रांची के वरियातू में निर्मित पल्स अस्पताल की जांच के मामले में बड़गाई सीओ से 14 फरवरी 2020 को रांची के पूर्व अपर समाहर्ता सत्येंद्र कुमार ने भुईंहरी जमीन से संबंधित सभी दस्तावेज मांगे थे, ताकि जमीन की वास्तविक स्थिति का पता चल सके। इस बीच 6 माह बीत गए, लेकिन सीएम को अबतक जांच रिपोर्ट नहीं सौंपी गई। जांच के नाम पर तो अबतक कुछ भी नहीं हुआ। अलबत्ता, इस बीच पल्स हॉस्पिटल का निर्माण कार्य जरूर पूरा हो गया। अब जांच किस दिशा में भटक गई या फिर सबकुछ मैनेज हो गया ! यह सवाल सत्ता प्रतिष्ठान के गलियारों में अवश्य गूंज रहा है। अहम सवाल ये कि विपक्ष भी इस मामले में चुप्पी साधे बैठा है। द फॉलोअप में किस्तवार पढ़िए, भुईंहरी जमीन की लूट की कहानी।
नारायण विश्वकर्मा
ऐसा देखा-सुना गया है कि झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन को ट्वीट करने पर फौरन सुनवाई होती है। सीएम फरियादी के ट्वीट पर रि ट्वीट कर जिला प्रशासन को कार्रवाई का हुकूम सुनाते हैं और इस तरह एक हफ्ते से कम समय में भी फरियादी का काम हो जाता है। लेकिन कई ऐसे वाजिब ट्वीट भी हैं, जिसे सीएम ने या तो नजरअंदाज किया है या फिर ब्यूरोक्रेट्स अभी तक मामले को दबाने में सफल हैं। मामला है भुईंहरी जमीन पर बने प्लस हॉस्पिटल के निर्माण का। इसी मामले में सीएम को ट्वीट कर उनका ध्यान आकृष्ट कराया गया था, जिसपर जांच के नाम पर पिछले 6 माह से सत्ता प्रतिष्ठान कुंडली मारे बैठा है।
ट्वीट असरकारक हुआ, सीएम ने तुरंत डीसी को जांच का आदेश दिया
सीएम के ट्वीट के असर को देखते हुए हमने 13 फरवरी को सीएम को भुईंहरी जमीन के मामले में एक ट्वीट किया। आप यकीन मानें मेरे ट्वीट करने के मात्र 40 मिनट बाद ही सीएम ने रांची के डीसी को संबंधित मामले में आरोपियों के खिलाफ जांच कर रिपोर्ट देने को कहा। इसके बाद शाम और फिर रात होने तक सत्ता प्रतिष्ठान में सनसनी फैल गई। हालांकि सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया में पल्स हॉस्पिटल से संबंधित खबर आने के बाद लगा था कि अब आदिवासी भूमि लूटनेवालों की शामत आनेवाली है। भुईंहरी जमीन मालिक के परिवारों के बीच खुशी की लहर छा गई। उन्हें लगा अब उनके साथ इंसाफ होगा। क्योंकि एक आदिवासी मुख्यमंत्री ने उनकी फरियाद सुन ली है। लेकिन उन्हें लगा कि सबकुछ एक झटके में खत्म हो गया है। बता दें कि इसके बाद पल्स हॉस्पिटल के निर्माण कार्य में और भी तेजी आ गई। इस बीच 6 माह बीत गए और पल्स हॉस्पिटल का निर्माण कार्य काम नहीं रूका और किसी का कुछ नहीं बिगड़ा।
आइये जानते हैं क्या था वो ट्वीट?
रांची के बरियातू रोड स्थित हरिहर सिंह रोड के मुहाने के पास 2016 से भुईंहरी जमीन पर पल्स अस्पताल का अवैध तरीके से निर्माण कार्य चल रहा था। भुईंहरी परिवार के लोगों ने बताया कि अंचल बड़गाईं, मौजा मोरहाबादी, थाना नंबर-192, खाता सं-162, खेसरा सं-1248 की 33 डिसमिल भुईंहरी जमीन में से करीब तीन कट्ठा जमीन की रसीद अरुण कुमार जैन के नाम से कटा ली गई। बाद में लैंडलॉर्ड के परिवार ने बड़गाईं अंचल में शिकायत की। निरीक्षण प्रतिवेदन के आधार पर पूर्व सीओ विनोद प्रजापति ने भुईंहरी खाते की जमीन को सरकार में निहित नहीं माना और खारिज कर दिया। इस तरह तमाम दस्तावेज को आधार बनाकर मैंने 7 फरवरी को फेसबुक पेज पर इसकी जानकारी साझा की। लेकिन इसका कोई खास असर नहीं हुआ। तब हमें पता चला कि राज्य के नए मुखिया हेमंत सोरेन ट्विटर पर काफी एक्टिव रहते हैं। इसलिए मैंने 13 फरवरी को इस मामले में सीएम को ट्वीट किया था।
6 माह बाद भी सीएम को जांच रिपोर्ट नहीं सौंपी गई
सीएम ने हमारे ट्वीट पर रांची के डीसी को रिट्वीट कर आरोपियों के खिलाफ जांच कर रिपोर्ट सौंपने की बात कही थी। सीएम ने रांची डीसी को ट्विटर पर टैग करते हुए लिखा था कि रांची डीसी कृपया मामले की पूरी जांच करते हुए आरोपियों पर कार्रवाई करते हुए सूचित करें। इस बीच 6 माह बीत गए लेकिन सीएम को अबतक जांच रिपोर्ट नहीं सौंपी गई। जांच के नाम पर तो कुछ भी नहीं हुआ। इधर तीव्र गति से पल्स हॉस्पिटल का रात-दिन निर्माण कार्य चलता रहा। यहां तक कि लॉकडाउन में भी निर्माण कार्य जारी रहा। सीएमओ से संपर्क करने में कहा गया कि अभी जांच में समय लगेगा। नगर निगम के पूर्व टाउन प्लानर मनोज कुमार से फोन से जानकारी मांगी, पूछा कि भुईंहरी जमीन पर नगर निगम ने कैसे नक्शा पास कर दिया? जमीन के प्लॉट और खाता नंबर के बारे में बताया जाए। इसपर कई दिनों तक टाला गया। इसी बीच नगर निगम में एसीबी के छापे पड़े। एक हफ्ते के बाद टाउन प्लानर मनोज कुमार को हटा दिया गया।
जांच होने तक निर्माण कार्य रोकने की मांग
भुईंहरी जमीन के वारिस कृष्णा मुंडा ने सीएम से अनुरोध किया था कि जबतक जांच चल रही है, तबतक निर्माण कार्य रोक दिया जाए, लेकिन उसकी फरियाद नहीं सुनी गई। कृष्णा मुंडा ने इस संबंध में सीएम को ट्वीट कर मार्च माह में ही इसकी जानकारी दी थी। रांची के डीसी को भी इसमें टैग किया गया था। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इस बीच रांची के डीसी रहे महिमापत रे की विदाई हो गई और जिन्हें जांच का जिम्मा सौंपा गया था, यानी रांची के अपर समाहर्ता सत्येंद्र कुमार, उनका भी तबादला हो गया।
आखिर नक्शा कैसे पास हो गया?
सवाल उठता है कि आखिर रांची नगर निगम से भुईंहरी जमीन का नक्शा कैसे पास हो गया? निर्माणकर्ता को एचडीएफसी बैंक से करोड़ों का कर्ज कैसे मिल गया? ऐसे बहुत सारे सवालों के जवाब अबतक नहीं मिले हैं। मामला अभी अदालत में लंबित है। तेतरटोली स्थित खपड़े के मकान में गुजर-बसर करनेवाले भुईंहरी परिवार की इतनी हैसियत नहीं कि अदालत में केस की पैरवी कर सके। वहीं दूसरी ओर रसूखदारों की प्रशासन से लेकर सत्ता तक पहुंच-पैरवी है। ये सबकुछ रघुवर सरकार के कार्यकाल में हुआ।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था मामला
ऐसा नहीं है कि भुईंहरी जमीन के मामले में ये सब पहली बार हुआ है या हो रहा है। इस मामले में 2019 में संबंधित क्षेत्र की भुईंहरी जमीन को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर भूमि सुधार सचिव के. के. सोन ने रांची डीसी को जांच के लिए कहा था। इसके बाद तीन सदस्यीय कमेटी ने जांच की थी। कमेटी ने वर्ष 16 फरवरी 2019 को अपनी रिपोर्ट डीसी को सौंपी थी, जो सुप्रीम कोर्ट को भेजी गई। रिपोर्ट में कहा गया कि निर्धारित समय सीमा 12 साल तक अगर जमीन अंतरण का विरोध नहीं किया जाता है तो, इस मामले में सीएनटी की धारा 49 (5) के तहत कार्रवाई संभव नहीं है। लेकिन भुईंहरी जमीन के नेचर को लेकर उक्त धारा प्रभावित नहीं होती। इस मामले में रांची वरीय अधिवक्ता और भुईंहरी जमीन मामले के विशेषज्ञ रश्मि कात्यायन कहते हैं कि इस कानून के तहत केवल रैयती भूमि के लिए 12 वर्ष की अवधि निर्धारित है। लेकिन कानून में भुईंहरी जमीन के लिए अवधि का कहीं कोई उल्लेख नहीं है, क्योंकि भुईंहरी जमीन की रसीद ही नहीं कटती है। दरअसल, आईएएस लॉबी ने सुनियोजित तरीके इस मामले को सुप्रीम कोर्ट को भी अंधेरे में रखने का काम किया है। रश्मि कात्यायन की किताब 'झारखंड लैंड मैनुअल' में भुईंहरी जमीन के नेचर को लेकर विस्तार से उल्लेख किया गया है।
भुईंहरी जमीन की न रसीद कटेगी, न रजिस्ट्री होगी
शिकायतकर्ता का भी यही तर्क था कि नियम के मुताबिक आदिवासी की भुईंहरी जमीन की न रसीद कटेगी, न रजिस्ट्री होगी, लेकिन नियम को ताक पर रखकर आदिवासी जमीन हथिया ली गई। जिस जमीन पर पल्स हॉस्पिटल का निर्माण हो चुका है, वह आइएएस पूजा सिंघल पुरवार के पति अभिषेक झा का है। सूत्र बताते हैं कि सीएम के पास शिकायत पहुंचने के बाद आईएएस बिरादरी में खलबली मच गई थी। शायद आईवाश के लिए सीएम द्वारा पल्स हॉस्पिटल की जांच का आदेश मिलने पर रांची जिला प्रशासन तैयारी में जुट गया था। 5 बिंदुओं पर जांच होनी थी। जांच के विषय थे-भुइंहरी जमीन है तो ऑनर कौन है? अभिषेक झा का कहना था कि शिकायतकर्ता ने जिस प्लॉट नंबर का जिक्र किया है, वह हमारे हॉस्पिटल के प्लॉट से मैच नहीं करता है। वह दूसरी जमीन है। उसका प्लस हॉस्पिटल के कोई लेना-देना नहीं है। कहीं किसी प्रकार की गड़बड़ी नहीं है, जबकि शिकायतकर्ता ने हेमंत सोरेन को टैग कर ट्वीट किया था कि जिस जमीन पर प्लस हॉस्पिटल बन रहा है, वह जमीन आदिवासी और भुईंहरी नेचर की है।
नोट : झारखंड में भुईंहरी जमीन को लेकर अभी बहुत सारे सवाल हैं, जिसका जवाब आदिवासी समाज अपने रहनुमाओं से मांग रहा है। भुईंहरी जमीन के मामले को हम किस्तवार प्रकाशित करेंगे।