logo

दिशोम गुरु शिबू सोरेन: संघर्ष से सत्ता तक का सफर, पहली पुण्यतिथि पर जानिए उनकी राजनीतिक विरासत

ेपगवहरग.jpg

द फॉलोअप डेस्क

साल था 2019, जब झारखंड विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आई झारखंड मुक्ति मोर्चा। 2024 के विधानसभा चुनाव में भी यही कहानी दोहराई गई। हेमंत सोरेन की अगुवाई में लगातार दूसरी बार झारखंड में सरकार का गठन हुआ। 1973 में एक राजनीतिक संगठन के रूप में अस्तित्व में आने से लेकर 2026 तक झामुमो ने देश की राजनीति में बड़ा मुकाम बनाया, लेकिन पार्टी की इस पहचान के वास्तविक शिल्पकार दिशोम गुरु शिबू सोरेन हैं।

38 वर्षों तक संगठन को दी वैचारिक दिशा

1973 में पार्टी के पहले महासचिव होने से लेकर 2025 में निधन के समय दल के मुख्य संरक्षक होने तक गुरुजी ने इस दल को न केवल अपने संघर्षों से सींचा, बल्कि 1986 में झामुमो का अध्यक्ष बनने के बाद अगले 38 वर्षों में पार्टी को नई दिशा और वैचारिक धारा दी। 11 जनवरी 1944 को झारखंड के वर्तमान रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन को यदि आजाद भारत का सबसे महान आदिवासी नेता कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। समाज सुधार के कार्यों ने जहां उन्हें आदिवासी समाज में दिशोम गुरु की उपाधि दिलाई, तो वहीं राजनीतिक आंदोलन के जरिए शिबू सोरेन ने अलग झारखंड राज्य के सपने को हकीकत में तब्दील करने में महती भूमिका निभाई।

आंदोलन से लेकर संसद तक का मजबूत सफर

वर्ष 1962 में संताल नवयुवक संघ की स्थापना से लेकर वर्ष 1973 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) का गठन करने तक शिबू सोरेन की राजनीतिक विरासत काफी समृद्ध रही। दुमका लोकसभा सीट से आठ बार सांसद चुने जाने का रिकॉर्ड बनाया, वहीं चार बार राज्यसभा के सदस्य भी रहे। जिस झारखंड राज्य के लिए दशकों तक संघर्ष किया, उसी राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री भी बने। यूपीए-1 सरकार में कोयला मंत्री रहे। शिबू सोरेन ने अपने राजनीतिक कार्यकाल में सुनिश्चित किया कि जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों का हक सुरक्षित रहे। उन्हें शिक्षा का अधिकार मिले और सुदूर गांवों तक विकास पहुंचे।

18 साल की उम्र में शुरू किया आंदोलन

महज 18 वर्ष की उम्र में, 1962 में शिबू सोरेन ने संताल नवयुवक संघ की स्थापना की। 1970 के दशक में जब छोटानागपुर और संताल परगना में आदिवासियों की जमीन पर बाहरी लोगों का कब्जा बढ़ने लगा, तब उन्होंने इसके खिलाफ बड़ा जन-आंदोलन खड़ा किया। इसी संघर्ष ने आगे चलकर अलग झारखंड राज्य की मांग को नई दिशा दी। वर्ष 1972 में शिबू सोरेन ने बिनोद बिहारी महतो और ए.के. राय के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की नींव रखी। इसके बाद 2 फरवरी 1973 को धनबाद के गोल्फ ग्राउंड में आयोजित विशाल सभा में झामुमो का औपचारिक गठन हुआ। बिनोद बिहारी महतो अध्यक्ष बने, जबकि शिबू सोरेन महासचिव चुने गए।

हार से नहीं रुका चुनावी सफर

शिबू सोरेन का चुनावी सफर 1977 में टुंडी विधानसभा सीट से शुरू हुआ। यह उनका पहला चुनाव था, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। हार के बावजूद उन्होंने संगठन को मजबूत करना जारी रखा। 1980 में उन्होंने दुमका लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और पहली बार सांसद बने। हालांकि 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के पृथ्वी चंद किस्कू ने उन्हें हरा दिया। इसके बाद उन्होंने 1985 में जामा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और पहली बार विधायक बने। 1989 में दुमका से दोबारा लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। इसके बाद 1991 में भाजपा ने बाबूलाल मरांडी को उनके खिलाफ दुमका से मैदान में उतारा, लेकिन शिबू सोरेन ने फिर जीत दर्ज की। 1996 के लोकसभा चुनाव में दुमका सीट से उन्होंने बाबूलाल मरांडी को मात्र 5,478 वोटों से हराया। हालांकि 1998 में बाबूलाल मरांडी ने दुमका सीट पर उन्हें पराजित कर जीत हासिल की। इसके बाद शिबू सोरेन ने शानदार वापसी करते हुए 2004, 2009 और 2014 में दुमका लोकसभा सीट से जीत दर्ज की और अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखी।

तीन बार संभाली झारखंड की कमान

झारखंड आंदोलन का सबसे बड़ा पड़ाव 15 नवंबर 2000 को आया, जब लंबे संघर्ष के बाद अलग झारखंड राज्य का गठन हुआ। इस आंदोलन के सबसे प्रमुख नेताओं में शिबू सोरेन का नाम हमेशा सबसे आगे रहा। अलग राज्य बनने के बाद वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। पहली बार 2 मार्च 2005 से 11 मार्च 2005 तक मुख्यमंत्री रहे, लेकिन बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। दूसरी बार 27 अगस्त 2008 को मुख्यमंत्री बने। उस समय वे विधायक नहीं थे और छह महीने के भीतर चुनाव जीतना जरूरी था। उन्होंने तमाड़ विधानसभा उपचुनाव लड़ा, लेकिन निर्दलीय उम्मीदवार राजा पीटर से हार गए, जिसके बाद जनवरी 2009 में उन्हें पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद उन्होंने जामताड़ा विधानसभा उपचुनाव जीता और फिर 30 दिसंबर 2009 को तीसरी बार मुख्यमंत्री बने। हालांकि भाजपा द्वारा समर्थन वापस लेने के बाद 31 मई 2010 को उनकी सरकार गिर गई।

विवादों के बीच भी नहीं छोड़ी अधिकारों की लड़ाई

मुख्यमंत्री के अलावा शिबू सोरेन ने केंद्र सरकार में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। वे भारत सरकार में कोयला मंत्री रहे। हालांकि उनके राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव और विवाद भी आए, लेकिन उन्होंने आदिवासियों के अधिकार, स्थानीय पहचान और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों के हक की आवाज कभी कमजोर नहीं पड़ने दी। उनकी 'जंगल काटो' और 'खेत जोतो' जैसी रणनीतियां आदिवासी आंदोलनों की पहचान बनीं। उन्होंने झामुमो को एक क्षेत्रीय आंदोलन से निकालकर राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली दल के रूप में स्थापित किया। आज झारखंड की राजनीति में झामुमो की मजबूत स्थिति को उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत माना जाता है।

दिशोम गुरु के रूप में हमेशा रहेंगे अमर

दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जीवन केवल चुनाव जीतने या सत्ता हासिल करने तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने अपना पूरा जीवन आदिवासी समाज की पहचान, सम्मान और अधिकारों की लड़ाई में समर्पित कर दिया। साहूकारी, शराबखोरी और जमीन पर अवैध कब्जे के खिलाफ उनके आंदोलन ने हजारों आदिवासी परिवारों को नई उम्मीद दी। संसद से लेकर सड़क तक उन्होंने झारखंड की आवाज बुलंद की और अलग राज्य के सपने को साकार करने में निर्णायक भूमिका निभाई। यही वजह है कि आज भी झारखंड के लाखों लोग उन्हें केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि 'दिशोम गुरु' के रूप में श्रद्धा और सम्मान के साथ याद करते हैं।

Tags - Shibu Soren Jharkhand Politics JMM Political Legacy Jharkhand