द फॉलोअप, रांची
झारखंड कैडर के 1985 बैच के आईएएस सुधीर त्रिपाठी राज्य के चर्चित आईएएस अधिकारियों में रहे हैं। वह 30 सितंबर 2018 को रिटायर हो चुके हैं। फिलहाल वह यूपी और दिल्ली में रहते हैं। वह फॉलोअप के जरिए झारखंड की गतिविधियों पर नजर रखे रहते हैं। इसी क्रम में जेपीएससी-जेएसएससी को लेकर छात्रों के आंदोलन को देखने, परखने और समझने के बाद सुधीर त्रिपाठी ने फॉलोअप के जरिए राज्य सरकार को दो महत्वपूर्ण सुझाव दिया है। मालूम हो कि सुधीर त्रिपाठी झारखंड के मुख्य सचिव रहे हैं। साथ ही वह जेएसएससी के भी चेयरमैन रहे हैं। इस कारण प्रतियोगी परीक्षाएं के संचालन और उसमें आने वाली बाधाओं, विसंगतियों की शायद उन्हें बेहतर समझ है।

सुधीर त्रिपाठी ने कहा है कि JPSC/JSSC को लेकर युवाओं में बढ़ते मोहभंग पर उनका मानना है कि झारखंड के ऐसे कई उत्कृष्ट और ईमानदार अधिकारी हैं, जिन्हें यदि JPSC/JSSC जैसी संस्थाओं की जिम्मेदारी दी जाए और अपने विवेक के अनुसार स्वतंत्र रूप से काम करने की पूरी छूट मिले, तो वे इन संस्थाओं में व्यापक सुधार ला सकते हैं। इनमें संतोष सतपथी, सुखदेव सिंह, एन. एन. सिन्हा, आई. एस. चतुर्वेदी, मुखमीत भाटिया, शैलेश सिंह आदि प्रमुख नाम हैं।

इसके अतिरिक्त, सरकार को आर. एस. शर्मा की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने पर भी विचार करना चाहिए। श्री शर्मा सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) के विशेषज्ञ हैं और नंदन नीलेकणी के साथ मिलकर आधार (Aadhaar) परियोजना के प्रमुख वास्तुकारों में रहे हैं। इस समिति को तीन माह के भीतर JPSC/JSSC के माध्यम से प्रतियोगी परीक्षाओं के निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय संचालन के लिए ठोस सुझाव देने का दायित्व सौंपा जा सकता है। उन्होंने कहा कि अब किसी भी परीक्षा में आईटी के प्रभाव को दरकिनार नहीं किया जा सकता। भ्रष्टाचार के नयी नयी तकनीकों में इसकी प्रभावी भूमिका होती जा रही है। सुधीर त्रिपाठी का कहना है कि उपरोक्त अधिकारियों में कुछ की उम्र सीमा 62 पार कर गयी है। जबकि जेपीएससी के चेयरमैन के लिए अधिकतम उम्र सीमा 62 है। इसलिए वैसे अधिकारियों को जेएसएससी की जिम्मेदारी और जिनकी उम्र सीमा बची है उन्हें जेपीएससी की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल चीखने और चिल्लाने से किसी समस्या का समाधान नहीं होता। इसके लिए कुछ ठोस कदम उठाये जाने चाहिए।
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