गोड्डा
गोड्डा भी अब उपलब्धियों के इस दौर में तेजी से आगे बढ़ रहा है। दरअसल, गोड्डा जिले के नीमा कला गांव के 22 वर्षीय मिक्स्ड मार्शल आर्ट (MMA) खिलाड़ी देवगन मरांडी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर शानदार प्रदर्शन कर पूरे देश और राज्य का नाम रोशन किया है। कोलकाता में आयोजित 'प्रोफेशनल इंटरनेशनल एमएमए फाइट' के 65 किलोग्राम फेदरवेट वर्ग में यह उनका पहला अंतरराष्ट्रीय मुकाबला था। देवगन ने आक्रामक शुरुआत करते हुए नेपाल के खिलाड़ी सुनील पहन को महज 17 सेकंड में नॉकआउट कर मुकाबला अपने नाम कर लिया और प्रतिद्वंद्वी को संभलने तक का मौका नहीं दिया। अपनी इस ऐतिहासिक जीत पर गोड्डा के लाल देवगन मरांडी ने कहा कि अगर मुझे आर्थिक सहयोग और बेहतर संसाधन मिलें, तो मैं अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश और झारखंड का नाम और भी ऊंचा कर सकता हूं। जीत के बाद जब देवगन अपने गांव लौटे, तो ग्रामीणों ने गाजे-बाजे और फूल-मालाओं के साथ उनका भव्य स्वागत किया। गांव के लोगों ने उन्हें अपने क्षेत्र का असली हीरो बताते हुए उनकी इस अभूतपूर्व उपलब्धि पर गर्व जताया।
राष्ट्रीय स्तर पर भी बना चुके हैं पहचान, अब UFC में खेलने का सपना
देवगन मरांडी अब तक कुल 14 प्रोफेशनल एमएमए मुकाबले लड़ चुके हैं, जिनमें 11 में जीत हासिल की है। उनकी खेल यात्रा दिल्ली से शुरू हुई और जल्द ही उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। रायपुर में आयोजित राष्ट्रीय प्रतियोगिता में लगातार तीन मुकाबले जीतकर उन्होंने अपनी क्षमता साबित की। अब उनका अगला लक्ष्य दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित एमएमए संस्था UFC (Ultimate Fighting Championship) में भारत का प्रतिनिधित्व करना है। देवगन का कहना है कि यदि उन्हें बेहतर प्रशिक्षण, संसाधन और आर्थिक सहयोग मिले, तो झारखंड से भी विश्वस्तरीय एमएमए खिलाड़ी तैयार हो सकते हैं। 
संघर्षों के बीच तय किया सफलता का सफर
देवगन गोड्डा जिले के राजमहल कोल परियोजना से प्रभावित नीमा कला गांव के निवासी हैं। उनके पिता संझला मरांडी ईसीएल (ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड) में कार्यरत थे और चार वर्ष पहले सेवानिवृत्त हुए। आठ भाई-बहनों में चौथे स्थान पर रहने वाले देवगन की प्रारंभिक शिक्षा बेथेल मिशन स्कूल में हुई, जबकि 12वीं की पढ़ाई उन्होंने भागलपुर से पूरी की। दिल्ली में एनडीए की तैयारी के दौरान उनकी रुचि एमएमए की ओर बढ़ी। इसके बाद उन्होंने हाउस ऑफ ग्लेडिएटर अकादमी में प्रवेश लेकर तीन वर्षों तक कड़ी ट्रेनिंग की। इस दौरान उन्होंने रेसलिंग, बॉक्सिंग, ब्राजीलियन जिउ-जित्सु और किक बॉक्सिंग जैसी विभिन्न विधाओं में दक्षता हासिल की।
हर महीने 20 से 25 हजार रुपये का खर्च, अब स्पॉन्सर की तलाश
देवगन बताते हैं कि प्रशिक्षण के दौरान हर महीने 20 से 25 हजार रुपये तक का खर्च आता था, जिसमें ट्रेनिंग फीस, डाइट, रहने और अन्य आवश्यकताएं शामिल थीं। सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद उनके परिवार ने कभी उनका हौसला नहीं टूटने दिया। अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार मुकाबले खेलने के लिए उन्हें आर्थिक सहयोग और स्पॉन्सरशिप की आवश्यकता है। उनका कहना है कि यदि राज्य सरकार, ईसीएल राजमहल परियोजना या निजी संस्थाएं सहयोग करें, तो वह विश्व स्तर पर झारखंड और भारत का नाम और ऊंचा कर सकते हैं।
मदद की मांग तेज, कई लोगों ने बढ़ाया सहयोग का हाथ
देवगन की उपलब्धि के बाद क्षेत्र में उनके समर्थन की आवाज भी तेज हो गई है। मजदूर नेता मिस्त्री मरांडी ने राज्य सरकार और ईसीएल प्रबंधन से इस प्रतिभाशाली खिलाड़ी को आर्थिक सहयोग देने की मांग की है। वहीं, बेथेल मिशन स्कूल के प्राचार्य अन्ना मार्क तथा राज्य अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष पी. सोलोमन से भी देवगन ने मुलाकात कर अपनी स्थिति साझा की। पी. सोलोमन ने सरकार के समक्ष उनकी मदद का मुद्दा उठाने का भरोसा दिया है।
देवगन मरांडी ने क्या कहा?
देवगन मरांडी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का उनका सफर पिता के अटूट भरोसे और परिवार के त्याग की बदौलत संभव हो सका। ईसीएल में कार्यरत रहे उनके पिता की पेंशन से ही उनकी ट्रेनिंग, डाइट और प्रतियोगिताओं का खर्च चलता रहा। तीन वर्षों तक हर महीने करीब 25 हजार रुपये खर्च होने के बावजूद परिवार ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने ईसीएल, राज्य सरकार और समाज के लोगों से सहयोग की अपील करते हुए कहा, "अगर मुझे आर्थिक सहयोग और बेहतर संसाधन मिलें, तो मैं अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश और झारखंड का नाम और ऊंचा कर सकता हूं।"