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पूजा भगवान श्री चित्रगुप्त की- जिन्होंने किया लिपि का आविष्कार, जानिये कई अनजानी बातें

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द फॉलोअप टीम, रांची:

आज है यम द्वितीया कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भैया दूज के अलावा भगवान श्री चित्रगुप्त की पूजा भी की जा रही है। पटना की पत्रकार लता सिन्हा ज्योतिर्मय के अनुसार भगवान चित्रगुप्त पृथ्वी के सभी धर्मो का लेखा–जोखा रखने वाले के रूप में जाने जाते हैं। उत्तर भारत की मान्यताओं के आधार पर भगवान चित्रगुप्त  की दो पत्निया माँ एरावति उर्फ शोभावति तथा माता जग नंदिनीउर्फ सुदक्षिणा थीं। दोनों पत्नियों से बारह पुत्र – 1.श्रीवास्तव 2.सक्सेना 3.माथुर 4.कुलश्रेष्ठ 5.भटनागर 6.निगम 7.अम्बष्ट 8.सूरध्वज 9.कर्ण 10.गौड़ 11.अस्थाना व 12.बाल्मीक थे। इनमें से कौन किस माता के पुत्र थे और उम्र में कौन बड़ा और छोटा था इसमें बड़ा मतभेद है।

 

श्री चित्रगुप्त चालीसा - Shree Chitragupt Maharaj Chalisa in Hindi  -dharm.Raftaar.in

इसी प्रकार दक्षिण भारत में प्रचलित मतानुसार (भारती विधा भवन बम्बई की पुस्तक कल्चर कोर्स पुस्तक 10 दसवीं कक्षा हेतु 1991 में प्रकाशित (Lord Chitragupta पाठ से) भगवान चित्रगुप्त की तीन पत्निया प्रभावतीए नीलावती व कार्णिकी थीं। दक्षिण भारत में चित्रगुप्त जी के 14 मंदिर में एक काची ) काचीपुरम में है जिसमें सभी वर्णों के भक्त उन्हें केतुग्रह के आदि देवता के रुप में पूजते हैं। कालान्तर में इन सभी भाईयों की सन्तानें आवश्यकतानुसार परिस्थिति वश स्थान व कार्य बदलने के कारण क्षेत्रिय नामों व अल्लों से विख्यात होते गये। इन कायस्थों की वंशावलियां ”अल्लों” से विख्यात होते गये। इन कायस्थों की वंशावलिया ”अल्लैं” जो अभी तक जानकारी में आ सकीं, निम्न हैं –

1. श्रीवास्तव के गोत्र (43)
2. सक्सेना (189)
3. माथुर (183)
4. गौड़ (24)
5. भटनागर (83)
6. निगम (42)
7. कर्ण (360)
8. सूरध्वज सौकालीन गोत्रीय घोषवंशीय षांडिल्य, असित, देवता दक्षिण में सूर्य प्रभु या बंगाल में उत्तर राढ़ीय तथा वारेन्द्र तथा कुल या वंश से जाने जाते हैं। अधिक प्रमाणिक विवरण प्राप्त नहीं।
9. अम्बष्ट, 10. कुलश्रेष्ठ, 11. बाल्मीक, 12. अस्थाना।

 

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ज्योतिषाचार्य माधुरी के मुताबिक, भगवान चित्रगुप्त जी ब्रह्मा के सत्रहवें और अंतिम मानस पुत्र है। ब्रह्मा ने चित्रगुप्त को भगवती की तपस्या कर आर्शीवाद पाने की सलाह दी। तपस्या पूर्ण होने पर वह देवताओं व ऋषियों के साथ आर्शीवाद देने पहुंचे, ब्रह्मा जी ने अमर होने का वरदान दिया। चित्रगुप्त का विवाह क्षत्रिय वर्ण के विश्वभान के पुत्र श्राद्ध देव मुनि की कन्या नंदिनी से हुआ। दूसरा विवाह ब्राह्मण वर्ण के कश्यप ऋषि के पोते सुषर्मा की पुत्री इरावती से हुआ। मान्यता है कि चित्रगुप्त भगवान यम राज के साथ रहकर इंसान के जीवन मरण और पाप पुण्य का लेखा जोखा रखते है यम द्वितीया पर्व पर कलम दवात की पूजा होती है। दीपावली बाद बिना कलम पूजनके कोई कायस्थ कलम का प्रयोग नहीं करता। यह कायस्थों की सबसे बड़ी पूजा होती है।

 

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पुराणों में वर्णित है 21 सहस्द्द वर्ष की समाधि के बाद भगवान चित्रगुप्त की उत्पत्ति हुई। चित्र गुप्त को देख ब्रह्मा जी को विश्वास हुआ कि विश्व के समस्त प्राणियों के पाप पुण्य का लेखा जोखा रखने तथा उन्हे दण्डित करने के लिये उन्हे उपयुक्त संतान प्राप्त हो गया है। इस दिव्य पुरुष को चित्रगुप्त कहकर संबोधित किया, क्योंकि उनका चित्र ब्रह्मा जी के मानस में सुप्तावस्था में था। भगवान श्री चित्रगुप्त का स्वरूप कमल के समान नेत्रों पूर्ण चन्द्र के समान मुख,श्याम वर्ण, विशाल बाहु, शंख के समान ग्रीवा, शरीर पर उत्तरीय, गले में बैजयंती माला ,हाथों में शंख, पत्रिका लेखनी तथा दवात वाले एक अत्यंत भव्य महापुरुष का था। 

 

भगवान श्री चित्रगुप्त के पहले भाषा की कोई लिपि नहीं थी। उनका प्रवचन दिया जाता था श्री चित्रगुप्त ने माँ सरस्वती से विचार विमर्श के बाद लिपि का निर्माण किया और अपने पूज्य पिता के नाम पर उसका नाम ब्राह्मी लिपि रखा। इस लिपि का सर्वप्रथम उपयोग भगवान वेद व्यास के द्वारा सरस्वती नदी के तट पर उनके आश्रम में वेदों के संकलन से प्रारंभ किया गया। वेद के उप निषाद, अरण्यक ब्राह्मण ग्रंथों तथा पुराणों का संकलन कर उन्हे लिपि प्रदान किया गया। शास्त्रों के मुताबिक श्री चित्रगुप्त पूजन यम द्वितीया को किया जाता है यह किसी एक जाति का पूजन नहीं बल्कि कलम से जुड़े सभी लोगों के लिये श्रेष्ठ माना गया है। यह पूजन बल, बुद्धि, साहस, शौर्य के लिये अहम माना जाता है। कई पुराणों ग्रंथों में इस पूजन के बगैर कोई भी पूजा अधूरी मानी जाती है।