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छात्र आंदोलन : गतिरोध और सन्नाटे को तोड़ने के लिए अब कोई तो आगे आए

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मनोज कुमार पांडेय
झारखंड की राजधानी रांची, जिसे राजनीतिक गतिविधियों और छात्र आंदोलनों की जन्मस्थली माना जाता है, इन दिनों एक अजीब से सन्नाटे और गतिरोध को महसूस कर रही है। कभी नियोजन नीति, जेपीएससी जेएसएससी और स्थानीय नीति के मुद्दों पर धधकने वाली रांची की सड़कें आज एक अजीब सी सुस्ती का शिकार हैं। सरकार और छात्रों के बीच मची खींचतान में ऐसा प्रतीत होता है कि पूरा आंदोलन "पहले आप, पहले आप" की कशमकश में फंसकर रह गया है। इस वैचारिक और रणनीतिक ठहराव ने युवाओं के भविष्य को एक अनिश्चित भंवर में धकेल दिया है। इस ठहराव के असल कारण क्या हैं और इसके पीछे की राजनीतिक-सामाजिक विडंबनाएं क्या हैं।


कूटनीति और आपसी अविश्वास
इस पूरे गतिरोध का सबसे बड़ा कारण सत्ता पक्ष और छात्र संगठनों के बीच संवादहीनता और एक-दूसरे पर टालने की प्रवृत्ति है, विधानसभा घेराव के बाद से अबतक ना तो सरकार के तरफ से और ना हीं छात्रों या बनी कमिटि के तरफ से पहले की जा रही है। ऐसा लग रहा है जैसे हर किसी के मन में बस यही चल रहा है कि इतना जल्दी क्या है पहले दूसरे काम निपटा दिया जाये फिर देखा जायेगा आंदोलन या छात्र के मुद्दों को, अब ऐसा लग रहा है कि सत्ता में बैठे राजनेताओं और प्रशासनिक तंत्र का रवैया यह संदेश दे रहा है कि "पहल छात्रों की ओर से हो, वे आएं और अपनी मांगें रखें।" सरकार कई मोर्चों पर खुद को नीतिगत जटिलताओं (जैसे कानूनी अड़चनें और अदालत के फैसले) में घिरा हुआ पाती है, जिससे वह ठोस और निर्णायक कदम उठाने से बचती है।


छात्रों की दुविधा
छात्र नेतृत्व इस बात को लेकर सशंकित रहता है कि यदि उन्होंने अपनी तरफ से कोई ढिलाई बरती, तो सरकार उन्हें हल्के में ले लेगी। छात्र यह चाहते हैं कि सरकार खुद संज्ञान लेकर बिना किसी दबाव के पारदर्शी नीतियां बनाए। दोनों पक्षों की इसी जिद—कि पहल सामने वाला करे—ने संवाद के सभी दरवाजों को लगभग बंद कर दिया है, जिससे हर मुद्दा कागजों और आश्वासनों की फाइलों में फंसकर रह गया है।


आंदोलन में बिखराव और नेतृत्व का संकट
एक समय पर जब रांची में छात्र सड़क पर उतरते थे, तो पूरा प्रशासन हिल जाता था। आज स्थिति बदल चुकी है, जिसके पीछे कई आंतरिक कारण हैं। छात्र आंदोलन अब किसी एक स्पष्ट वैचारिक मंच के तहत नहीं, बल्कि कई छोटे-छोटे क्षेत्रीय और वैचारिक धड़ों में बंट चुका है। कई बार छात्र नेताओं पर राजनीतिक दलों के इशारे पर काम करने के आरोप लगते हैं, जिससे कुछ आम छात्रों का विश्वास आंदोलन से उठने लगा है। प्रदर्शनों और नारेबाजी से आगे बढ़कर कानूनी और वैचारिक रूप से मजबूत रणनीति तैयार करने का अभाव है। जब तक आंदोलन केवल भावनात्मक उद्वेलन पर आधारित रहेगा, तब तक वह प्रशासनिक तंत्र को घुटने टेकने पर मजबूर नहीं कर सकता। बार-बार परीक्षाएं रद्द होना, पेपर लीक होना और लंबी कानूनी लड़ाइयां लड़ने के बाद मिलने वाली असफलता ने युवाओं के मनोबल को तोड़ दिया है। आज रांची का युवा ऊर्जा से भरा होने के बावजूद मानसिक रूप से थका हुआ महसूस करता है।


प्रशासनिक सुस्ती और कानूनी उलझनें
झारखंड में नौकरियों और नियुक्तियों का इतिहास कानूनी पेंचों से जुड़ा रहा है। हर बार जब सरकार कोई नई नीति लाती है, वह उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट की कानूनी समीक्षा के दायरे में आकर अटक जाती है। प्रशासन अक्सर इन्हीं कानूनी अड़चनों को एक ढाल के रूप में इस्तेमाल करता है, जिससे छात्रों का यह मानना और पुख्ता हो जाता है कि सरकार के पास इच्छाशक्ति की कमी है। यह कानूनी दांव-पेंच बनाम जन-भावना का संघर्ष एक ऐसा दलदल बन चुका है जिससे बाहर निकलने का मार्ग दोनों पक्षों को नहीं सूझ रहा है।


दांव पर झारखंड के युवाओं का भविष्य
इस ठहराव की सबसे बड़ी कीमत रांची में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाला आम छात्र चुका रहा है। बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के दूर-दराज के जिलों से रांची आकर छोटे कमरों और लॉज में रहने वाले छात्र वर्षों से एक ही उम्मीद में जी रहे हैं कि कभी तो परीक्षा पारदर्शी तरीके से होगी। उम्र की सीमा पार होने का डर उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रहा है।  अवसरों के अभाव और इस अनिश्चितता के माहौल के कारण झारखंड की मेधा  अन्य राज्यों या निजी क्षेत्रों की ओर पलायन कर रही है, जो राज्य के दीर्घकालिक विकास के लिए एक खतरनाक संकेत है। 


गतिरोध तोड़ने की जरूरत
पहले आप, पहले आप के इस खेल में अगर किसी की सबसे बड़ी हार हो रही है, तो वह झारखंड की युवा शक्ति और खुद राज्य का भविष्य है। इस ठहराव को तोड़ने के लिए अब वक्त आ गया है कि सरकार बिना किसी अहंकार के सीधे तौर पर छात्र प्रतिनिधियों के साथ एक पारदर्शी और समयबद्ध उच्च-स्तरीय मंच पर संवाद स्थापित करे। छात्र भी अपनी रणनीतियों को परिपक्व बनाते हुए भावनात्मक प्रदर्शनों के साथ-साथ बौद्धिक और कानूनी दांवपेच पर भी उतनी ही मजबूती से काम करें। जब तक दोनों पक्ष अपनी जिद छोड़कर झारखंड के व्यापक हित को सर्वोपरि नहीं रखेंगे, तब तक रांची की सड़कों पर केवल सन्नाटा और हवा में तैरते हुए अधूरे वादे ही शेष रहेंगे।


 

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