द फॉलोअप टीम, ललमटिया :
बोनस और एरियर का भुगतान न होने पर राजमहल परियोजना के कोल हैंडलिग में कार्यरत ठेका मजदूरों ने हड़ताल शुरू कर दी है। बुधवार को प्लांट परिसर में कोई भी मजदूर काम पर नहीं गए। इस संबंध में ठेका मजदूरों ने बताया कि दुर्गा पूजा के पूर्व हमलोगों को बोनस और एरियर का भुगतान करने का आश्वासन दिया गया था। बीते 27 अक्टूबर को बोनस और एरियर भुगतान के संबंध में वार्ता हुई थी, जिसमें 15 नवंबर तक एरियर और बोनस के भुगतान की बात हुई थी। लेकिन 15 नवंबर बीत जाने के बाद भी एरिया और बोनस का भुगतान नहीं हुआ।
25 नवंबर तक बोनस का भुगतान हो जाएगा
वार्ता के अनुसार एरिया और बोनस का भुगतान ना होने पर तंग आकर ठेका मजदूरों ने बुधवार को सुबह से गोलबंद होकर काम पर जाने से इन्कार कर दिया। हड़ताल की सूचना मिलने पर झारखंड मजदूर कल्याण संघ के अध्यक्ष राजेश रंजन ने राजमहल परियोजना के आला अधिकारियों की इसकी सूचना देकर अविलंब समस्या के निराकरण की मांग की। जिस पर सीएचपी कार्यालय में ठेका मजदूरों की समस्या का निराकरण को लेकर राजमहल परियोजना के महाप्रबंधक परिचालन ब्रजभूषण प्रसाद सिंह, कार्मिक महाप्रबंधक एचके चौधरी, एसके प्रधान एवं मजदूर प्रतिनिधि के बीच बैठक की गई। बैठक में निर्णय लिया गया कि सभी ठेका मजदूरों को 25 नवंबर तक बोनस और एरियर का भुगतान किया जाएगा। साथ ही प्रत्येक माह के मजदूरी का भुगतान महीने के 15 से 20 तारीख तक कर दिया जाएगा। बैठक के निर्णयों का कड़ाई से पालन करने के लिए ठेकेदारों के साथ बैठक कर उनको जानकारी दी जाएगी। जो ठेकेदार या कर्मी वार्ता में लिए गए निर्णय का अनुपालन नहीं करेंगे, उन्हें दोषी मानते हुए उनपर कार्रवाई की जाएगी। वार्ता की लिखित प्रति ठेका मजदूरों को दी गई। इसके बाद सभी ठेका मजदूर काम पर वापस लौट गए।
प्रबंधन के लिए सीएचपी की जरूरत नहीं
राजमहल परियोजना के कोल हैंडलिग प्लांट के क्रशर एवं अन्य सहायक बेल्ट के बंद होने के बाद काम करनेवाले 210 मजदूरों की आवश्यकता अब नहीं रह गई है। नियुक्त मजदूरों में आधे मजदूर ही काम पर रहते हैं। बाकी मजदूर हाजिरी बना कर ईसीएलकर्मियों की तरह घर निकल जाते हैं। इस पर रोक लगाने की प्रबंधन की कोशिश करने पर मजदूर आंदोलन के माध्यम से प्रबंधन पर दबाव बनाते हैं। दरअसल राजमहल परियोजना में इतने मजदूर नियुक्त हैं कि आउटसोर्सिंग वाले मजदूरों की आवश्यकता ही नहीं है, पर जमीनदाता होने के कारण विपरीत परिस्थितियों में ये लोग काम नहीं करना चाहते और बैठ कर ही वेतन का भुगतान लेते हैं। प्रबंधन की गलत नीतियों के कारण अब इस परिपाटी को रोक पाना संभव नहीं हो पा रहा है। इससे करोड़ों की राशि प्रबंधन को बेकार खर्च करना पड़ रहा है।