जमशेदपुर
सारंडा और पोड़ाहाट के जंगल इन दिनों जैसे लंबी थकान के बाद कुछ थमे हुए नजर आते हैं. पहाड़ों पर पसरी धुंध, साल के पेड़ों से छनती धूप और सूखे पत्तों पर भागते कदमों के बीच अब गोलियों की गूंज भी पहले जितनी तीखी नहीं रह गई है. जिन जंगलों में कभी माओवादियों की समानांतर सत्ता चलती थी, वहां अब सुरक्षा बलों का दबाव लगातार बढ़ रहा है. लगातार चल रहे अभियानों ने जंगलों के भीतर वर्षों से जमे उस लाल नेटवर्क की कमर तोड़ दी है, जिसने कभी पूरे कोल्हान में भय, जनअदालत और बंदूक की सत्ता कायम कर रखी थी.
5 लाख का इनामी सागेन आंगारिया ने किया सरेंडर
इन्हीं बदलते हालातों के बीच एक नाम फिर चर्चा में है, सागेन अंगरिया. वही सागेन, जो कभी गांव-गांव घूमकर लोगों को नक्सलवाद से दूर रहने की सलाह देता था. वही सागेन, जिसने बाद में जंगलों में बंदूक की सत्ता चलायी. और अब वही सागेन आखिरकार हथियार छोड़ चुका है. दरअसल, झारखंड में नक्सल मोर्चे पर सुरक्षाबलों को बड़ी सफलता मिली है. रांची स्थित पुलिस मुख्यालय में ऑपरेशन ‘नवजीवन’ के तहत 25 भाकपा (माओवादी) और 2 जेजेएमपी उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें पांच लाख का इनामी माओवादी सागेन आंगारिया उर्फ दोकोल उर्फ याम लाल आंगारिया भी शामिल था. सूत्रों के अनुसार, सागेन ने 15 मई 2026 को आत्मसमर्पण किया था और अब उसे आधिकारिक रूप से पेश किया गया है. लेकिन, सागेन की कहानी सिर्फ एक इनामी नक्सली की कहानी नहीं है, बल्कि कोल्हान के उन जंगलों की त्रासदी भी है, जहां विकास की अनुपस्थिति ने बंदूकों को जन्म दिया और फिर बंदूक ने अपने ही लोगों को निगल लिया.
कभी नक्सलवाद के खिलाफ करता था बैठकी
पश्चिमी सिंहभूम जिले के गोइलकेरा प्रखंड स्थित सांगाजाटा गांव का रहने वाला 52 वर्षीय सागेन अंगरिया कभी गांव का ‘मुंडा’ हुआ करता था. आदिवासी परंपरागत शासन व्यवस्था में मुंडा गांव का प्रमुख माना जाता है और ग्रामीण समाज में उसकी बातों को महत्व दिया जाता है. एक समय ऐसा था जब सागेन गांवों में बैठकी कर लोगों को नक्सलियों से दूर रहने की सलाह देता था. उस दौर में जब माओवादी संगठन सारंडा छोड़कर कोल्हान के जंगलों में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा था, तब सागेन खुलकर उनके विरोध में बोलता था. वह ग्रामीणों से कहता था कि माओवादी संगठन से दूरी बनाये रखें और उनकी किसी भी बात में न आयें.

साल 2009 में सागेन ने नक्सवाद को अपनाया
लेकिन वर्ष 2009 में उसकी जिंदगी ने अचानक करवट ले ली. कुख्यात माओवादी नेता मेहनत उर्फ विभीषण उर्फ कुंबा मुर्मू उर्फ मोछ के संपर्क में आने के बाद सागेन धीरे-धीरे माओवादी संगठन के करीब पहुंच गया. जो व्यक्ति कभी संगठन के खिलाफ लोगों को जागरूक करता था, वही बाद में संगठन के लिए गांवों से चंदा और राशन जुटाने लगा. बताया जाता है कि वह गांव के प्रत्येक घर से 20 रुपये और चावल इकट्ठा कर संगठन तक पहुंचाने लगा. जंगलों की गहरी जानकारी, गांवों में मजबूत पकड़ और स्थानीय प्रभाव के कारण उसने बहुत कम समय में संगठन का भरोसा जीत लिया. धीरे-धीरे वह माओवादी संगठन का मजबूत चेहरा बन गया.
जनअदालत और हिंसा का सबसे खौफनाक अध्याय
वर्ष 2017 में सांगाजाटा गांव में हुई एक जनअदालत ने पूरे इलाके को दहला दिया था. सूत्रों के अनुसार, संगठन को भीमसेन अंगरिया पर पुलिस मुखबिरी का शक था. जनअदालत में भीमसेन अंगरिया और प्यारे लाल अंगरिया की जमकर पिटायी की गयी. बीच-बचाव करने पहुंची बूढ़ी मां और पत्नी तक को नहीं छोड़ा गया. लेकिन अगले दिन जो हुआ, उसने पूरे इलाके में दहशत फैला दी. बताया जाता है कि सागेन ने भीमसेन को घर से घसीटकर गांव की सड़क पर ले आया और टांगी से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया. उस दिन सिर्फ एक हत्या नहीं हुई थी. बल्कि, उस दिन जंगल ने एक आदमी के भीतर बची हुई आखिरी संवेदना को भी खत्म कर दिया था. इसके बाद सागेन का नाम पूरे इलाके में भय का पर्याय बन गया. उस पर कई ग्रामीणों की हत्या कराने और गरीब आदिवासियों को पुलिस मुखबिर बताकर मौत के घाट उतारने के आरोप लगे. गांवों में रात का मतलब डर बन गया. लोग बोलने से डरने लगे और जंगलों में खामोशी बढ़ती चली गई.

युवाओं को संगठन से जोड़ने का आरोप
सूत्र बताते हैं कि सागेन ने कोल्हान के गांवों से बड़ी संख्या में युवक-युवतियों को संगठन से जोड़ा. गांवों में मिलेसिया बैठकें होती थीं और “क्रांति” के नाम पर युवाओं को तैयार किया जाता था. इसके बाद सांगाजाटा के पहाड़ी और घने जंगलों में उन्हें हथियार चलाने तक की ट्रेनिंग दी जाती थी. किशन दा, मिसिर बेसरा और अनमोल दा जैसे शीर्ष माओवादी नेताओं की मौजूदगी भी इन जंगलों में बतायी जाती रही है. ग्रामीणों के अनुसार, एक दौर ऐसा था जब किशन दा को पालकी में बैठाकर गांवों में घुमाया जाता था. उस समय जंगलों में माओवादी सिर्फ संगठन नहीं, बल्कि समानांतर सत्ता चला रहे थे.
अब ढह रहा है लाल नेटवर्क
लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है. सुरक्षा बलों के लगातार अभियान, मुठभेड़ों में नक्सलियों के मारे जाने और बढ़ते आत्मसमर्पण ने संगठन को कमजोर कर दिया है. 29 अप्रैल को सुरक्षा बलों ने सागेन के दस्ते के एक लाख के इनामी सदस्य इसराइल पूर्ति उर्फ अमृत पूर्ति को मुठभेड़ में मार गिराया था. इसके बाद संगठन के भीतर लगातार दबाव और भय की स्थिति बतायी जा रही थी. सूत्रों के अनुसार, इसी दौरान रुटुगुटु के जंगलों में हुई मुठभेड़ में सागेन के पैर में गोली लगी थी. बताया जाता है कि घायल होने के बाद वह लगातार जंगलों में ठिकाने बदल रहा था और गुप्त रूप से इलाज करा रहा था. जंगलों में उसके आत्मसमर्पण की चर्चाएं भी तेज थीं. अब आखिरकार वह दिन आ गया, जब कभी बंदूक के दम पर जंगलों में भय कायम करने वाला सागेन अंगरिया हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौट आया.
मिसिर बेसरा और सालुका पुलिस का अगला टारगेट
सारंडा क्षेत्र में लगातार मिल रहीं चुनौतियों के बाद नक्सली संगठन अब अपने पुराने सुरक्षित ठिकाना पोड़ाहाट क्षेत्र की ओर रुख कर रहे हैं. पुलिस को अब आशंका है कि इस दुर्गम इलाके में एक करोड़ रुपये के इनामी पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा और सालुका जैसे शीर्ष नक्सली हो सकते हैं. सूत्रों के अनुसार, मुठभेड़ के बाद सुरक्षा एजेंसियों को नक्सलियों के मूवमेंट से जुड़े कई महत्वपूर्ण सुराग मिले हैं. पुलिस का मानना है कि सरक्षा बलों के बढ़ते दबाव के कारण नक्सली अब 7 से 8 सदस्यों के छोटे-छोटे समूहों में विभाजित हो गये हैं. वे जंगलों में अपने हथियार छुपाकर, सादे वेश में ग्रामीण क्षेत्रों की ओर निकलने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि आसानी से ग्रामीणों के बीच घुल-मिल सकें, इसे देखते हए सुरक्षा बलों ने संवेदनशील गांवों, पहाड़ी इलाको और जंगली रास्तों पर सख्त घेराबंदी कर सघन तलाशी अभियान शरू कर दिया है.
लाल साम्राज्य अब धीरे-धीरे ढह रहा है
इसी बदलते हालात के बीच सागेन अंगरिया सहित 25 नक्सलियों का आत्मसमर्पण सुरक्षा बलों के लिए बड़ी सफलता माना जा रहा है. कभी कोल्हान के जंगलों में भय, जनअदालत और बंदूक की सत्ता कायम करने वाले कई चेहरे अब मुख्यधारा में लौट चुके हैं. हालांकि, यह कहानी किसी व्यक्ति के महिमामंडन की नहीं, बल्कि उस हिंसक दौर के पतन की कहानी है, जिसने वर्षों तक जंगलों और गांवों को भय के साये में जीने को मजबूर किया. सारंडा और पोड़ाहाट के घने जंगलों में अब भी सुरक्षा बलों और बचे हुए शीर्ष नक्सली नेताओं के बीच अभियान जारी है. हर मुठभेड़, हर आत्मसमर्पण और हर टूटते नेटवर्क के साथ यह साफ होता जा रहा है कि कोल्हान में कभी बंदूक के दम पर खड़ा किया गया लाल साम्राज्य अब धीरे-धीरे ढह रहा है.
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