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शादीशुदा महिला से संबंध रखना अपराध नहीं, झारखंड हाईकोर्ट ने रद्द की JAP कांस्टेबल की बर्खास्तगी

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द फॉलोअप डेस्क
झारखंड हाईकोर्ड ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि शादीशुदा महिला के साथ कथित तौर पर अवैध संबंध रखना अपराध नहीं है। यह फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने जैप के एक कांस्टेबल की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया है। दरअसल कांस्टेबल पर एक शादीशुदा महिला के साथ कथित तौर पर अवैध संबंध रखने का आरोप था। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि एडल्ट्री अब कोई आपराधिक कृत्य नहीं है। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी पाया कि विभाग ने कांस्टेबल को उस आरोप के आधार पर नौकरी से निकाला जो चार्जशीट का हिस्सा ही नहीं था। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है। यह आदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस दीपक रोशन की एकल पीठ ने कांस्टेबल द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया


2023 में दर्ज हुई थी शिकायत, विभाग ने की थी कार्रवाई
मामले के अनुसार, वर्ष 2023 में एक महिला ने कांस्टेबल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। महिला का आरोप था कि दोनों के पहले से शादीशुदा होने और बच्चों के बावजूद कांस्टेबल ने उससे कथित तौर पर शादी की और अक्टूबर 2019 से अप्रैल 2023 के बीच उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। बाद में उसने महिला को अपने साथ रखने से इनकार कर दिया। शिकायत के बाद कांस्टेबल के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई और विभागीय जांच शुरू की गई। इसके बाद पुलिस मैनुअल के नियम 824(बी) के तहत उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।


चार्जशीट में नहीं था बर्खास्तगी का आधार, कोर्ट ने माना अवैध
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि विभागीय चार्जशीट में केवल एक शादीशुदा महिला के साथ संबंध रखने और अनुशासनहीनता का आरोप था। लेकिन अंतिम बर्खास्तगी आदेश में आधार उस बलात्कार की एफआईआर को बनाया गया, जो चार्जशीट में शामिल ही नहीं थी। अदालत ने कहा कि सेवा नियमों के तहत किसी भी कर्मचारी को केवल उन्हीं आरोपों के आधार पर दंडित किया जा सकता है, जो चार्जशीट में दर्ज हों। कोर्ट ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता के बयानों के अलावा कोई स्वतंत्र या दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। कथित शादी, साथ रहने या अन्य आरोपों के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण, सीसीटीवी फुटेज या अन्य साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे।

हाईकोर्ट ने विभागीय आदेश किए रद्द
अदालत ने टिप्पणी की कि पुलिस विभाग के अनुशासनात्मक और अपीलीय अधिकारियों ने बिना पर्याप्त साक्ष्यों के कांस्टेबल को सेवा से हटाने जैसा कठोर फैसला लिया, जो अधिकारों के दुरुपयोग के समान है। साथ ही अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें एडल्ट्री (व्यभिचार) को आपराधिक अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया था। इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कांस्टेबल भरत पाठक की बर्खास्तगी और उनके खिलाफ जारी सभी विभागीय आदेशों को निरस्त कर दिया।
 

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