द फॉलोअप,बिहार
बिहार में मैथिली भाषा को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया गया है। अब मैथिली को राज्य में मातृभाषा के रूप में मान्यता दे दी गई है। इसके साथ ही CBSE स्कूलों में कक्षा 1 से माध्यमिक स्तर तक विद्यार्थियों के लिए मातृभाषा के रूप में मैथिली की पढ़ाई अनिवार्य कर दी गई है। इस फैसले को मिथिला क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और भाषाई अस्मिता के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

मैथिली भाषा मिथिला की संस्कृति, पहचान और लोगों की भावनाओं से जुड़ा
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संयज सरावगी ने इस निर्णय की जानकारी देते हुए कहा कि यह सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि मिथिला की संस्कृति, पहचान और लोगों की भावनाओं से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि वर्षों से मैथिली भाषा को शिक्षा व्यवस्था में उचित स्थान दिलाने की मांग की जा रही थी और अब सरकार ने इस दिशा में बड़ा कदम उठाया है। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति में मातृभाषा में शिक्षा देने पर विशेष जोर दिया गया है। ऐसे में मैथिली को प्राथमिक शिक्षा से जोड़ने से बच्चों को अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ने का अवसर मिलेगा। साथ ही शुरुआती शिक्षा मातृभाषा में होने से बच्चों की समझ और सीखने की क्षमता भी बेहतर होगी।

संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल प्रमुख भाषाओं में से एक
यह फैसला मिथिला क्षेत्र के लाखों लोगों के लिए गर्व का विषय माना जा रहा है। लंबे समय से सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों द्वारा मैथिली को शिक्षा में अधिक महत्व देने की मांग उठाई जाती रही है। अब स्कूल स्तर पर मैथिली पढ़ाई जाने से नई पीढ़ी अपनी भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं से और अधिक जुड़ सकेगी। गौरतलब है कि मैथिली भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल प्रमुख भाषाओं में से एक है। साहित्य, लोकसंस्कृति और इतिहास के क्षेत्र में मैथिली की समृद्ध परंपरा रही है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था में इसे स्थान मिलने को मिथिला के लोगों के सम्मान और पहचान से जोड़कर देखा जा रहा है।