नेता का अपमान करना स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि वैचारिक मतभेद लोकतंत्र की ताकत हैं, मगर व्यक्तिगत अपमान लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है। सरयू राय की तस्वीर पर गुटखा थूकते हुए वीडियो वायरल करना गंदी राजनीति को दर्शाता है। चेतावनी दी गयी कि थाना स्तर पर कार्रवाई नहीं करने पर जदयू का आंदोलन उग्र होगा। दूसरी ओर इस पूरे घटनाक्रम के बीच पुतला दहन के दौरान एक हादसा भी सामने आया। पुतले से उठी आग के लपटों की चपेट में आने से एक कार्यकर्ता के शर्ट में आग भी लग गयी, जिससे उसका हाथ झुलस गया। घटना ने यह सवाल भी खड़ा किया कि राजनीतिक आक्रोश की अभिव्यक्ति में सावधानी और संयम कितना जरूरी है।
मुहब्बत की दुकान’ पर थूक का थप्पा
जिस राजनीति में "मुहब्बत की दुकान" की बात होती है, वहां तस्वीरों पर थूकना और उन्हें जूतों से कुचलना किस तरह की राजनीतिक संस्कृति को दर्शाता है? विरोध कीजिए, सवाल उठाइए, संघर्ष कीजिए। लेकिन, लोकतंत्र की उस मर्यादा को बचाकर, जिसकी बुनियाद असहमति के अधिकार के साथ-साथ सम्मान की भावना पर भी टिकी है। ऐसे में मानगो विवाद अब केवल एक बयान का विवाद नहीं रह गया है। बल्कि, मानगो से शुरू हुआ यह विवाद अब जमशेदपुर की राजनीति में एक नये टकराव का रूप ले चुका है। कांग्रेस इसे मानगो की अस्मिता और सम्मान का मुद्दा बता रही है, जबकि जदयू और समर्थक संगठन इसे राजनीतिक मर्यादा से जुड़े सवाल के रूप में उठा रहे हैं। अब निगाहें पुलिस की कार्रवाई और विधायक सरयू राय की अगली प्रतिक्रिया पर टिकी हैं।

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