जेब अख्तर
झारखंड की राजनीति को यदि पिछले 25 साल के आईने में देखा जाए तो एक बात निर्विवाद रूप से साफ दिखाई देती है। राज्य बनने के बाद, सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, गठबंधन बने और टूटे, राजनीतिक दलों की ताकत घटती-बढ़ती रही। लेकिन इन तमाम बदलावों के बीच एक चीज लगभग स्थिर रही- झारखंड की राजनीति का ग्रामर।
आप कहीं भी नजर डालें, आज भी चुनावी सभाओं से लेकर विधानसभा की बहसों तक, सड़क पर चल रहे आंदोलनों से लेकर राजनीतिक घोषणापत्रों तक कुछ शब्द लगातार सुनाई देते हैं, जल, जंगल, जमीन, स्थानीयता, विस्थापन, सीएनटी-एसपीटी, आदिवासी अस्मिता, सरना, क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक न्याय। दिलचस्प बात यह है कि ये केवल चुनावी नारे नहीं हैं, बल्कि झारखंड की राजनीति की स्थायी शब्दावली बन चुके हैं। इस शब्दावली को गढ़ने और उसे जनमानस का हिस्सा बनाने में जिन नेताओं की सबसे बड़ी भूमिका रही, उनमें दिशोम गुरु शिबू सोरेन का नाम अग्रणी है।

किसी नेता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होता कि वह कितनी बार मुख्यमंत्री बना
याद रखना चाहिए कि किसी नेता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होता कि वह कितनी बार मुख्यमंत्री बना या कितने चुनाव जीता। इतिहास ऐसे नेताओं को अलग नजर से देखता है, जो राजनीति का एजेंडा बदल देते हैं। शिबू सोरेन का महत्व भी इसी कारण केवल एक राजनीतिक दल के संस्थापक या तीन बार मुख्यमंत्री रहने तक सीमित नहीं है। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने झारखंड की राजनीति का केंद्र बदल दिया। उन्होंने उन सवालों को मुख्यधारा में ला खड़ा किया, जिन्हें लंबे समय तक हाशिये का विषय माना जाता था।
झारखंड आंदोलन शिबू सोरेन से शुरू नहीं हुआ था। इससे पहले भी मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा, विनोद बिहारी महतो, ए.के. राय और अनेक नेताओं ने अलग झारखंड की मांग को मजबूत आधार दिया था। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण तथ्य है कि शिबू सोरेन ने इस आंदोलन को गांव-गांव तक पहुंचाने, उसे व्यापक जनाधार देने और उसे लगातार राजनीतिक विमर्श के केंद्र में बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने आंदोलन को केवल अलग राज्य की मांग तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे स्थानीय संसाधनों, सम्मान और अधिकारों के प्रश्नों से जोड़ दिया। यही कारण है कि वर्ष 2000 में राज्य बनने के बाद भी आंदोलन की भाषा समाप्त नहीं हुई। केवल उसके विषय बदलते गए।

यही वह बिंदु है, जहां शिबू सोरेन की वैचारिक विरासत दिखाई देती है
पहले संघर्ष अलग राज्य के लिए था, बाद में स्थानीय नीति के लिए हुआ। फिर विस्थापन, भूमि कानून, नियोजन, पेसा कानून, खनन, सरना धर्म कोड, खतियान आधारित पहचान और स्थानीय युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दे केंद्र में आते गए। मुद्दे अलग-अलग थे, लेकिन उनकी बुनियादी चिंता एक ही रही, झारखंड के लोगों की भागीदारी, सम्मान और संसाधनों पर अधिकार। यही वह बिंदु है, जहां शिबू सोरेन की वैचारिक विरासत दिखाई देती है।
आज झारखंड में शायद ही कोई राजनीतिक दल होगा, जो जल-जंगल-जमीन, स्थानीयता या सामाजिक न्याय जैसे प्रश्नों को पूरी तरह नजरअंदाज कर सके। चाहे सत्ता में झामुमो हो, भाजपा हो, कांग्रेस हो, आजसू हो या कोई अन्य दल, हर किसी को इन सवालों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी पड़ती है। लोकतंत्र में इसे ही किसी विचार की स्थायी सफलता कहा जा सकता है। जब आपके विरोधी भी उसी भाषा में अपनी बात रखने लगें, तो समझना चाहिए कि वह भाषा समाज की साझा राजनीतिक भाषा बन चुकी है।
हाल के वर्षों में झारखंड में हुए कई आंदोलन उदाहरण हैं
हाल के वर्षों में झारखंड में हुए कई आंदोलन इसका उदाहरण हैं। स्थानीय नियोजन नीति को लेकर युवाओं के आंदोलन हों, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता की मांग हो, पेसा कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की चर्चा हो या खनन और विस्थापन पर उठने वाले सवाल—इन सभी आंदोलनों की अपनी-अपनी परिस्थितियां हैं। लेकिन इनके केंद्र में बार-बार वही आग्रह दिखाई देता है कि विकास का लाभ स्थानीय समाज तक पहुंचे और निर्णय प्रक्रिया में उसकी भागीदारी सुनिश्चित हो। यही वह राजनीतिक चेतना है, जिसे झारखंड आंदोलन ने दशकों में विकसित किया। आज झारखंड राज्य अपने गठन के पचीस वर्ष पूरे कर चुका है। यह उपलब्धियों और चुनौतियों, दोनों का समय है। राज्य ने शिक्षा, सड़क, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में कई कदम आगे बढ़ाए हैं, वहीं रोजगार, पलायन, पर्यावरणीय संतुलन, आदिवासी स्वशासन, खनन और संसाधनों के न्यायपूर्ण उपयोग जैसे प्रश्न अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि झारखंड आंदोलन का राजनीतिक चरण भले पूरा हो गया हो, लेकिन उसके सामाजिक और आर्थिक लक्ष्य अब भी निरंतर बहस और प्रयास की मांग करते हैं।

झारखंड की राजनीति को यह सिखाया
यही कारण है कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन को केवल अतीत के नेता के रूप में नहीं देखा जा सकता। उनकी विरासत किसी एक दल या एक सरकार तक सीमित नहीं है। वह उस राजनीतिक संस्कृति में मौजूद है, जिसने झारखंड की राजनीति को यह सिखाया कि यहां विकास की चर्चा स्थानीय समाज, प्राकृतिक संसाधनों, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक न्याय के सवालों से अलग होकर नहीं की जा सकती। शायद इसी अर्थ में कहा जा सकता है कि झारखंड में सरकारें बदल सकती हैं, राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं और नेतृत्व भी बदल सकता है, लेकिन राजनीति का व्याकरण इतनी आसानी से नहीं बदलता। क्योंकि यह व्याकरण किसी चुनावी घोषणा-पत्र में नहीं लिखा गया था। यह दशकों तक चले जनसंघर्षों, गांवों की चौपालों, आंदोलनों, उम्मीदों और हजारों अनाम लोगों की भागीदारी से तैयार हुआ था।
दिशोम गुरु शिबू सोरेन की स्मृति में उन्हें याद करने का सबसे सार्थक तरीका शायद यही है कि उनके जीवन को केवल पदों और चुनावी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उस राजनीतिक चेतना के संदर्भ में समझा जाए, जिसने झारखंड की लोकतांत्रिक यात्रा को एक अलग पहचान दी। यही उनकी सबसे बड़ी और सबसे स्थायी विरासत है।
