जीतेंद्र कुमार
बड़ा कष्ट है। सत्ता-सुख की कुर्सी पर बैठे-बैठे अचानक कोई कांटा उग आए तो आदमी समझ ही नहीं पाता कि किधर जाए। सत्ता के साथ खड़ा रहे या छात्रों के साथ? यह दुविधा लगातार गहराती जा रही है। बीच-बीच में कुर्सी डोलने लगती है और उसे संभालने के लिए तरह-तरह की बातों की जंजीरें डालनी पड़ती हैं। गड़बड़ी कहां है, यह भी पता है। भ्रष्टाचार की परतें कहां हैं, इसकी खबर भी है। लेकिन परेशानी यही है कि सब कुछ जानते हुए भी रास्ता चुनना मुश्किल हो गया है। सत्ता में रहेंगे तो सुख-सुविधा और प्रभाव बना रहेगा, लेकिन जनता से दूर हो जाने का डर सताएगा। जनता की तरफ जाएंगे तो कुर्सी खिसकने का खतरा है। राज्य की एक प्रमुख पुरानी पार्टी के नेताओं, मंत्रियों और कुछ स्वनामधन्य कार्यकर्ताओं के सामने इन दिनों यही सबसे बड़ी दुविधा है।

ऊपर से गांधी बाबा बीच-बीच में ऐसा बयान दे देते हैं कि बेचैनी और बढ़ जाती है। जैसे नीम पर करैला चढ़ जाए। बाबा एक दिन दिल्ली में बोल बैठे—हम छात्रों के साथ हैं। बस, फिर क्या था! पार्टी के भीतर खलबली मच गई। कुर्सी हिलने-डुलने लगी। किसी तरह बयानबाजी, आश्वासनों और बातों की जंजीरों से कुर्सी को बांधकर स्थिर किया गया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। एक दिन फिर गांधी बाबा कुछ ऐसा बोल बैठे कि परेशानी दोबारा बढ़ गई। पिछले दो-तीन दिनों से बाबा शांत हैं, तो थोड़ी राहत जरूर है। मगर डर खत्म नहीं हुआ है। आशंका बनी हुई है कि कहीं फिर गांधी बाबा कुछ बोल न बैठें। क्योंकि आंदोलन खत्म नहीं हुआ है और उसके फिर से भड़क उठने की संभावना भी बनी हुई है।

जेन-जी आंदोलन ने एक बात बिल्कुल साफ कर दी है—जनता को सिर्फ बातों से बरगलाने का समय अब बीत चुका है। अब भाषण नहीं, आउटपुट चाहिए। गोल-मटोल बात नहीं, स्पष्ट जवाब चाहिए। यही वजह है कि छात्रों की मांगों पर राजनीतिक दलों को अपना स्टैंड साफ करने की नौबत आ गई है। कौन-सा दल छात्रों की किस मांग के साथ खड़ा है, यह बताने की मजबूरी अब टाली नहीं जा सकती। छात्रों की फिलहाल दो प्रमुख मांगें हैं—सीजीएल परीक्षा रद्द हो और पूरे मामले की सीबीआई जांच हो। असली परेशानी यहीं से शुरू होती है। इन दोनों मांगों को लेकर इस दल के भीतर ही दलदल है। ऊपर से गांधी बाबा छात्रों के साथ खड़े होने की बात करते हैं, लेकिन नीचे सत्ता की मलाई का स्वाद ले रहे स्थानीय नेता सत्ता के साथ खड़े हो जाते हैं। उन्हें डर है कि कहीं सरकार अस्थिर न हो जाए, कहीं उनकी कुर्सी पर आंच न आ जाए, कहीं सत्ता का सुख हाथ से न निकल जाए।

लेकिन इन्हें कौन समझाए कि पार्टी को सिर्फ अपनी कुर्सी की राजनीति नहीं करनी होती। उसे देश और राज्य की राजनीति भी करनी है। राष्ट्रीय नेतृत्व को देश की चिंता है, लेकिन स्थानीय नेताओं की नजर अपनी कुर्सी, अपना प्रभाव और अपने तत्कालिक हितों पर टिकी है। यही सबसे बड़ा विरोधाभास है। जनता सब देख रही है। छात्र सब देख रहे हैं। कौन किसके साथ खड़ा है, कौन कब बयान बदलता है और कौन कुर्सी बचाने के लिए चुप हो जाता है—सबका हिसाब रखा जा रहा है। अब देखना सिर्फ इतना है कि यह दोहरी राजनीति कब तक चलती है। लड़के का भाई और लड़की का भी भाई बनने की यह तिकड़म आखिर कब तक काम आती? हालांकि राजनीति में छिलका देर-सबेर उतरता ही है। सवाल सिर्फ इतना है कि छिलका कब छूटता है और असली चेहरा कब सामने आता है।
