द फॉलोअप टीम, रांची:
झारखंड की राजधानी रांची से सटकर बहती स्वर्णरेखा नदी सोना उगलती है। रांची से महज 16 किमी दूर अवस्थित इस नदी में पानी के साथ सोना बहता है। दिलचस्प ये भी है कि आज तक वैज्ञानिक ये समझ नहीं पाए हैं कि इस नदी में सोना आता कहां से है। आखिर किस वजह से नदी में सोना बहता है। ये रहस्य आज तक नहीं सुलझा।
क्यों नदी का नाम पड़ा स्वर्णरेखा
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस नदी का नाम स्वर्णरेखा इसलिए पड़ा क्योंकि यहां सोना बहता है। स्थानीय लोग इसे सोने की नदी भी कहते हैं। स्थानीय लोग नदी से सोना ढूंढ़ने का ही काम करते हैं। वे सुबह ही नदी के किनारे पहुंच जाते हैं। बालू को छानकर सोनू के कण ढूंढते हैं। पीढ़ियों से सांरडा और तमाड़ क्षेत्र के लोग ये काम करते हैं।
सोना निकालना काफी मुश्किल
यहां सोना निकालना भी कम मुश्किल और मेहनत का काम नहीं है। नदी की रेत से सोना निकालने के लिए लोगों को घंटो मशक्कत करनी पड़ती है। दिन भर की मेहनत के बाद एक या दो कण सोना मिल पाता है। कई बार वो भी नहीं मिलता। महीने भर में एक व्यक्ति बमुश्किल 60 से 80 कण सोना निकाल पाता है। एक कण चावल के दाने के बराबर होता है। व्यक्ति इसे बेचकर महीने के पांच से सात हजार रुपये कमा लेता है।

नदी में कहां से आता है इतना सोना
सवाल अब भी वही है कि इस नदी में सोना कहां से आता है। वैसे तो कोई ठोस कारण नहीं पता चला है लेकिन भू-वैज्ञानिको का मानना है कि नदी तमाम चट्टानों से होकर गुजरती है। इन चट्टानों में मिलने वाले सोने के टुकड़े घर्षण की वजह से टूटकर नदी के पानी में मिल पाते हैं। यही बहते हुए मैदानी इलाके तक आ जाते हैं।
स्वर्णरेखा नदी की अन्य खासियत
स्वर्णरेखा नदी का उद्गम रांची से 16 किमी दूर है। इसकी लंबाई 474 किमी है। स्वर्णरेखा की एक सहायक नदी है जिसका नाम है करकरी। इसमें भी सोने के कण मिलते हैं। कई लोगों का ये भी मानना है कि स्वर्णरेखा नदी में जो सोना मिलता है वो करकरी नदी से बहकर आता है। स्वर्णरेखा का थोड़ा हिस्सा पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भी है।