जमशेदपुर:
दलमा वन्यप्राणी अभयारण्य में ईको-टूरिज्म के नाम पर बनाये गये कॉटेज अब झारखंड सरकार के लिए गले की फांस बनते नजर आ रहे हैं। विधानसभा में सरकार के उस जवाब के बाद, जिसमें उसने खुद स्वीकार किया कि कॉटेज निर्माण के लिए राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की अनुमति नहीं ली गयी, अब सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल इम्पावर्ड कमेटी ने मामले में सरकार से जवाब तलब किया है। कमेटी ने पूछा है कि आवश्यक वैधानिक स्वीकृति के बिना बनाये गये इन ढांचों को क्यों नहीं हटाया जाना चाहिए। मामले में अगली सुनवाई 9 सितंबर को होगी।

विधायक सरयू राय ने उठाया था सवाल
मामला जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय द्वारा विधानसभा में उठाये गये सवाल से जुड़ा है। सरयू राय ने 11 अगस्त 2026 को दलमा में ईको-टूरिज्म के नाम पर बनाये जा रहे कॉटेज और उनकी वैधानिक अनुमति को लेकर सरकार से सवाल पूछा था। सरकार ने अपने जवाब में बताया कि दलमा के महुआडांगा में 15 ईको कॉटेज बनाये गये हैं। हालांकि, विधायक के सवाल में 35 कॉटेज निर्माण का उल्लेख था। सरकार ने इन कॉटेज को दलमा के अनुमोदित मैनेजमेंट प्लान और अधिसूचित ईको-टूरिज्म जोन के तहत बताया और इन्हें गैर-स्थायी संरचना बताते हुए सिविल कार्य न्यूनतम होने का दावा किया। लेकिन इसी जवाब में सरकार की ओर से किया गया एक स्वीकार अब पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की अनुमति नहीं ली
सरकार ने माना कि इन कॉटेज के निर्माण के लिए राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की अनुमति नहीं ली गयी। यही मामला अब सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल इम्पावर्ड कमेटी के सामने पहुंच गया है। कमेटी ने झारखंड सरकार को नोटिस जारी कर बिना आवश्यक स्वीकृति बनाये गये ढांचों को हटाने के संबंध में अपना पक्ष रखने को कहा है।
बिना अनुमति बने कॉटेज को तुरंत हटाएं!
दलमा में निर्माण को लेकर जमशेदपुर के युवा अधिवक्ता प्रतीक शर्मा ने सेंट्रल इम्पावर्ड कमेटी के समक्ष आपत्ति दर्ज करायी थी। उन्होंने आवश्यक अनुमति के बिना बनाये गये ढांचों और कॉटेज को हटाने की मांग की। इस पर कमेटी ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है। अब 9 सितंबर को होने वाली सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि सरकार इन निर्माणों को लेकर क्या पक्ष रखती है और बिना राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की अनुमति के निर्माण को किस आधार पर वैध ठहराती है।
सरकारी खजाने से खर्च हुए 10 करोड़ रुपये
दलमा के ईको कॉटेज का मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इन पर सरकारी राशि खर्च होने की बात सामने आयी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन कॉटेज के निर्माण में 10 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किये गये हैं। वन विभाग की ओर से तैयार कराये गये इन कॉटेज का उद्घाटन तत्कालीन पर्यटन मंत्री ने किया था। अब यदि बिना आवश्यक अनुमति वाले इन ढांचों को हटाने का निर्देश लागू होता है तो सरकारी राशि से तैयार पर्यटन परिसंपत्ति को तोड़ने की स्थिति बनेगी। ऐसे में सवाल सिर्फ कॉटेज के निर्माण का नहीं, बल्कि बिना जरूरी अनुमति के सरकारी धन खर्च करने का भी है। निर्माण से पहले वैधानिक स्वीकृतियां क्यों नहीं ली गयी, किस स्तर पर इसकी जांच हुई और किसके निर्देश पर राशि खर्च कर निर्माण कराया गया, इन सवालों का जवाब भी महत्वपूर्ण हो गया है।
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अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होगी
सेंट्रल इम्पावर्ड कमेटी ने निर्माण हटाने के साथ ही ऐसे निर्माण की अनुमति देने या उसे होने देने वाले अधिकारियों की भूमिका की जांच कर उनकी जवाबदेही तय करने का निर्देश भी दिया है। ऐसे में अब निर्माण की योजना से लेकर स्वीकृति, राशि खर्च करने, निगरानी और निर्माण पूरा होने तक की पूरी प्रक्रिया जांच के घेरे में आ सकती है।
सरकार ने नहीं दिया था संतोषजनक जवाब
जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने कमेटी के आदेश से संबंधित जानकारी अपने मीडिया व्हाट्सप के जरिये साझा की है। उन्होंने कहा कि विधानसभा में सरकार की ओर से दिया गया जवाब संतोषजनक नहीं था। अब कमेटी के हस्तक्षेप के बाद दलमा में पर्यटन विकास के नाम पर हुए निर्माण की वैधानिकता, सरकारी राशि के इस्तेमाल और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर सवाल और गहरे हो गये हैं। यानी जिस निर्माण को सरकार ने अपने मैनेजमेंट प्लान और ईको-टूरिज्म जोन का हिस्सा बताया था, वही निर्माण अब इस सवाल के सामने खड़ा है कि राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की जरूरी अनुमति आखिर क्यों नहीं ली गयी। 9 सितंबर की सुनवाई में इसी सवाल पर सरकार का जवाब अहम होगा।