हजारीबाग:
ब्राजील के जेनेवा में 3-8 दिसंबर 2026 को आयोजित U17 वर्ल्ड स्कूल एथलेटिक्स चैंपियनशिप में झारखंड के 11 खिलाड़ियों का चयन हुआ है। इनमें रांची की अनोखी कुमारी और गुमला की पृथ्वी उरांव भी शामिल है। किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाली पृथ्वी और अनोखी के लिए यह उनके सपनों की ओर बढ़ाया गया पहला कदम साबित हो सकता है। दोनों एथलीट फिलहाल हजारीबाग में प्रशिक्षण ले रही हैं। गुमला की रहने वाली पृथ्वी उरांव पिछले 3 वर्षों से हजारीबाग में रहकर लॉन्ग जंप की तैयारी कर रही हैं। पृथ्वी उरांव के पिता किसान हैं, जबकि मां गृहिणी है। एक आम और कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाली पृथ्वी उरांव के सपने साधारण नहीं हैं।
प्रतिदिन मैदान पर लगने वाली छलांग, महज एक खेल गतिविधि नहीं है। यह उन तमाम सीमाओं को पार करने का प्रयास है, जो छोटे शहरों और सामान्य परिवारों के सपनों के आगे खड़ी हो जाती है।

400 मीटर हर्डल रेस में हिस्सा लेंगी अनोखी
रांची की अनोखी कुमारी ने 400 मीटर हर्डल रेस में जगह बनाई है। अनोखी भी हजारीबाग में रहकर ही ट्रेनिंग करती हैं। अनोखी भी किसान परिवार से आती हैं। इन दोनों लड़कियों की कहानी थोड़ी अलग है, लेकिन मंजिल केवल एक। एथलेटिक ट्रैक पर बढ़िया प्रदर्शन करना।

कोच नीरज रॉय और अनुकंपा रूंडा की मेहनत
इन खिलाड़ियों को इस मुकाम तक पहुंचाने में उनके स्थानीय कोच नीरज रॉय और अनुकंपा रूंडा की मेहनत भी अहम रही है। घंटों का प्रशिक्षण, लगातार अभ्यास और प्रदर्शन को बेहतर बनाने की कोशिश इसी मेहनत ने इन खिलाड़ियों को राष्ट्रीय स्तर से अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया है। खिलाड़ियों की प्रतिभा को निखारने में राज्य सरकार की आवासीय खेल व्यवस्था भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। प्रतिभावान खिलाड़ियों को आवासीय सुविधा उपलब्ध कराकर उन्हें उनकी खेल विधा में प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
पृथ्वी और अनोखी के लिए अगली चुनौती और भी बड़ी है। गोवा में करीब ढाई महीने का विशेष ट्रेनिंग कैंप लगने जा रहा है। वहां इन खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए विशेष तैयारी कराई जाएगी। यहीं से दोनों गोवा से ब्राजील की उड़ान भरेंगी।
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हजारीबाग ओलंपिक एसोसिएशन का सहयोग
इस सफर में हजारीबाग ओलंपिक एसोसिएशन के अध्यक्ष हर्ष अजमेरा ने कहा कि खिलाड़ियों को ब्राजील तक पहुंचाने में हरसंभव सहयोग कर रहे है। पृथवी की लंबी छलांग हो या अनोखी की बाधा दौड़, यहां सपना केवल पदक जीतना नहीं है. बल्कि उन तमाम वंचनाओं से आगे निकलने का सफरनामा है, जो इन्होंने अपनी जिंदगी में महसूस किया है। यहां मां की दुआ, कोच की मेहनत और तिरंगे को विश्व पटल पर सम्मान दिलाने का जुनून है।