जीतेंद्र कुमार
भूखे को भोजन और प्यासे को पानी देने प्रवृत्ति अब बहुत पुरानी हो चुकी है। भूख लगते ही भोजन दे दो, प्यास लगते ही पानी दे दो तो, अब लोग इसे बहुत महत्व नहीं देते। एहसानमंद नहीं होते। दाता का नाम नहीं लेते। काल, समय और चक्र के अनुसार दान या मदद की इस प्रवृति में बदलाव आ रहा है। झारखंड के राजा साहब तो इस प्रवृत्ति पर पूरा विश्वास करते हैं। उनकी सोच और समझ बन बैठी है कि जब तक भूखे को खूभ भूख न लगे, भोजन नहीं दो। प्यास से कंठ नहीं सूखने लगे, पानी नहीं दो। जी यह सच ही नहीं 16 आने सच है। उनके साथ रहने वाले, उनको समझने वाले, उनके बॉडी लैंग्वेज से भांपने वाले, प्रमाण स्वरूप कई वाकया सुनाते हैं। बताते हैं कि कैसे राजा साहब जनहित के मुद्दों पर फैसले को अंतिम समय तक टालते जाते हैं। टालते जाते हैं। जब लगता है कि पानी नाक से ऊपर होने लगी है तो निर्णय लेकर सबको चौंका डालते हैं।

बताते हैं कि जब पेसा नियमावली को लागू करने का शोर जोर पर था, राजा साहब शांत थे। शोर और बढ़ने की प्रतीक्षा कर रहे थे। उस समय उन्होंने कुछ विधायकों के बीच कहा भी। अभी भूख और लगने दें। जब जोर की भूख लगती है तब भोजन देने का अलग ही मजा और आनंद मिलता है। हुआ भी वैसा ही। जब पेसा को लेकर हाईकोर्ट की भौएं चढ़ने लगी तब जाकर सरकार ने नियमावली को अधिसूचित किया। राजा के विरुद्ध ऊपज रहा सारा गुस्सा अचानक सा थम गया। यही हाल जेपीएससी अभ्यर्थियों की उम्र सीमा में छूट के मामले में हुआ। 14 फरवरी को फॉर्म भरने की तिथि समाप्त हो गयी। उम्र सीमा में छूट नहीं मिली। जेपीएससी ने फॉर्म भरने की तिथि बढ़ा कर 20 फरवरी कर दी। फिर भी कट ऑफ नहीं बढ़ा। अचानक 21 फरवरी को कट ऑफ डेट बढाने की घोषणा कर दी। अचानक से अभ्यर्थियों का आसमान चढ़ रहा गुस्सा फुस्स हो गया।
