जीतेंद्र कुमार
झारखंड में हुए राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की हार अभी चर्चा के क्लाइमेक्स पर है। हर दल के नेता से लेकर कार्यकर्ता तक इस पर अपना ज्ञान दे रहे हैं। उसने क्रास वोट किया, उसने यह ले लिया,पर ही उलझे हुए हैं। लेकिन पर्दे के पीछे के असली मदारी जो बता रहे हैं, वे राजनीति के शातिर चालों को भविष्य में समझने के लिए काफी है। जानकार बता रहे हैं कि नाथ का निर्दलीय प्रत्याशी बनना उसी दिन तय हो गया था जब कांग्रेस ने उनके नाम पर सहमति देने से साफ इंकार कर दिया। यह कांग्रेस की रणनीतिक भूल थी। वे सवाल खड़ा करते हैं कि प्रणव झा के राज्यसभा जाने से झामुमो, राजद या माले को क्या लाभ था। इसे कांग्रेस ने नहीं समझा। कांग्रेस आलाकमान यह भी नहीं समझ पाया कि उनकी पार्टी के ही विधायक प्रणव झा के पक्ष में नहीं हैं। अभी झारखंड में कुछ वर्षों तक कोई चुनाव होने वाला नहीं है। कुछ आनेवाला नहीं है। उस स्थिति में हर दल का विधायक बहती गंगा में हाथ धोने को तैयार बैठा था। किसी थैली शाह के आने का बेसब्री से इंतजार कर रहा था। फिर क्रास वोटिंग को कैसे कोई रोक लेता। यही कारण है कि जानकार दावा करते हैं कि के राजू के पार्टी एजेंट बनने के बाद भी कांग्रेस का एक विधायक क्रास वोट किया।
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पर्दे के पीछे रहे जानकार बताते हैं कि भाजपा हो या झामुमो सुनिश्चित सीट पर कभी कोई रिस्क नहीं लेता है। झामुमो के लिए एक सुरक्षित सीट था, उस पर उसने दलित कार्ड खेला। भाजपा के लिए भी जब राज्यसभा में सुरक्षित सीट दिखायी दिया, प्रदीप वर्मा और आदित्य साहु को भेजा। लेकिन जब असुरक्षित सीट का सवाल आया तो भाजपा ही नहीं झामुमो ने भी थैली शाह पर गेम खेला। यह राजद और माले को भी रास आया। और यही होता भी रहा है। लेकिन असुरक्षित सीट पर कांग्रेस निष्ठावान कार्यकर्ता को भेजने की जिद्द पर अड़ गया। वर्तमान राजनीति में कोई निष्ठा, सुचिता और संस्कार नहीं होता। यह कांग्रेस की रणनीतिक भूल थी। रणनीति के जानकार और समझदार दावा करते हैं कि अगर प्रणव झा की जगह धीरज साहु कांग्रेस के उम्मीदवार होते तो रिजल्ट और परिदृश्य अलग होता। क्योंकि वे सबको भाते। लेकिन प्रणव के विरुद्ध नाथ के आने से कांग्रेस छोड़ सभी दलों के लिए सर्वे भवंतु सुखिनः वाली स्थिति हो गयी। फिर भला कांग्रेस को सहयोगियों का साथ कैसे मिलता।
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