द फॉलोअप डेस्क
झारखंड अलग राज्य का गठन 15 नवंबर 2000 को हुआ था। वीएस दूबे राज्य के पहले मुख्य सचिव और शिवाजी महान कैरे पहले डीजीपी बनाए गए थे। राज्य गठन से ठीक पूर्व 12 नवंबर को कैरे को झारखंड का डीजीपी नियुक्त किया गया था। लेकिन नवंबर माह बीता और दिसंबर 2000 में ही शिवाजी महान कैरे को डीजीपी पद से हटा दिया गया। उन्हें डीजीपी पद से हटा कर सरकार ने डीजी होमगार्ड और अग्निशमन के पद पर भेज दिया। निवर्तमान डीजीपी अनुराग गुप्ता से भी राज्य सरकार को इस्तीफा लेना पड़ा है। इस्तीफा लेने के पीछे के कारण अभी बंद कमरों में कैद है। लेकिन शिवाजी महान कैरे को हटाये जाने के पीछे के कारण कुछ ही दिनों में सार्वजनिक हो गया था।
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झारखंड में भ्रष्टाचार के पौध राज्य गठन के साथ ही पनपने लगे थे। गठबंधन की सरकार होने के कारण सरकार का भी उस पर कोई खास नियंत्रण नहीं था। तत्कालीन बाबूलाल मरांडी की सरकार को गिराने के पीछे भी भ्रष्टाचार ही कारक थे। बाबूलाल मरांडी सरकार को अपदस्थ करने की हठ पर अड़नेवाले तत्कालीन समता पार्टी के विधायकों के गुस्से के केंद्र में भ्रष्टाचार ही था। वे अपने मतलब की योजनाओं की सरकार से स्वीकृति चाहते थे। मन मुताबिक विभागीय काम कराना चाहते थे। लेकिन ऐसा नहीं होने पर वे एकजुट हो गए और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को झारखंड में अपनी सरकार बचाने के लिए बाबूलाल मरांडी को अपदस्थ करना पड़ा। अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा।

इसी तरह ब्यूरोक्रेसी में भी भ्रष्टाचार पनपने लगे थे। उसे सत्ता के गलियारे से खाद-पानी मिलने लगा था। दक्षिणी छोटानागपुर की तत्कालीन आयुक्त शीला रपाज किस्कू पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे थे। सरकार में उनके कृत्य तेजी से फैल रहे थे। शिवाजी महान कैरे तक भी यह बात पहुंच रही थी। उन्होंने जाल बिछाया और शीला रपाज किस्कू को रंगे हाथ गिरफ्तार करने की योजना बना ली। लेकिन आईएएस अधिकारी होने के कारण, उन पर हाथ डालने से पहले सरकार की सहमति आवश्यक थी। बताते हैं कि जब स्वीकृति देने का विषय सीएम तक पहुंचा तो मामला काफी गर्म हो गया। शीला रपाज किस्कू पर छापेमारी की स्वीकृति तो नहीं ही मिली, दिसंबर 2000 में ही शिवाजी महान कैरे को डीजीपी पद से रुख्सत कर दिया गया। क्योंकि किस्कू के अलावा शिवाजी महान कैरे कई अन्य बड़े नेताओं और अधिकारियों को अपने टार्गेट में लेने की रणनीति बना रहे थे। उसके बाद तारकेश्वर प्रसाद सिन्हा उर्फ टीपी सिन्हा झारखंड के दूसरे डीजीपी बने।

अनुराग गुप्ता के मामले में भी कुछ न कुछ ऐसी अंदरुनी कहानी और तथ्य है जो उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके लिए स्वैच्छिक सेवानिवृति का आवेदन करना पड़ा। अनुराग गुप्ता का इस्तीफा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जब उन्हें सरकार छोड़ सभी हटा रहे थे, तब उन्होंने डीजीपी पद से चिपके रहे। उन्हें अवैध डीजीपी बतानेवालों में प्रतिपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी थे। केंद्र सरकार ने तो डीजीपी के पद पर उनकी नियुक्ति को ही असंवैधानिक करार दिया था। एजी ने केंद्र के फैसले के आलोक में वेतन पूर्जा जारी करना बंद कर दिया। एक माह वह बिना वेतन के भी डीजीपी के पद पर रहते हुए काम किया। उनकी नियुक्ति का मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन था। कतिपय अन्य विवादों से भी वह घिरे बताए गए। लेकिन उस वक्त उन्होंने डीजीपी पद से इस्तीफा नहीं दिया। 2027 तक डीजीपी बने रहने की जिद्द पर सरकार और गुप्ता दोनों ही अड़े रहे। लेकिन अब अचानक उन्होंने इस्तीफा दे दिया। हालांकि जिस दिन अनुराग गुप्ता को एसीबी और सीआईडी के प्रभार से हटाया गया था, उसी दिन से सत्ता के गलियारे और ब्यूरोक्रेसी में उनका सरकार के साथ बेहतर रिश्ते पर सवाल खड़े किए जाने लगे थे।

तदाशा मिश्र दूसरी प्रभारी डीजीपी बनी
मूल रूप से उड़ीसा की रहनेवाली तदाशा मिश्रा काफी दिनों से डीजीपी बनने की कोशिश में थी। लेकिन अनुराग गुप्ता को कार्यकाल विस्तार मिलने से डीजी रैंक का एक सीट वैकेंट नहीं हो रहा था। तदाशा मिश्रा 31 दिसंबर को रिटायर होनेवाली हैं। इस स्थिति में उन्हें 55 दिनों के लिए झारखंड का डीजीपी बनने का मौका मिल गया। सक्सेर लिस्ट में उनका नाम अंकित हो गया। तदाशा मिश्रा दूसरी प्रभारी डीजीपी बनी है। इससे पहले एमवी राव झारखंड के पहले प्रभारी डीजीपी बने थे। उनके साथ भी कुछ इसी तरह कहानी थी।
