द फॉलोअप डेस्क
नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने शनिवार को जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित तुलसी भवन के प्रयाग कक्ष में प्रेस वार्ता कर MMDR एक्ट को लेकर झारखंड सरकार पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की नीतियों का प्रतिकूल असर उद्योग, रोजगार और खनिज आधारित अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। मरांडी ने आरोप लगाया कि झामुमो-कांग्रेस गठबंधन की सरकार अपनी नाकामियों को छिपाने और जनता को भ्रमित करने के लिए MMDR एक्ट को राजनीतिक मुद्दा बना रही है। उन्होंने कहा कि MMDR एक्ट संसद से पारित होकर राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून बन चुका है और यह केवल झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश में लागू है। झारखंड में लागू होने वाले प्रावधान ओडिशा, छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों में भी लागू होंगे। उनके मुताबिक कानून में मुख्य रूप से मेजर मिनरल्स पर राज्य सरकारों की ओर से मनमाने अतिरिक्त सेस या टैक्स लगाने को लेकर प्रावधान किया गया है, जबकि लघु खनिज इससे बाहर हैं और उन पर राज्यों के अधिकार पहले की तरह बने हुए हैं। मरांडी ने कहा कि झारखंड में कोयला और आयरन ओर जैसे प्रमुख खनिजों पर लगाए गए अतिरिक्त कर का सीधा असर उद्योगों की लागत और प्रतिस्पर्धा पर पड़ रहा है। उन्होंने दावा किया कि राज्य सरकार कोयले पर 450 रुपये और आयरन ओर पर 600 रुपये प्रति टन अतिरिक्त कर ले रही है। 30 टन कोयला ले जाने वाले एक हाइवा या ट्रक पर इससे करीब 13,500 रुपये और 30 टन आयरन ओर पर करीब 18,000 रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। उनका कहना था कि जमशेदपुर जैसे औद्योगिक शहर में इसका प्रभाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि स्टील उद्योग में कोयला और आयरन ओर दोनों प्रमुख कच्चे माल हैं। मरांडी ने कहा कि यदि झारखंड में खनिज दूसरे राज्यों की तुलना में महंगे होंगे तो उद्योग ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ या अन्य राज्यों से सस्ता कोयला और आयरन ओर खरीदने को मजबूर होंगे। इससे झारखंड के उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित होगी और उत्पादन व रोजगार पर भी असर पड़ सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले करीब साढ़े छह वर्षों में राज्य में कोई नया बड़ा कल-कारखाना लगाने के बजाय पहले से स्थापित उद्योगों के सामने भी मुश्किलें खड़ी की जा रही हैं।

राज्यों की खनिज आय में हिस्सेदारी बढ़ने का दावा
बाबूलाल मरांडी ने केंद्र और राज्यों के बीच खनिज राजस्व के बंटवारे का आंकड़ा भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014-15 से पहले राज्यों को केंद्र से खनिजों से प्राप्त राजस्व का 60.24 प्रतिशत हिस्सा मिलता था, जबकि केंद्र के पास 39.76 प्रतिशत रहता था। उनके अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के कार्यकाल में राज्यों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ाई गई और वर्ष 2025-26 तक यह 88.53 प्रतिशत हो गई, जबकि केंद्र का हिस्सा 11.47 प्रतिशत रह गया। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2014-15 में देश के राज्यों को खनिजों से करीब 25,000 करोड़ रुपये मिले थे, जो वर्ष 2025-26 तक बढ़कर 1,14,549 करोड़ रुपये हो गए। मरांडी ने इसे राज्यों को अधिक संसाधन उपलब्ध कराने की केंद्र सरकार की नीति का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए जिला खनिज प्रतिष्ठान यानी DMF की व्यवस्था भी की है और उनके अनुसार पिछले दस वर्षों में झारखंड को DMF के जरिए 19,000 करोड़ रुपये से अधिक प्राप्त हुए हैं। उन्होंने कहा कि खनिज संपदा वाले राज्यों को अधिक राजस्व और खनन प्रभावित इलाकों के विकास के लिए संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में केंद्र सरकार ने कई कदम उठाए हैं। खनिज खदानों की नीलामी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 2015 के बाद खदानों की पारदर्शी नीलामी की व्यवस्था लागू की गई। उनके अनुसार नीलामी के बाद राज्यों को रॉयल्टी के रूप में करीब 2.32 लाख करोड़ रुपये और नीलामी प्रीमियम के रूप में करीब 96,000 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं।

झारखंड में खदानों की नीलामी और अवैध खनन पर सवाल
मरांडी ने आरोप लगाया कि झारखंड में बड़ी मात्रा में खनिज संपदा होने के बावजूद राज्य सरकार उसका समुचित इस्तेमाल नहीं कर पा रही है। उन्होंने दावा किया कि पिछले करीब छह वर्षों में आयरन ओर और कोयला खदानों की नीलामी अथवा संचालन शुरू कराने के मामले में राज्य सरकार अपेक्षित कदम नहीं उठा सकी। उन्होंने पश्चिमी सिंहभूम के सारंडा क्षेत्र का जिक्र करते हुए कहा कि आयरन ओर की कई खदानें बंद पड़ी हैं, जिससे स्थानीय बाजार और रोजगार प्रभावित हुए हैं तथा मजदूरों को काम की तलाश में दूसरे क्षेत्रों की ओर जाना पड़ रहा है। इसके विपरीत उन्होंने ओडिशा का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां खनन गतिविधियों के कारण आर्थिक गतिविधियों में तेजी आई है। उन्होंने कहा कि झारखंड में देश के कुल खनिज भंडार का करीब 40 प्रतिशत संचित भंडार होने की बात कही जाती है, लेकिन इसके बावजूद राज्य की आर्थिक स्थिति और खनन प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। मरांडी के अनुसार ओडिशा में 74 खदानों की नीलामी की गई, जिनमें 35 खदानों में काम शुरू हो चुका है और वित्तीय वर्ष 2020-21 से 2025-26 के बीच केवल प्रीमियम से ओडिशा सरकार को करीब 87,000 करोड़ रुपये मिले हैं। उन्होंने कहा कि अगर झारखंड में भी समय पर आयरन ओर की खदानों की नीलामी हुई होती तो राज्य के खजाने में बड़ी राशि आती और खनन क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां बढ़तीं। प्रेस वार्ता में उन्होंने अवैध कोयला खनन, आयरन ओर के अवैध उत्खनन और परिवहन को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। उनका दावा था कि राज्य के अलग-अलग हिस्सों में अवैध कोयला उत्खनन और परिवहन हो रहा है तथा सारंडा क्षेत्र में भी अवैध आयरन ओर उत्खनन और परिवहन की गतिविधियां चल रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ स्पंज आयरन इकाइयों के संचालकों की शिकायत है कि उन्हें वैध स्रोत से खनिज उपलब्ध नहीं हो पाता और अवैध माध्यम से खनिज खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है। मरांडी ने आरोप लगाया कि इससे अवैध आर्थिक लाभ की व्यवस्था को बढ़ावा मिल रहा है और इसी वजह से पारदर्शी नीलामी तथा वैध खनन व्यवस्था को आगे बढ़ाने में रुचि नहीं दिखाई जा रही। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अवैध खनन और परिवहन से होने वाला आर्थिक लाभ सत्ता से जुड़े लोगों तक पहुंच रहा है। हालांकि, ये राजनीतिक आरोप हैं और प्रेस वार्ता में इनके समर्थन में कोई स्वतंत्र दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया।
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राज्य सरकार से खनन नीति पर ठोस कदम उठाने की मांग
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि झारखंड सरकार को केंद्र पर आरोप लगाने के बजाय यह बताना चाहिए कि राज्य की खनिज संपदा का इस्तेमाल कर रोजगार और राजस्व बढ़ाने के लिए पिछले वर्षों में उसने क्या कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व बंटवारे के आंकड़े बताते हैं कि खनिज संपदा वाले राज्यों को पहले की तुलना में अधिक संसाधन मिल रहे हैं। उन्होंने दोहराया कि MMDR एक्ट पूरे देश में समान रूप से लागू है और इसका उद्देश्य खनिज संसाधनों के प्रबंधन तथा राज्यों को मिलने वाले राजस्व की व्यवस्था को सुव्यवस्थित करना है। मरांडी ने झामुमो-कांग्रेस पर इस कानून को लेकर जनता के बीच भ्रम फैलाने का आरोप लगाया और कहा कि राज्य सरकार को राजनीतिक बयानबाजी के बजाय उद्योग, रोजगार और खनिज आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए। पत्रकारों के सवालों के जवाब में उन्होंने मेजर मिनरल्स पर केंद्र और राज्य सरकार के अधिकार तथा खदानों की नीलामी का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि जिन खदानों के पुराने लीज समाप्त हो चुके हैं, उन्हें नियमों के अनुसार नीलामी के जरिए आगे बढ़ाया जाना चाहिए था। उनका आरोप है कि कई मामलों में नीलामी नहीं होने से खनन गतिविधियां लंबे समय से प्रभावित हैं। उन्होंने कहा कि झारखंड के पास प्रचुर खनिज संपदा है, लेकिन यदि उसका पारदर्शी और नियमसम्मत तरीके से उपयोग नहीं किया गया तो राज्य को अपेक्षित आर्थिक लाभ और रोजगार नहीं मिल पाएगा। उन्होंने राज्य सरकार से खदानों की नीलामी, वैध खनन को बढ़ावा देने और उद्योगों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने की दिशा में ठोस कदम उठाने की मांग की। प्रेस वार्ता में झारखंड भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अभय सिंह, भाजपा जमशेदपुर महानगर अध्यक्ष संजीव सिन्हा और जिला मीडिया प्रभारी प्रेम कुमार झा भी मौजूद रहे।