पीयूष कुमार/गिरिडीह:
गिरिडीह जिले के डुमरी प्रखंड अंतर्गत छछन्दो पंचायत के चेगिंयापहारी गांव में इन दिनों भीषण जल संकट ने लोगों की जिंदगी को मुश्किल बना दिया है। करीब 30 घरों वाले इस गांव की लगभग 300 की आबादी पिछले 2 महीने गंभीर पेयजल संकट से जूझ रही है। गांव का जलमीनार पूरी तरह बंद पड़ा है और अधिकांश चापाकल भी खराब हो चुके हैं। स्थिति इतनी भयावह है कि ग्रामीणों, खासकर महिलाओं को रोजाना करीब 1 किमी दूर जंगल में स्थित एक जल स्रोत से पानी लाना पड़ रहा है। यह पानी साफ नहीं है, बल्कि काफी गंदा है, जिसे लोग कपड़े से छानकर पीने को मजबूर हैं।

पीने से लेकर प्रत्येक काम में इसी पानी का इस्तेमाल
गर्मी की शुरुआत में ही यह हाल है, जिससे आने वाले दिनों में हालात और बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है। गांव की निर्मला देवी बताती हैं कि पीने, खाना पकाने, कपड़े धोनी और नहाने के लिए हमें इसी पानी का इस्तेमाल करना पड़ता है। पानी काफी गंदा और दूषित है। हम पानी को साफ कपड़े की मदद से छानने की कोशिश करते हैं, लेकिन यह नाकाफी है। गांव की मालिका देवी कहती हैं कि जो पानी जानवर भी पीना पसंद नहीं करेंगे, वह हम इंसानों को पीने के लिए मजबूर होना पड़ता है। दूषित पानी पीने से अक्सर बीमार पड़ जाने का खतरा रहता है। महिलाओं का कहना है कि बच्चों को दूषित पानी से खासतौर पर खतरा है।

2 महीने से बंद पड़ गया है गांव का जलमीनार
स्थानीय जनप्रतिनिधि दीपक श्रीवास्तव का कहना है कि 2 महीने से गांव का जलमीनार बंद पड़ा है। वह जलमीनार के निर्माण में गुणवत्ता से समझौता करने का भी आरोप लगाते हैं। दीपक का कहना है कि हमने विभाग को कई बार आवेदन दिया। अधिकारियों से जलसंकट दूर करने की गुहार लगाई है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती। लोग यही गंदा और दूषित पानी पीने को विवश हैं। ग्रामीण विजय सिंह ने बताया कि महिलाओं को जंगल में पानी भरने और नहाने के लिए जाना पड़ता है, जिससे उन्हें डर का भी सामना करना पड़ता है। लेकिन पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए यह जोखिम उठाना उनकी मजबूरी बन गई है।
गर्मी का मौसम आते है चेंगियापहारी में जलसंकट
गर्मी का मौसम आते ही चेंगियापहारी गांव गंभीर जलसंकट का सामना कर रहा है। गांव वालों को पीने का साफ पानी भी नहीं मिल रहा है। बच्चों और महिलाओं को रोजाना सुबह देकची, तसला, घड़ा और डब्बा लेकर 1 किमी पैदल चलकर खेतों में बने कुएं में जाना पड़ता है। इससे काफी समय और उर्जा खर्च होती है। कई महिलाओं ने बताया कि चूंकि कुआं झाड़ियों के बीच सुनसान जगह पर बना है, इसलिए खतरा भी महसूस होता है। महिलायें, उस वक्त का इंतजार करती हैं जब गांव के अधिकांश लोग पानी लेने जाते हैं।