जीतेंद्र कुमार
झारखंड में राज्यसभा का चुनाव दिलचस्प मोड़ लेने लगा है। सीट दो और प्रत्याशी तीन या चार भी हो सकते हैं। सभी प्रमुख दल जीत के लिए विधायकों की आवश्यक संख्या नहीं रहते हुए भी उम्मीदवार देने की घोषणा कर रहे हैं। झामुमो को दो उम्मीदवारों को विजयी दिलाने के लिए सीधे तौर पर 56 मत चाहिए, लेकिन 34 विधायकों के बूते वह दो प्रत्याशी देने पर अड़ा है। भाजपा की भी यही स्थिति है। जीत के लिए 28 विधायक चाहिए लेकिन 21 की संख्या बल पर, वह भी उम्मीदवार देने जा रहा है। कांग्रेस की भी यही स्थिति है। 16 विधायकों वाली पार्टी ने अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी है। इस तरह पूरे परिदृश्य में पार्टी लाइन से इतर जाकर क्रास वोटिंग की संभावना बलवती है। लेकिन यह जानकर आश्चर्य होगा कि क्रास वोटिंग करनेवाले विधायक को कुछ नहीं होगा। क्योंकि किसी भी विधायक के लिए पार्टी के निर्वाचन योग के गाइड लाइन के तहत इलेक्शन एजेंट को बैलेट पेपर दिखाना तो अनिवार्य किया हुआ है, लेकिन उस विधायक को क्रास वोटिंग करने से कायदे, कानून और संविधान, कहीं नहीं रोकता।

बैलेट दिखाने का प्रावधान क्या है
राज्यसभा चुनाव में पहले पार्टी का एक पोलिंग एजेंट और काउंटिंग एजेंट होता था। निर्वाचन आयोग ने हॉर्स ट्रेडिंग को रोकने के लिए अब इलेक्शन एजेंट का प्रावधान कर दिया है। यह प्रावधान किया गया है कि कोई भी विधायक वोट देने के बाद पार्टी के उस इलेक्शन एजेंट को अपना बैलेट पेपर दिखाएगा। अगर वह विधायक बैलेट पेपर नहीं दिखाता है और बैलेट बॉक्स में बैलेट पेपर डालने लगता है तो इलेक्शन एजेंट इसका विरोध करेगा और रिटर्निंग अफर उसे वोट डालने से रोक देगा। उस मतपत्र को रद्द कर देगा और दूसरा मत पत्र देगा। फिर दूसरी बार वह विधायक वोट डालेगा। अगर कोई विधायक अपना मतपत्र सबको दिखा देता है कि हमने इसको वोट दिया है, तब भी रिटर्निंग अफसर उसे वोट डालने से रोक दे सकता है। इसका उद्देश्य है कि किसी भी विधायक को वह किसको वोट देता है, यह उसकी स्वतंत्रता है, लेकिन पार्टी के इलेक्शन एजेंट को दिखाना उसकी बाध्यता है।

पेन घोटाला, जिसके बाद इलेक्शन कमीशन ने यह प्रावधान किया
2016 में में हुए हरियाणा के बहुचर्चित राज्यसभा चुनाव के बाद निर्वाचन आयोग ने वोट डालने के समय कुछ प्रावधानों को काफी सख्त कर दिया है। दरअसल हरियाणा में हुए इस राज्यसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी आरके आनंद को कांग्रेस और इनेलो का समर्थन प्राप्त था। सुभाष चंद्रा भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी थे। वोट के लिए इलेक्शन कमीशन उस समय एक विशेष पेन उपलब्ध कराता था, जिसकी अधिकृत स्याही बैगनी होती थी। हुआ ये कि वोट देने के लिए एक साथ दर्जन भर विधायक लाइन में लग गए। लाइन में लगे पहले विधायक ने अधिकृत स्याही वाले पेन को अपने पॉकेट में रख लिया और नीली स्याही वाली दूसरी पेन से वोट देने के बाद वह उसे वहीं रख दी। परिणाम हुआ कि लाइन में लगे अन्य 11 विधायक उसी नीली स्याही वाले पेन से वोट डालते रहे। फिर अंतिम विधायक ने उस नीली स्याही वाली पेन को चुरा लिया और अधिकृत स्याही वाला पेन रख दिया। जब काउंटिंग हुई तो कांग्रेस के 12 विधायकों के मत रद्द हो गए। भाजपा समर्थित सुभाष चंद्रा जीत गए। इस बहुचर्चित स्याही और पेन घोटाले के बाद निर्वाचन आयोग ने प्रत्येक विधायक को वोट देने के लिए एक-एक नया पेन देने का प्रावधान कर दिया। साथ ही वोट डालने की जगह एक अधिकारी की प्रतिनियुक्ति का प्रावधान किया गया, जिसकी ड्युटी होती है कि वह प्रत्येक विधायक को एक नया पेन ेगा और वोट डालने के बाद उस पेन को कलेक्ट कर लेगा। बाद में उन सभी पेन को बंद लिफाफे में पैक कर निर्वाचन आयोग को सुपुर्द करने का प्रावधान जोड़ दिया गया। उसी तरह जिस तरह बैलेट पेपर को इलेक्शन कमीशन को बंद लिफाफे में सुरक्षित सौंपा जाता है। 2016 के बाद से झारखंड में भी जब राज्यसभा का चुनाव होता है, इलेक्शन कमीशन रिटर्निंग अफसर को विधायकों को वोट डालने के लिए 90 पेन उपलब्ध कराता है।

क्रास वोटिंग करने वाले विधायक के विरुद्ध कार्रवाई संभव नहीं
संविधान और निर्वाचन आयोग के कतिपय प्रावधान किसी भी विधायक को किसी के दबाव में वोट डालने से रोकता है। कोई भी विधायक अपनी अंतरआत्मा की आवाज पर पार्टी लाइन से विरुद्ध जाकर भी मत डाल सकता है। विधायक द्वारा अपने मत पत्र को बैलेट बॉक्स में डाल दिए जाने के बाद यह प्रमाणित करना असंभव है किसने किसको वोट दिया। हां पार्टी के पोलिंग एजेंट की शिकायत पर कि अमुक विधायक ने क्रास वोटिंग किया है, कोई भी पार्टी उस विधायक से स्पष्टीकरण पूछ सकता है। लेकिन उसकी सदस्यता समाप्त कराना किसी भी पार्टी के लिए मुश्किल है। भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के तहत अगर कोई विधायक अपनी पार्टी के व्हिप (Whip) का उल्लंघन करता है, तो उसकी सदस्यता रद्द हो सकती है। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि यह कानून राज्यसभा चुनावों पर लागू नहीं होता। राज्यसभा चुनाव में पार्टी व्हिप जारी नहीं कर सकती और विधायक इसके लिए अयोग्य नहीं ठहराए जा सकते।
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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला (कुलदीप नायर बनाम भारत संघ, 2006)साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संवैधानिक पीठ ने स्पष्ट फैसला दिया था कि राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायक को सदन की सदस्यता से अयोग्य (Disqualify) नहीं ठहराया जा सकता। पार्टी अपने विधायक को क्रॉस वोटिंग के लिए पार्टी से निष्कासित (Expel) कर सकती है, लेकिन वह विधायक पद पर बना रहेगा। उदहरण के रूप में फरवरी 2024 में उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश के राज्यसभा चुनावों में बड़े पैमाने पर क्रॉस वोटिंग हुई। उत्तर प्रदेश में सपा (SP) के 7 विधायकों ने भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में क्रॉस वोटिंग किया। पार्टी ने उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की, लेकिन वे विधायक बने रहे। हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस के 6 विधायकों ने भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इन 6 विधायकों की सदस्यता क्रॉस वोटिंग के कारण नहीं गई, बल्कि अगले दिन विधानसभा में बजट प्रस्ताव पर पार्टी व्हिप का उल्लंघन करने और सदन से अनुपस्थित रहने के कारण स्पीकर ने उन्हें अयोग्य घोषित किया था।
