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राज्यसभा चुनाव : शुरू से अंत तक कांग्रेस की हर रणनीति फेल हुई, होटल में खाते और बतियाते रह गये बाहर से आये पर्यवेक्षक

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द फॉलोअप, रांची
राज्यसभा चुनाव का परिणाम आ चुका है। कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा बुरी तरह पराजित हो चुके हैं। अब एक दूसरे पर ठिकरा फोड़ने की प्रतिस्पर्द्धा शुरू है। क्रास वोटिंग को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर प्रारंभ है। हालांकि झामुमो, कांग्रेस, राजद और माले के बडे़ नेताओं को जानकारी भी मिल गयी है कि क्रास वोटिंग किसने की। क्योंकि विधायकों के बैलेट देखने की जिम्मेदारी निभानेवाले एजेंटों को पार्टी के अध्यक्षों ने ही चुना था। लेकिन यहां से बात निकल कर सार्वजनिक होगी, इसकी संभावना बहुत कम है। पार्टी कोई कार्रवाई भी करेगी, इसकी भी उम्मीद नगण्य है। भले ही आरोप प्रत्यारोप के क्रम में बातें तीखी जरूर होगी। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी ने राजद और माले पर क्रास वोटिंग का आरोप लगाया तो राजद विधायक दल के नेता सुरेश पासवान ने उन्हें गद्दार तक कह दिया है। झामुमो चुप है और कांग्रेस गहन मंथन में मशगूल हो गया है। लेकिन राज्यसभा चुनाव के इस पूरे प्रकरण में कांग्रेस की हर रणनीति फेल हुई।


चुनाव जीतने की रणनीति में कांग्रेस को पहले गठबंधन की गांठ को मजबूत करने की जरूरत थी। लेकिन कांग्रेस ऐसा नहीं कर सकी। पहले अपना प्रत्याशी घोषित कर ऑफेंसिव रणनीति भी पूरी तरह विफल रही। भले ही कांग्रेसियों द्वारा मनाने-समझाने के बाद झामुमो अपना गूस्सा थूक तो दिया, लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी को जिताने की जिम्मेदारी लेने से साफ साफ इंकार कर दिया। जिसका परिणाम भी दिखा। इतना ही नहीं जब सीएम हाउस में मॉक पोल हुआ तो झामुमो ने स्पष्ट कर दिया कि वह अपने उम्मीदवार को 30 वोट कास्ट कराएगा। चार मत कांग्रेस प्रत्याशी को देगा। जबकि जीत के लिए उसे प्रथम वरीयता के मात्र 28 वोटों की ही जरूरत थी। उसी समय यह स्पष्ट हो गया कि इंडिया गठबंधन के शेष सभी विधायक भी अगर प्रणव झा को वोट करते तो उसकी अधिकतम संख्या 26 होती, जो मैजिक नंबर 28 से दो कम था। यहां भी कांग्रेस खतरे को भांपने में विफल रहा। पार्टी एजेंट बनाने के मामले में कांग्रेस ने भले ही बाहरी नेताओं पर विश्वास किया, पर अन्य मामलों में लोकल नेताओं चुनाव में इन्वॉल्व नहीं किया गया। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री सुबोधकांत सहाय, सांसद कालीचरण मुंडा, सांसद सुखदेव भगत सरीखे नेताओं को कोई जिम्मेदारी नहीं दी गयी। फिर ये भी अपनी रश्म अदायगी करते रहे।

बाहर से आए पर्यवेक्षक पूरी तरह विफल रहे
झारखंड में राज्यसभा चुनाव की रणनीति को अंजाम तक पहुंचाने के लिए कांग्रेस ने कई पर्यवेक्षक बनाए। कई नेताओं को रांची भेजा गया। पहले छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और अजय शर्मा को भेजा गया। वे आए, मुख्यमंत्री से बंद कमरे में बतिआए और चले गए। बघेल ने इंडिया गठबंधन के विधायकों को बाहर ले जाने का प्रस्ताव दिया,लेकिन झामुमो के इंकार करने पर उसे समझाने में सफल नहीं हो सके। बाहर से सैयद नासिर, सिरिबेला प्रसाद सरीखे नेताओं को विशेष रूप से भेजा गया। इन लोगों ने बिहार से अखिलेश सिंह को भी बुलाया। लेकिन होटल में खाने-पीने और मुख्यमंत्री से बतियाने के अलावा कोई अन्य सफलता नहीं प्राप्त कर सके। प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को इसका भी मलाल है कि जब ये सीएम से मिलने जाते थे तो कभी कभी प्रदेश अध्यक्ष तक को महत्व नहीं देते। बंद कमरे में सीएम से बात करते और निकल जाते। जबकि भाजपा ने परिमल नाथवानी को जिताने के लिए अपनी पार्टी के हर वैसे बड़े नेताओं को एक्टिव कर रखा था, जिन्हें जमीनी हकीकत की बेहतर जानकारी थी। राज्य के प्रत्येक विधायक की एक्टिविटी, वैचारिक सोच और उनकी समझ को वे जानते और समझते हैं। कांग्रेस की समझदारी यहां भी समझ में आयी। कांग्रेस के प्रत्याशी और अन्य वरिष्ठ नेता  माले के दीपांकर भट्टाचार्य से रांची में मिले, राजद के वरिष्ठ नेता तेजस्वी से पटना में। मिलने के बाद भी वे उनको भांप नहीं सके। भांप लेते तो अतिरिक्त वोट का कोई वैकल्पिक व्यवस्था करते। इसका प्रमाण भी उन्होंने खुद दिया। राज्यसभा चुनाव परिणाम आते ही प्रदेश प्रभारी के राजू ने राजद और माले पर ही क्रास वोटिंग का पहला आरोप मढ़ दिया। होशियार सिर्फ भूपेश बघेल निकले जो आने के बाद गठबंधन की गाठों को समझ बैठे और फिर दुबारा नहीं आए।


के राजू, सैयद नासिर व अन्य लौटे, अब दिल्ली पर सबकी नजर
राज्यसभा चुनाव समाप्त होते ही प्रदेश कांग्रेस प्रभारी के राजू, सिरिबेला प्रसाद, सैयद नासिर हुसैन दिल्ली लौट गए हैं। वे वहां पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी को पूरे घटनाक्रम की जानकारी देंगे। प्रदेश कांग्रेस के हर बड़े नेता, कार्यकर्ता, मंत्री और विधायकों की नजर दिल्ली पर ही टिकी है। पार्टी के अगले फैसले का इंतजार करने लगे हैं। हालांकि प्रदेश के अधिकतर लोकल नेताओं, मंत्रियों और विधायकों को पूरा भरोसा है कि अभी पार्टी समर्थन वापस लेने जैसा कोई निर्णय नहीं लेगी। चुनाव में हारने के बाद भी मुख्यमंत्री आवास जाकर हेमंत सोरेन के प्रति धन्यवाद ज्ञापन को, ऐसे नेता इसी से जोड़ कर देखते हैं। लेकिन गठबंधन में आयी दरार और तीखा होता तकरार किसी अप्रत्याशित निर्णय होने का संकेत तो करने लगा है। यह अलग बात है कि इसका असर राज्य सरकार की सेहत पर नहीं पड़ेगा। सरकार यही रहेगी सिर्फ समर्थक बदलेंगे।

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