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पुण्यतिथि विशेष : नेमरा से निकलकर दिशोम गुरु बनने तक, झारखंड की आवाज थे शिबू सोरेन

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सूरज ठाकुर
तारीख....5 अगस्त 2025। नेमरा की धरती शोक मना रही थी। क्यों? क्योंकि 4 अगस्त को नेमरा की धरती पर जन्मा झारखंड का सपूत बहुत दूर चला गया था। नेमरा से उठकर दिल्ली तक पहुंची आदिवासियत की सबसे मुखर आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई थी। 4 अगस्त, झारखंड के इतिहास में उस मनहूस तारीख के रूप में दर्ज होगी, जिस दिन गुरुजी ने दिल्ली में  अपनी आखिरी सांस ली थी। नेमरा गांव में तिल धरने की भी जगह नहीं थी। हजारों की भीड़ में कोई एक आंख नहीं थी, जो सजल ना हो। भीड़ के बीच तिरंगे में लिपटी एक पार्थिव देह थी, जिन्हें अंतिम बार प्रणाम कर लेने की अभिलाषा लिए लोग कतार में खड़े थे। केवल, झारखंड ही नहीं बल्कि ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार और छत्तीसगढ़ से सैकड़ों ऐसे कदम चले, जिनकी मंजिल उस दिन नेमरा ही थी। नेमरा, जिसने कभी बालक शिबू सोरेन की बालसुलभ चंचलता देखी और उनके दिशोम गुरु हो जाने का प्रताप भी देखा। नेमरा, जहां आदिवासियों का महानायक जन्मा। नेमरा, जहां जन्मा एक साधारण लड़का देशभर के आदिवासियों की आवाज बन गया।


नेमरा, जिसकी धरती ने एक ऐसे नायक को पाला-पोसा, जो आदिवासियों के हक और हुकूक की बात करने वाला सर्वकालिक महान आदिवासी योद्धा बना। योद्धा, जिनका ये मानना था कि राजनीतिक स्वायत्ता से आदिवासियों का आर्थिक विकास होगा। नायक, जिसने आदिवासी समाज को महाजनी और साहूकारी व्यवस्था से आजादी दिलाई। पुरोधा, जिसने आदिवासियों में अशिक्षा और नशे के खिलाफ लंबी जंग लड़ी। 
ये किस्सा है शिबू सोरेन का जिन्होंने संताल नवयुवक संघ और सोनोत संताल समाज से लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा तक का गठन करके नेमरा से रायसीना तक का सफर तय किया। 


आइये...जानते हैं कहानी पद्म भूषण दिशोम गुरु शिबू सोरेन की जो आदिवासी समाज के लिए निर्विवाद रूप से भारत रत्न हैं...
औपनिवेशिक भारत। महात्मा गांधी के नेतृत्व में ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ आंदोलन चरम पर था। ब्रिटेन से भारत की आजादी की रूपरेखा तैयार की जा रही थी। 11 जनवरी 1944 को तात्कालीन संयुक्त बिहार के आदिवासी बहुल गांव नेमरा में मास्टर सोबरन सोरेन की पत्नी सोनामुनी सोरेन ने बेटे को जन्म दिया। बालक का नाम रखा गया शिबू। पिता सोबरन सोरेन शिक्षक थे, इसलिए घर में पढ़ाई का माहौल था। शिबू सोरेन ने होश संभाला तो घर पर सही गलत, न्याय अन्याय, हक अधिकार और आजादी की बातें होती। पिता सोबरन सोरेन समाज को महाजनों और साहूकारों के जुल्मों के खिलाफ जागरूक करते थे। उन्हें, उनके अधिकारों के लिए लड़ना सिखा रहे थे। हालांकि, सोबरन सोरेन ने इसकी कीमत चुकाई। बहुत बड़ी कीमत, और इसने शिबू सोरेन के जीवन की धारा मोड़ दी। 


साल था 1957। भारत को आजाद हुए 11 साल बीत चुके थे। शिबू सोरेन 13 साल के थे, जब महाजनों ने पिता सोबरन सोरेन की हत्या करा दी। कोमल मन पर बड़ा आघात हुआ। जिस बालक को स्कूल जाना था। दोस्तों संग नदी में तैराकी सीखनी थी। पशुओं को चराते हुए बंसी बजाना था। उसके मन में प्रतिशोध पनप चुका था। लेकिन, इरादा केवल हत्यारों से बदला लेना नहीं था। पिता की सीख ऐसी थी कि नन्हें शिबू ने बदले की जगह बदलाव लाने का फैसला किया। वे केवल मर्ज नहीं, कारण का इलाज करना चाहते थे।


महाजन ऊंचे ब्याज दर पर कर्ज देकर आदिवासियों से उनकी जमीन हड़प लेते थे। 18 साल के युवा शिबू सोरेन ने 60 के दशक में संताल नवयुवक संघ नाम का संगठन बनाकर महाजनी और साहूकारी व्यवस्था के खिलाफ धनकटनी आंदोलन शुरू किया। वे गांव-गांव घूमकर आदिवासियों को इकट्ठा करते। उनसे शादियों और श्राद्ध सहित अन्य पारिवारिक सामाजिक कामों में कम खर्च करने के लिए कहते। उन्हें बताते कि अपनी जमीन पर अपना हक ना छोड़ें। वे रात को अपने साथियों संग धावा बोले देते और कब्जा की गई जमीन पर महाजन का लगाया धान काट लेते थे। शिबू सोरेन के नेतृत्व में धानकटनी आंदोलन ने आदिवासी समाज में हिम्मत का संचार किया। आदिवासियों को हक और अधिकार मांगने के लिए प्रेरित किया, जिसका नतीजा ये हुआ कि महाजनी और साहूकारी व्यवस्था की जड़ें हिलने लगी। 


इस दौरान शिबू सोरेन ने पाया कि नशा, आदिवासियों में एक बड़ी सामाजिक बुराई है। युवा वर्ग हड़िया, दारू और ताड़ी के नशे की गिरफ्त में है। तब, 1970 के आसपास शिबू सोरेन ने सोनोत संताल समाज का गठन करके नशामुक्ति आंदोलन छेड़ दिया। उन्होंने लोगों को शराब छोड़ने के लिए प्रेरित किया। गांवों में शराब बनाने और बेचने का विरोध किया। उन्होंने नशामुक्ति आंदोलन के दौरान बकायदा शराब बेचने और पीने वालों को सजा देने का प्रावधान भी बनाया। शिबू सोरेन देख पा रहे थे कि आदिवासी समाज के शोषण और पिछड़ेपन का आधार अशिक्षा है। उन्होंने यह भी समझा कि पूरे दिन खेतों और पहाड़ों में रोजी-रोटी के जुगाड़ में लगे लोग स्कूल नहीं जा सकते। ऐसे में उन्होंने कई गांवों में रात्रि पाठशालाओं की शुरुआत की। कहीं गुरुजी तो कहीं उनके सहयोगी रात को लोगों को पढ़ाते थे। शिबू सोरेन का मानना था कि लोग पढ़ेंगे तो अपने अधिकारों के प्रति स्वत जागरूक होंगे। कोर्ट-कचहरी, थाना और ब्लॉक में आदिवासियों की अशिक्षा का फायदा नहीं उठाया जा सकेगा। 


समाज सुधार के इन्हीं कामों की वजह से उन्हें, आदिवासी समाज ने नई उपाधि से नवाजा। शिबू सोरन अब दिशोम गुरु शिबू सोरेन कहलाने लगे। आदिवासियों ने उनको संत के रूप में देखा। इसी बीच उनकी जिंदगी में रूपी सोरेन आईं। पारिवारिक जिम्मेदारियां भी थीं, लेकिन समाज सुधार का काम अनवरत जारी रहा। शिबू सोरेन कई-कई दिन घर से बाहर रहते। कई रातें घर से बाहर बीतीं। इस दौरान रूपी सोरेन, उनकी ढाल बनकर खड़ी रहीं। उन्होंने परिवार का ध्यान रखा, ताकि गुरुजी की मुहिम रूके नहीं। 


शिबू सोरेन का मानना था कि राजनीतिक स्वायत्ता से ही आदिवासियों का आर्थिक विकास होगा। अलग झारखंड राज्य ही उनकी जिंदगी में समृद्धि लायेगा। 4 फरवरी 1973 को शिबू सोरेन ने विनोद बिहारी महतो और एके राय के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा नाम का राजनीतिक संगठन बनाया औऱ इसके पहले महासचिव बने। इस संगठन के जरिये अलग झारखंड राज्य की 4 दशक पुरानी मांग को धार दिया गया। शिबू सोरेन और उनके साथियों का मानना था कि जब तक अलग झारखंड राज्य नहीं बनेगा, आदिवासी अपना उचित हक नहीं हासिल कर पाएंगे। इनके प्रयासों से 15 नवंबर साल 2000 को अलग झारखंड राज्य अस्तित्व में आया। 


दिशोम गुरु शिबू सोरेन की बहुत समृद्ध राजनीतिक विरासत है। वे 8 बार लोकसभा सांसद चुने गये। 4 बार राज्यसभा के सदस्य बने। 3 बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे और केंद्र में कोयला मंत्री का ओहदा भी संभाला। 4 अगस्त 2025 को जब उनका निधन हुआ तो वे राज्यसभा के सदस्य थे। 23 जून 2026 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्मश्री से सम्मानित किया। शिबू सोरेन ने आदिवासियों को आवाज दी। गर्व से गर्दन ऊपर करके चलना सिखाया। जल, जंगल और जमीन के लिए लड़ने की हिम्मत दी। दिशोम गुरु ने भले ही नश्वर शरीर त्याग दिया हो, लेकिन उनके विचार झारखंड में हमेशा जिंदा रहेंगे। शिबू सोरेन की सामाजिक और राजनीतिक विरासत को बहुत गर्व से याद किया जायेगा।

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