द फॉलोअप, रांची
नामांकन की औपचारिकता पूरी होने के साथ ही यह स्पष्ट होने लगा है कि झारखंड से पहले दो बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में राज्यसभा पहुंचने वाले परिमल नाथवानी इस बार भी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में संसद के ऊपरी सदन पहुंचेंगे। वहां इत्मिनान से छह साल बैठेंगे। झारखंड के संभावित राज्यसभा चुनाव परिणाम पर अब केवल उन्हीं को आपत्ति हो सकती है, जो या तो राजनीति का ककहरा नहीं जानते या राजनीति के परिवक्व खिलाड़ी हैं। इसी कैटेगरी के लोग और नेता आज सार्वजनिक रूप से इंडिया गठबंधन के दोनों प्रत्याशियों के विजयी होने का दावा कर रहे हैं। परिमल के परिणाम के प्रति संशय रखने वालों को इस पर भी गौर करना होगा, जिसमें कांग्रेस के अंतिम चाल को मुख्यमंत्री, सुदिव्य कुमार सोनू समते इंडिया गठबंधन के कई अन्य विधायकों ने बैठक में भोथरा कर दिया। कांग्रेस के पर्यवेक्षक बन कर आए भूपेश बघेल ने विधानसभा में इंडिया गठबंधन के विधायकों की बैठक में रिसोर्ट्स पॉलिटिक्स का प्रस्ताव रखा। जिसमें इंडिया गठबंधन के विधायकों को चुनाव तक कहीं अन्यत्र रखने की बात थी। लेकिन यह कह कर इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया गया कि झारखंड में फिलहाल एसआईआर चल रहा है। इस दरम्यान विधायकों का क्षेत्र से बाहर रहना उचित नहीं होगा। अगर इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से समर्थन मिल जाता तो राज्यसभा चुनाव में एक नया ट्विस्ट आ सकती थी। क्योंकि 10 दिनों तक रिसोर्ट्स में रहने पर इंडिया गठबंधन के विधायक मोल-तोल की दुनिया से कट जाते। 18 जून को मतदान के दिन जब सभी 56 विधायक एक साथ विधानसभा पहुंचते और लाइन में सीधी खड़ा कराके झामुमो के बैजनाथ राम और कांग्रेस के प्रणव झा को वोट दिलाने की कोशिश होती तो नाथवानी के लिए मामला उलझता। उनके लिए जीत का टास्क को पूरा करना चुनौतिपूर्ण हो जाता। लेकिन नाथवानी की जीत की पटकथा अब लिख दी गयी है, औपचारिक रिजल्ट भर आना शेष दिखता है। बताने में कोई हिचक नहीं कि आज नामांकन के बाद प्रणव झा का बॉडी लैंग्वेज भी इसी परिणाम की पुष्टि कर रहा था।

बाबूलाल मरांडी और आदित्य साहु के दावे की दम निकल गयी
राज्यसभा चुनाव के अब तक के बिसात पर कई चीजें सतह पर आयी है। प्रतिपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी की यह घोषणा की भाजपा प्रत्याशी देगी और जीतेगी भी, सच नहीं हुई। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष प्रो आदित्य साहु का भी दावा कि भाजपा का प्रत्याशी स्थानीय होगा,दम निकल गया। अब बाबूलाल मरांडी कहने लगे कि भाजपा के पास जादुई आंकड़ा नहीं था, इसलिए निर्दलीय का समर्थन करना पड़ा। बाबूलाल जी को क्या आंकड़े के बारे में पहले जानकारी नहीं थी क्या। प्रो साहु भी अब कुछ इसी तरह का बयान देंगे।

नाथवानी की हेमंत सोरेन से मुलाकात
परिमल नाथवानी से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मुलाकात भी कुछ कहती है। संदेश और संकेत देती है। भले ही इंडिया गठबंधन का हर बड़ा नेता कुछ ज्यादा जोड़ से यह बयान देकर पल्ला झाड़ रहा है कि लोकतंत्र में कोई भी किसी से मिल सकता है। अगर ऐसा है तो फिर कांग्रेस प्रत्याशी को भी वोट की मांग को लेकर भाजपा के पास जाना चाहिए। कुल मिला कर राजनीति में सार्जनिक रूप से किए जानेवाले दावे सच नहीं होते, सच वही होता है तो ड्राइंग रूम में बैठ कर तय किया जाता है।
झामुमो विधायकों के सभी अतिरिक्त वोट दिखा कर कांग्रेस प्रत्याशी को दिए जाएंगे
झामुमो के केंद्रीय अध्यक्ष और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राज्यसभा चुनाव में अब तक राजनीति की बिसात पर हर चाल मारक चली है। आगे भी उनकी चाल और मारक तथा धारदार होने वाली है। जानकार सूत्रों की माने तो अगली चाल में झामुमो के अतिरिक्त सभी विधायक कांग्रेस के पोलिंग एजेंट को दिखा कर अपना मत कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा को देंगे। झामुमो यह गुंजाइश ही नहीं छोड़ेगा कि कांग्रेस को यह आरोप लगाने का मौका मिले कि झामुमो ने कांग्रेस के साथ धोखा किया। इस तरह झामुमो की हर चाल में कांग्रेस मकड़े की जाल की तरह उलझती जा रही है। कांग्रेस को अब भी समझने में क्यों देर हो रही है कि झामुमो उसे गठबंधन धर्म के तहत पुरजोर समर्थन देने का पूरा भरोसा दिला रहा है लेकिन जीत दिलाने का गारंटर नहीं बन रहा है।

अब यक्ष प्रश्न कि कांग्रेस अभी भी गठबंधन में रहेगा
राज्यसभा चुनाव के बाद झारखंड की राजनीति में अब यक्ष प्रश्न सिर्फ यह होगा कि क्या अब भी कांग्रेस सरकार में शामिल रहेगी। अपमान सह कर सत्ता का सुख भोगने की कोशिश करती रहेगी। यहां कांग्रेस को याद दिलाना जरूरी है कि पिछले कई दिनों से रांची में आकर ठहरे प्रदेश प्रभारी के राजू को मुख्यमंत्री आवास में जाने का मौका नहीं मिला। क्या उन्हें आवास में घुसने पर प्रतिबंध था या अनुमति के बाद भी वे खुद नहीं गए। नहीं गए तो बात इतनी बिगड़ चुकी है कि बगल के राज्य से आए भूपेश बघेल को मामला सुलझाने के लिए बुलाना पड़ा। बात बहुत कुछ है, पर कुछ कहने लायक नहीं है। इंडिया गठबंधन की एकजुटता का दंभ भरनेवाले कांग्रेसियों के सामने यह भी सवाल खड़ा होता है कि हाल में बिहार में हुए राज्यसभा चुनाव में वे अपनी पार्टी के विधायक को क्या बांध कर रख पाए थे। कांग्रेस के चार विधायकों में तीन ने पार्टी के फैसले के विरुद्ध क्रास वोटिंग कर दी थी। फिर झारखंड के राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के 16 विधायकों की एकजुट रहने के दावे में कितना दम हो सकता है। राजद और माले विधायकों को अपने पाले में लाने की बात तो और भी दूर की कौड़ी है।
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क्या गौरव वल्लभ को बलि का बकरा बनाया गया
राजनीति के गलियारे में चर्चा इस बात की भी है कि भाजपा ने गौरव वल्लभ को तय रणनीति के तहत बलि का बकरा बनाया। वल्लभ से नामांकन का पर्चा खरीदवा लिया गया। उन्हें 7 जून की रात उस बैठक में भी बुलाया गया, जिसमें प्रस्ताव वाले पर्चे पर विधायकों से दस्तखत कराया गया। लेकिन उस पर्चे में वल्लभ का नाम नहीं लिखा गया। वे टुकटुक सिर्फ प्रस्ताव वाले पर्चे को दूर से निहारते रहे। सुबह हुई तो वह इस अपमान को सह नहीं पाए और फिर भाजपा मुख्यालय जाने के बदले शायद वापस दिल्ली लौट गए। जानकार बताते हैं कि गौरव वल्लभ भले ही प्रधानमंत्री के नजदीकी कहे जाते रहे, लेकिन मोदी और साह के नजदीक रह कर भी वह राजनीति की चाल और मोहरे समझने में अभी भी बउआ ही माने जाएंगे। उन्हें उस समय भी भाजपा का संदेश समझ जाना चाहिए था जब उन्हें प्रत्याशी बनाए जाने की आधिकारिक घोषणा पार्टी नहीं कर रही थी। नाथवानी शनिवार की रात सीएम से मिले, सीएम हाउस से निकले और सीधे दिल्ली के लिए उड़ गए। जब तक वह दिल्ली में रहे, भाजपा ने कोई फैसला नहीं किया। नाथवानी जैसे ही फिर दिल्ली से रांची के लिए विमान पर बैठे, सब कुछ स्पष्ट हो गया और गौरव वल्लभ का खेल समाप्त हो गया। अब संभव है कि भाजपा ने उन्हें किए जानेवाले खेल को पहले ही समझाकर रांची भेजी थी।
