द फॉलोअप डेस्क
निकाय चुनाव के रंग अब कुछ कुछ दिखने लगा है। 23 फरवरी का दिन नजदीक आते जाने के साथ रंग कहीं गाढ़ा तो कहीं बदलता हुआ भी दिख रहा है। इसको लेकर प्रत्याशी परेशान भी हैं। रांची और मानगो नगर निगम के मेयर पद को लेकर आदिवासी और अल्पसंख्यक वोट बैंक, फोकस प्वाइंट होता जा रहा है। रांची में आदिवासी-क्रिश्चियन वोट कहां जाएगा तो मानगो के अल्पसंख्यक क्या करेंगे। जीत-हार का आधार ही इन्हीं दोनों वोट बैंक पर निर्भर करेगा। वैसे तो इस वोट बैंक पर सबकी नजर है। लेकिन कांग्रेस और झामुमो प्रत्याशियों के लिए यह वोट बैंक बूस्टर डोज के रूप में काम करेगा।
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रांची में एक ही मारा-मारी, अल्पसंख्य वोट हो जाए हमारी
रांची नगर निगम के मेयर पद का चुनावी परिदृश्य अब कुछ कुछ झलकने लगा है। स्पष्ट रूप से यहां त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति बन रही है। भाजपा समर्थित रोशनी खलखो, कांग्रेस समर्थित रमा खलखो और झामुमो समर्थित सुजीत विजय आनंद कुजूर रेस में हैं। रोशनी खलखो को राजधानी के परंपरागत भाजपा मतदाताओं का पूरा भरोसा है। इसके अलावा वह आदिवासी होने के नाते इस वोट बैंक में भी सेंधमारी की पूरी कोशिश कर रही है। राजधानी के अलग अलग इलाकों में छिटपुट ढंग से बसे आदिवासी मतदाताओं को में पैठ लगाने की कोशिश में जुटी है। इधर पूर्व मेयर रही कांग्रेस समर्थित रमा खलखो को परंपरागत कांग्रेसियों के समर्थन का पूरा भरोसा है। लेकिन उनकी परेशानी का सबसे बड़ा सबब अल्पसंख्यक वोटों को एकजुट करना है। सुजीत विजय आनंद कुजूर के मैदान में उतरने और झामुमो का समर्थन मिलने से यह स्थिति पैदा हुई है। रमा खलखो की पिछली जीत के पीछे परंपरागत कांग्रेसियों के अलावा ईसाई-मुसलिम मतों की गोलबंदी रही थी। इन दोनों समुदाय के मतदाताओं ने उन्हें थोक में वोट दिया था। लेकिन इस बार सुजीत के मैदान में मजबूती से ताल ठोकने के कारण स्थिति कुछ बदली हुई है। पिछले कुछ वर्षों से आदिवासी मतदाताओं का झुकाव झामुमो की ओर दिख रहा है। अल्पसंख्यक मुसलिम मतदाताओं का झुकाव भी कांग्रेस से बिछड़ कर झामुमो की ओर जाता हुआ दिखायी पड़ने लगा है। सुजीत विजय आनंद कुजूर के आदिवासी कम ईसाई समुदाय से आने की वजह से रमा के लिए परेशानी का मुख्य कारण है। इतना ही नहीं पिछले चुनावों में जिस तरह सुबोधकांत सहाय का रमा खलखो को समर्थन और सहयोग मिला था, अरसे से सत्ता से बाहर रहने के कारण वह अब इस बार उस जोश और जज्बे में नहीं है।

मानगो में अल्पसंख्यक मतदाताओं की एकजुटता और बिखराव पर निर्भर करेगा बन्ना गुप्ता की प्रतिष्ठा
मानगो नगर निगम के मेयर पद का चुनाव भी कम दिलचस्प स्थिति में नहीं है। पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता की अपनी पत्नी को मेयर बनाने की तमन्ना पर वहां के अल्पसंख्यक मतदाता ग्रहण लगाते दिख रहे हैं। मालूम हो मानगो नगर निगम क्षेत्र में बड़ी संख्या में बसने वाले मुसलिम मतदाता बन्ना गुप्ता या भाजपा विरोधी दलों की ताकत हुआ करते हैं। लेकिन इस बार वहां कांग्रेस की बड़ी नेत्री जेबा खान के विद्रोही तेवर और जेबा कादरी की मुसलिम मतदाताओं के बीच की पकड़ से मामला उलझ गया है। बन्ना गुप्ता की पत्नी सुधा गुप्ता को कांग्रेस ने समर्थन किया है। इसके बावजूद जेबा खान के चुनाव मैदान में खड़े रहने से कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से निलंबित करना पड़ा है। इसके बाद जेबा खान और आग उगल रही है। जेबा कादरी भी अल्पसंख्यक मतदाताओं को अपने पक्ष में करने में जुटी है। इस असहज स्थिति को बन्ना गुप्ता भी समझ रहे हैं। हालांकि अल्पसंख्यक मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग अभी भी बन्ना के ही पक्ष में दिखायी पड़ रहा है। यह उनकी प्रत्याशी पत्नी के लिए प्राण वायु के रूप में काम कर सकता है। लेकिन झामुमो का यहां भाजपा नेत्री लक्की सिंह का समर्थन करने की रणनीति को राजनीति के जानकार समझ नहीं पा रहे हैं। डिकोड नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि लक्की सिंह की मजबूती वहां दोधारी तलवार के रूप में काम कर सकती है। वह मजबूत होगी तो जितना भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाएगी, उतना ही सुधा गुप्ता को भी डैमेज करेंगी।
