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धनबाद नगर निगम : मेयर पद अनारक्षित करने के मामले में सरकार ने दाखिल नहीं किया जवाब

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द फॉलोअप डेस्क
राज्य के नगर निगमों को दो समूहों में बांटने को लेकर दायर याचिका पर आज चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ में सुनवाई हुई। अदालत में राज्य सरकार, राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से जवाब दाखिल नहीं किया जा सका। इस पर नाराजगी जताते हुए अदालत ने सात जनवरी तक सरकार को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। अगली सुनवाई भी सात जनवरी को होगी। मालूम हो कि नगर विकास विभाग ने 16 अक्तूबर को एक अधिसूचना के माध्यम से राज्य के नौ नगर निगमों को दो श्रेणियों में विभक्त करने का निर्णय लिया है। सरकार के इस फैसले से रांची और धनबाद नगर निगम को एक समूह में रखा गया है। इस कारण रांची के मेयर का पद एसटी के लिए और धनबाद के मेयर का पद अनारक्षित हो जाएगा। सरकार के इस फैसले के विरोध में शांतनु चंद्रा उर्फ बब्लू पासवान ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर रखी है। उसी पर आज सुनवाई हुई। पिछली सुनवाई 17 नवंबर को हुई थी। उस दिन नगर विकास विभाग, राज्य निर्वाचन आयोग ने अदालत से जवाब दाखिल करने के लिए समय की मांग की थी। इस पर अदालत ने अगली सुनवाई की तिथि 17 दिसंबर तय की थी।


  प्रार्थी की तरफ से अदालत को बताया गया है कि राज्य सरकार ने कार्यपालिका आदेश के माध्यम से मेयर पद को दो वर्गों, ‘क’ और ‘ख’, में बांट दिया है, जो संविधान के प्रावधानों के खिलाफ है। यह निर्णय असंवैधानिक और अधिकारों का उल्लंघन करने वाला है, इसलिए इसे रद्द किया जाना चाहिए। अदालत को यह भी बताया गया कि नगर निकायों  का चुनाव 2011 की जनगणना के आधार पर कराए जा रहे हैं। इसी आधार पर आरक्षण सूची तैयार की गई है। जबकि जनसंख्या के आधार पर आरक्षण तय करने पर सबसे अधिक एसटी जनसंख्या होने के कारण आदित्यपुर नगर निगम के मेयर का पद एसटी के लिए और सबसे अधिक एससी जनसंख्या होने के कारण धनबाद नगर निगम के मेयर का पद एससी के लिए रिजर्व होगा।

लेकिन सरकार ने यहां 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले रांची और धनबाद नगर निगम को वर्ग क में रख कर खेल किया है। इससे रांची नगर निगम के मेयर का पद एसटी के लिए रिजर्व हो सकेगा। क्योंकि आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी से अधिक नहीं होने के कारण दो नगर निगमों के मेयर में एक ही पद रिजर्व हो सकता है। इस तरह रांची के मेयर का पद एसटी के लिए रिजर्व हो जाएगा और धनबाद के मेयर का पद अनारक्षित हो जाएगा। इसके विपरीत, गिरिडीह में अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 30 हजार है, फिर भी वहां के मेयर का पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दिया गया है। याचिकाकर्ता शांतनु चंद्रा ने इसे मनमाना और तर्कहीन बताते हुए कहा कि आरक्षण तय करने में जनसंख्या के वास्तविक आंकड़ों की अनदेखी नहीं की जा रही है।

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