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विश्व आदिवासी दिवस और अगस्त क्रांति दिवस पर पढ़िए बाबूलाल मरांडी की कलम से...

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बाबूलाल मरांडी, झारखण्ड के प्रथम मुख्यमंत्री 

आदिवासी दिवस और अगस्त क्रांति दिवस पर आप सभी को जोहार, नमस्कार ! 
आज के दिन हमलोगों को अपने आपको मूल्यांकन करना चाहिए। 21वीं सदी में मानव चन्द्रमा और मंगल ग्रह तक पहुंच गया है और हमारा आदिवासी समाज आज कहां खड़ा है। इसपर हमें विचार करना चाहिए। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया में उन्हीं लोग को पूजा जाता है, जो सामर्थ्यवान होता है। गांव घर में भी उन्हीं लोग को पूछा जाता है और सम्मान दिया जाता। यही परिपाटी चली आ रही है। सामर्थ्यवान से हमारा यह अभिप्राय है कि जो शरीर से स्वस्थ हो, विद्या में निपुण  और ज्ञानवान हो। वह  आर्थिक रूप से मजबूत हो और जरूरत पड़ने पर निर्धनों की मदद भी कर सकता हो। आज हम शारीरिक रूप से कमजोर हो रहे हैं। आवश्यकता के अनुरूप हम भोजन नहीं कर पाते हैं। हमारी नई पीढ़ी को नशे की लत लग गई है। जीवन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमें इसका त्याग करना ही पड़ेगा। हमलोगों के पास भूमि है, नई तकनीक और खाद-बीज का उपयोग करना हमें सीखना होगा। याद रहे कि सीखने की उम्र छोटी पड़ जाती है और इंसान फना हो जाता है। संचार क्रांति के युग में तो सीखना और सिखाना आज के दौर में बहुत सरल है।  सबके हाथ में मोबाइल है। यू-ट्यूब या नेट के जरिए देखकर या सुनकर सीखा जा सकता है। खेती-किसानी और पशुपालन भी हमारे लिए आर्थिक साधन बन सकते हैं।

हमें नौनिहालों को अनिवार्य रूप से शिक्षा देनी होगी
शिक्षा के बिना हमारा विकास ही संभव नहीं है। संचार क्रांति के जरिए आज शिक्षा प्राप्त करने कई स्रोत हैं। स्कूलों की पढ़ाई के साथ हमें कौशल विकास के लिए भी सतत प्रयास करना होगा। ऐसी कई नयी तकनीकों का इस्तेमाल कर हम स्वयं ही नहीं, दूसरों को भी रोजगार से जोड़ सकते हैं। इसके लिए आज मोबाइल और गूगल बहुत ही कारगर साबित हो सकते हैं। हम गांव के पढ़े-लिखे नौजवान, आनेवाली पीढ़ी को समय निकाल उन्हें शिक्षित करने का प्रयास करना चाहिए। हम सबकुछ सरकार के भरोसे नहीं छोड़ सकते।

आत्मनिर्भर बनने का मंत्र आत्मसात करना होगा
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमें जो आत्मनिर्भर बनने का मंत्र दिया है, उसे हमें अपने जीवन में आत्मसात करना होगा। तभी हम आर्थिक रूप से संपन्न और सामर्थ्यवान हो पाएंगे। जिस तरह शरीर को सबसे पहले जरूरत पड़ती है वायु की। सांस लेने के लिए वायु जरूरी है। हम एक पल भी सांस के बिना नहीं रह सकते। हमें जो प्रकृति से मिला है, खाद-पानी, ये सब हमें प्रकृति से मुफ्त में मिला है। शरीर के पोषण के लिए भूमि में अनाज का एक दाना डालते हैं तो, कुछ महीनों में धरती उस एक दाने से सैकड़ों दाने पैदा कर देती है। पौधे लगाने के बाद जब वह पेड़ बन जाता है तो, हम उससे कई वर्षों तक फल पाते हैं। पेड़ से हमें छाया मिलती है। इसके अलावा शरीर की अन्य आवश्यकता को भी धरती मां हमें पूरा करती है। खेती, वाणिज्य– व्यापार और सरकारी या गैर सरकारी क्षेत्रों में नौकरी का हम प्रत्येक दिन जिस प्रकार उपयोग करते हैं, ठीक उसी प्रकार हमें प्रतिदिन उत्पादन भी करना होगाजिस दिन से हम उसका उपयोग करें और उत्पादन करना बंद कर दें तो, फिर हमें भूखे रहना पड़ेगा। इसलिए हमें हर हाल में आत्मनिर्भर होना होगा। हमें इसे मूलमंत्र बनाना होगा। यह समय की मांग है।

मैं सरना धर्म कोड का विरोधी नहीं
वर्तमान में सरना धर्म कोड की मांग जोरों पर है। मैं इसका विरोधी नहीं हूं। मैं चाहता हूं कि ऐसा हो, लेकिन आदिवासी समुदाय में भी अलग-अलग लोगों की अलग-अलग जीवन पद्धति है। रीति-रिवाज और परंपरा है। जन्म से लेकर मृत्यु तक का संस्कार अलग-अलग है। सभी के देवी देवता अलग हैं और पूजा स्थान का नाम और पहचान भी अलग-अलग है। भारत में आदिवासियों की 10 करोड़ की आबादी है। पिछली जनगणना में मात्र 60 से 70 लाख लोगों ने ही सरना धर्म का पालन करने की बात कही थी। मेरी इच्छा है कि जब 2021 में फिर से जनगणना होगी, तब सरना धर्म की मांग करनेवाले समाज के लोग सबों से अपील करें कि अन्य कॉलम में सरना लिखें जिस दिन ये संख्या 5 करोड़ भी पहुंच गई, मैं उस दिन खुद पीएम मोदी से मिलकर सरना धर्म कोड लागू करवाउंगा।
आज के लिए बस इतना ही, आप सबको जोहार!