जीतेंद्र कुमार
राज्यसभा चुनाव की इस सरगर्मी के बीच पार्टी के किसी नेता का वैल्यू अचानक कितना बढ़ जाता है, इसका अंदाजा आप भी लगा सकते हैं। अगर नेताजी पार्टी मुख्यालय में घंटों बैठने वालों में रहे हों तो, उनके प्रभाव को भी आप समझ सकते हैं। क्योंकि राज्यसभा चुनाव के इस मौसम में दिल्ली, पटना ही नहीं राज्य के अन्य जिलों से आनेवाले कई बड़े बड़े नेताओं से मुलाकात और उनसे घनिष्टता बढ़ाने का अवसर मिल जाता है। लेकिन राजनीतिक सरगर्मी और उबाल के बीच नेताजी को चुपके से पार्टी मुख्यालय आने को विवश होना पड़ रहा है। अंधियारे में जब रात के 10-11 बजते हैं, नेताजी चुपके से पार्टी मुख्यालय पहुंचते हैं। पार्टी के लोग तो उन्हें देख ही लेते हैं, लेकिन किसी बाहरी की नजर न पड़े, कोई उनकी तस्वीर न खींच ले, इसके लिए पूरा सावधान रहते हैं। क्योंकि नेताजी बुरी तरह फंस गए हैं। ना वह अभी घर के हैं और ना घाट के।

जी हां हम बात कर रहे हैं राज्य के सूचना आयुक्तों की नियुक्ति का। सूचना आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी संचिका पर राज्यपाल ने क्वेरी कर दी है। कई लोगों ने राजनीतिक दलों से जुड़े नेताओं को सूचना आयुक्त बनाए जाने पर सवाल खड़ा किया है। राजभवन और कई स्तरों पर इसकी शिकायत भी की है। इसे आरटीआई कानून का उल्लंघन बताया है। अब हुआ यह है कि जिन नेताओं का नाम सरकार ने पैनल में डाल कर स्वीकृति के लिए राजभवन भेजा था, उस पर हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान सरकार ने आरोपों को गलत करार दिया है। कोर्ट को बताया गया कि जिन नेताओं के नाम सूचना आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी पैनल में है, वे किसी राजनीतिक दल से संबंद्ध नहीं रखते। उन नेताओं ने राजनीतिक दलों के विभिन्न पदों से इस्तीफा दे दिया है।

अब सरकार के इस दावे को सही साबित करने की मजबूरी में नेताजी पार्टी मुख्यालय आना छोड़ दिए हैं। यह अलग बात है कि उन्हें अब अपना घर भी कचोट रहा है। वहां उन्हें शांति नहीं मिल रही। राज्यसभा चुनाव के दौरान दिल्ली से आने वाले बड़े-बड़े नेताओं से मिलने का मौका नहीं मिल रहा है। लेकिन करें तो करें क्या। क्योंकि सूचना आयुक्त का पद पाना है तो कुछ त्याग तो करना ही पड़ेगा। कहा भी गया है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। लेकिन डर और आशंका यह है कि, यहां कुछ खोने के बाद भी मिलना सुनिश्चित हो, इसकी गारंटी नहीं है।
